भारतकोश
योगिनी हृदयम् (अमृतानन्दनाथ विमर्शिनी एवं पं. व्रजवल्लभ द्विवेदी सविस्तार सटीक)

योगिनी हृदयम् (अमृतानन्दनाथ विमर्शिनी एवं पं. व्रजवल्लभ द्विवेदी सविस्तार सटीक)

Yogini Hridayam with Amritanandanatha Dipika by Vraj Vallabha Dwivedi

अमृतानन्दनाथ (भाष्यकार: पं. व्रजवल्लभ द्विवेदी) द्वारा

DevanagariHindipublished485 पृष्ठ

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तृतीयः ] दीपिकाभाषानुवादसहितम् ३०१ न्द्रिय१तद्वृत्तितद्विषयतत्पुर्यष्टकषोडशविकारधातुप्रपञ्च एव२ श्रीचक्रात्मना स्फुर३त्येतावत् ॥१०८॥ श्रीचक्रपूजामाह "गणेशम्" इत्यादिना "चक्रपूजां विधाय" (३।१६८) इत्यन्तेन— गणेशं दूतरौं चैव क्षेत्रेशं दूतिकां तथा। बाह्यद्वारे यजेद् देवि देवीश्च स्वस्तिकादिकाः ॥१०९॥ श्रीचक्रद्वारशाखयोर्गणेशं तच्छक्तिं दूतरों क्षेत्रेशं बटुकाख्यं तच्छक्तिं दूतिकां च यजेत्। तदुक्तं संकेतपद्धत्याम्— द्वैताद्वैतमहामोहशर्वरीक्षपणक्षमः। भास्वानिव जयत्येको गणेशो दूतरीयुतः॥ प्रतिभायाः परोल्लासो निशाकर इवापरः। दूतीयुक्तः स जयति बटुकस्ताण्डवान्वितः ॥ इति। बाह्यद्वारे श्रीचक्रद्वारबाह्यप्रदेशे, स्वस्तिकादिका४ देवीः सरस्वतीश्रीदुर्गाभद्र- काल्यश्चतस्रः। स्वस्तिका आदिर्यासामिति समासः। स्वाहाशुभङ्करीगौरोलोक- इनके विषय, पुर्यष्टक, सोलह विकार पर्यन्त इस समस्त विश्वप्रपंच का स्वरूप धारण कर कर लेती है और इसी का नाम श्रीचक्र है ॥१०८॥ अब यहाँ १०९ से १६८ पर्यन्त श्लोकों में श्रीचक्र की पूजाविधि बताई जा रही है— हे देवि ! श्रीचक्र के बाह्य द्वार पर गणेश, दूतरी, क्षेत्रेश तथा दूतिका और स्वस्तिका आदि देवियों की पूजा करें ॥१०९॥ श्रीचक्र के द्वार की दोनों तरफ गणेश और उसकी शक्ति दूतरी की तथा क्षेत्रेश (बटुक) और उसकी शक्ति दूतिका की पूजा करे। संकेतपद्धति में बताया गया है— द्वैत और अद्वैत की महामोह रूपी रात्रि के घने अन्धकार का, अज्ञान का नाश करने में एकमात्र गणेश ही अपनी शक्ति दूतरी के साथ सूर्य के समान समर्थ हैं। उनकी जय हो। प्रतिभा का जहाँ परम उत्कर्ष हुआ है, चन्द्रमा के समान जो आलोक से परि- पूर्ण हैं, ताण्डव नृत्य में रत, अपनी शक्ति दूती के साथ विराजमान बटुकभैरव की जय हो॥ श्रीचक्र के द्वार के बाहर स्वस्तिका, सरस्वती, श्री, दुर्गा और भद्रकाली तथा स्वाहा, शुभङ्करी, गौरी, लोकधात्री और वागीश्वरी इन पाँच पाँच देवियों की भगवती १. 'तद्वृत्ति' नास्ति-ख. ने. ज. झ. उ.। २. 'एव' नास्ति-ख. ज. उ.। ३. रतीत्येव-ख. ज. उ., रतीति-झ.। ४. काद्या देव्यः-ख. ने. ज. झ. उ.।