भारतकोश
योगिनी हृदयम् (अमृतानन्दनाथ विमर्शिनी एवं पं. व्रजवल्लभ द्विवेदी सविस्तार सटीक)

योगिनी हृदयम् (अमृतानन्दनाथ विमर्शिनी एवं पं. व्रजवल्लभ द्विवेदी सविस्तार सटीक)

Yogini Hridayam with Amritanandanatha Dipika by Vraj Vallabha Dwivedi

अमृतानन्दनाथ (भाष्यकार: पं. व्रजवल्लभ द्विवेदी) द्वारा

DevanagariHindipublished485 पृष्ठ

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तृतीयः ] दीपिकानुवादसहितम् २९९ इति प्रामाणिकवचनोक्तरीत्या यावदानन्दाविर्भावो भवति ^१तावदिति वीप्सार्थः । स्वयं चैव सहजानन्दविग्रहः । मद्याद्यनुभवेन कृत्रिमानन्दजृम्भणान्महा- नन्दानुसन्धानात् तन्मयो भवेदिति । तदुक्तं विज्ञानभैरवभट्टारकैः— जग्धिपानकृतोल्लासरसानन्दविजृम्भणात् । भावयेद् भरितावस्थां महानन्दस्ततो भवेत् ॥ इति । (वि० भै०, श्लो ७१) कोऽर्थः ? मन्त्रारणिमथनसंभूतमिदन्ताहन्तासामरस्य^२मयवस्तुरूपघृतपूर्णाहुतिं बहुशो हुत्वा परिस्फुरत्परमानन्दो भवेदित्यान्तरपूर्णाहुतिः ॥१०७-१०८॥ अत एव— प्रविष्टेऽन्तः सीधुरसे भेदनिर्हरणात्मके । स्थैर्यमेति चमत्कारो विना विषयसंगतिम्^३ ॥ किसी ^१प्रामाणिक व्यक्ति के इस वचन के अनुसार जब तक आनन्द की अभिव्यक्ति न हो जाय, तब तक यह पूर्णाहुति बार-बार दी जाती है। ऐसा करने से साधक सहज आनन्द से परिपूर्ण हो जाता है। मद्य आदि के सेवन से कृत्रिम आनन्द अभिव्यक्त होता है। इसमें महानन्द का अनुसन्धान करने पर योगी महानन्द से परिपूर्ण हो जाता है। विज्ञानभैरव भट्टारक की यह उक्ति इसमें प्रमाण है— जग्धि और पान के कारण अभिव्यक्त उल्लास, रस और आनन्द की स्थिति से साधक अपनी आत्मा को परिपूर्ण समझे । इससे उसमें ब्रह्मानन्द सहोदर महानन्द अभि- व्यक्त हो उठता है ॥ इसका भाव यह है कि मन्त्रारणि का मथन करने से इदन्ता और अहन्ता के सामरस्य स्वरूप जिस द्रव्य की उत्पत्ति होती है, उसी से यह पूर्णाहुति बार-बार दी जाती है। योगी ऐसा करते समय जब परमानन्द से परिपूर्ण हो जाता है, तो समझना चाहिये कि यह आन्तर पूर्णाहुति परिपूर्ण हो गई ॥१०७-१०८॥ इसी लिये—"भेददृष्टि को दूर भगा देने वाले सीधुरस के भीतर प्रवेश करने के साथ ही विषयों का सम्पर्क हुए बिना ही चमत्कार, अर्थात् सहजानन्द स्थिर हो जाता १. 'तावदिति''''भवेदिति' एष पाठः केवलं झ. मातृकायां दृश्यते । २. रस्यरूपं मद्यरूपं घृत-क. ग. ने. । ३. संगमात्-ख. ने. ज. झ. उ. । १. यह श्लोक कुलार्णवतन्त्र (५।८०) में भी मिलता है, किन्तु दीपिकाकार इसको भी प्रामाणिक वचन मानते हैं। बौद्ध तान्त्रिक विद्वान् अद्वयवज्र इसके पूर्वार्ध को वेदान्त- वादी का वचन कह कर उद्धृत करते हैं। देखिये—अद्वयवज्रसंग्रह, पृ० २९, तत्त्वप्रकाश के टीकाकार कुमार (पृ० ९) भी इसको श्रुतिवचन मानते हैं।