भारतकोश
योगिनी हृदयम् (अमृतानन्दनाथ विमर्शिनी एवं पं. व्रजवल्लभ द्विवेदी सविस्तार सटीक)

योगिनी हृदयम् (अमृतानन्दनाथ विमर्शिनी एवं पं. व्रजवल्लभ द्विवेदी सविस्तार सटीक)

Yogini Hridayam with Amritanandanatha Dipika by Vraj Vallabha Dwivedi

अमृतानन्दनाथ (भाष्यकार: पं. व्रजवल्लभ द्विवेदी) द्वारा

DevanagariHindipublished485 पृष्ठ

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पृष्ठ 348

३०० योगिनीहृदयम् [ पूजासंकेतः इति क्रमोदयोक्तरीत्या 'मनसि स्थिरीभूते बाह्यचक्रार्चनं कुर्यादित्याह- स्वप्रथाप्रसराकारं श्रीचक्रं पूजयेत् सुधीः ॥१०८॥ सुधीः सीधुरसपानेनानन्यविषयासक्तः २स्वसंविन्मात्रस्थिरमनाः। मनसि स्थिरे सति धारणा स्थिरा, तस्यां स्थिरायां "तत्र प्रत्ययैकतानता ध्यानम्" (३।२) इति योगपातञ्जलशास्त्रोक्तरीत्या४ प्रत्ययैकतानतालक्षणं ध्यानं भवति। विना ध्यानं पूजा निष्फला भवति। अथादावमृतीकृतमासवं शिवादिभ्यो गुरुभ्यो५ निवेद्य स्वात्माग्नौ हुत्वा प्रज्वलत्परमानन्दस्थिरधीर्भूयादित्यर्थः। ६स्वप्रथाप्रसरा- कारः स्वप्रथा स्वसंवित् तस्या बहिरर्थेष्विन्द्रियद्वारा प्रसरो व्यापारः, ७तदात्मना स्फुरणम्। ततस्तदाकारं श्रीचक्रं पूजयेत्। श्रीचक्रं८ नाम नान्यत् किञ्चित्, अपि तु स्वसंविद्देवतायाः प्रसररूपाऽन्तःकरणचतुष्टयाव्यक्तमहदहङ्कृतितन्मात्रदशे- है" क्रमोदय के इस वचन के अनुसार मन के स्थिर हो जाने पर बाह्य चक्र की पूजा करे, इस विषय का अब यहाँ वर्णन किया जा रहा है— विद्वान् साधक मन के स्थिर हो जाने पर अपनी आन्तर संवित् के ही बाह्य आकार वाले श्रीचक्र की पूजा करे ॥१०८॥ सुधी शब्द का अर्थ यहाँ है—सीधु रस के पान से जिसका मन अन्य किसी बाहरी विषय में आसक्त नहीं है, अपने संवित्स्वरूप में जो प्रतिष्ठित हो गया है। मन के स्थिर होने से धारणा स्थिर हो जाती है और धारणा के स्थिर होने पर ध्यान भी स्थिर हो जाता है। पातंजल योगसूत्र में प्रत्यय की एकतानता का नाम ध्यान बताया गया है। बिना ध्यान के पूजा निष्फल होती है। इसी लिये पहले यहाँ अमृतीकृत आसव को शिव (भैरव), गुरु आदि को निवेदित कर अपनी कामाग्नि में भी उसकी आहुति दी जाती है। इससे परमानन्द की अभिव्यक्ति होती है और उसी में साधक का मन स्थिर हो जाता है। स्वप्रथा का अर्थ है अपनी संवित्, उसका इन्द्रिय मार्ग से जब बाहरी अर्थों में प्रसार होता है, व्यापार चलता है, तो विश्वाकार में यह संवित् बदल जाती है। श्रीचक्र इसी का परिणाम है। श्रीचक्र और कुछ नहीं है, किन्तु अपनी संविद् देवता ही बाहर फैलते समय अन्तःकरण-चतुष्टय, अव्यक्त, महत्, अहङ्कार, तन्मात्रा, ज्ञानेन्द्रिय, कर्मेन्द्रिय, इनकी वृत्तिय । १. मनःस्थैर्ये जायते चेच्चक्रा-ख. ने. ज. ड. । २. स्वप्रथा-क. ग. । ३. स्वयं चिन्मात्र-ख. ने. ज. ड. । ४. 'रीत्या' नास्ति-ख. ने. ज. झ. उ. । ५. भ्यः शिवाभ्यां च-क. ख. ग. । ६. स्वप्रत्रा-क. ग. । ७. तत आत्मनः-ख. ने. ज. झ. उ. । ८. 'श्रीचक्रं नाम' नास्ति-ख. ज. झ. उ. । Courtesy: Shri Tarun Dwivedi, Surviving Son of Late Vraj Vallabh Dvivediji (15 Jul 1926 - 17 Feb 2012)