भारतकोश
योगिनी हृदयम् (अमृतानन्दनाथ विमर्शिनी एवं पं. व्रजवल्लभ द्विवेदी सविस्तार सटीक)

योगिनी हृदयम् (अमृतानन्दनाथ विमर्शिनी एवं पं. व्रजवल्लभ द्विवेदी सविस्तार सटीक)

Yogini Hridayam with Amritanandanatha Dipika by Vraj Vallabha Dwivedi

अमृतानन्दनाथ (भाष्यकार: पं. व्रजवल्लभ द्विवेदी) द्वारा

DevanagariHindipublished485 पृष्ठ

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७२ योगिनीहृदयम् [ पूजासंकेतः धात्रीवागीश्वर्यश्च पञ्च। एतास्ताश्च देवीर्गायिका यजेत्। तत्प्रसिद्धं पद्धतिषु ॥१०९॥ ततश्चान्तस्त्रिकोणेऽपि गुरुपङ्क्तिं त्रिधा स्थिताम्। ततस्तस्य श्रीचक्रस्य अन्तस्त्रिकोणे त्रिधा स्थितां दिव्यसिद्धमानवौघत्रयवतीं गुरुपङ्क्तिं शिवादिस्वगुरुपर्यन्तानां गुरूणां पङ्क्तिः परम्परा ताम्। अपिशब्दाद् यजेदित्यनुषङ्गः। गुरुपरम्परा गुरुमुखादेव ज्ञातव्या, न लोकतः। न च पुस्तके१ लिखिता, अत्यन्तरहस्यत्वात् ॥ तदन्तश्च महादेवीं तामावाह्य यजेत् पुनः ॥११०॥ महापद्मवनान्तस्थां कारणानन्दविग्रहाम्। मदङ्कोपाश्रयां देवीमिच्छाकामफलप्रदाम् ॥१११॥ भवतीं तदन्तः श्रीचक्रस्य ३मध्ये बैन्दवाख्ये चक्रे। तां महापद्मवनान्तस्थाम् 'महा- पद्मवनान्तस्थे वाग्भवे गुरुपादुकाम्' (३।५) इत्यत्रोपपादितरूपाम्४। अकुला- त्रिपुरसुन्दरी की गायिकाओं के रूप में पूजा करे। यह सारा विषय पद्धति-ग्रन्थों में प्रसिद्ध है ॥१०९॥ तब श्रीचक्र के मध्यत्रिकोण में त्रिधा स्थित गुरुपंक्ति की पूजा करे ॥ इसके बाद श्रीचक्र के अन्दर बीच में विद्यमान त्रिकोण में दिव्य, सिद्ध और मान- वौघ के क्रम से तीन भागों में विभक्त गुरुपंक्ति की, शिव से लेकर अपने गुरु तक चली आई गुरुपरम्परा की भी पूजा करे। त्रिधा विभक्त इस गुरुपरम्परा का ज्ञान अपने गुरु के मुँह से ही प्राप्त करना चाहिये। लौकिक परम्परा से इसका ज्ञान नहीं हो सकता। यह परम्परा अत्यन्त गोपनीय होने से १पुस्तक में भी नहीं लिखी जाती ॥ उस त्रिकोण रूपी महापद्मवन में विराजमान, कारणानन्द शरीरवाली इच्छा- नुसार सभी कामनाओं को पूरा करने वाली, मेरे अंक में विराजमान महादेवी त्रिपुरसुन्दरी का आवाहन कर पूजन करे ॥११०-११२॥ 'महापद्मवनान्तस्थ' पद की व्याख्या पहले (३।५) की जा चुकी है। तदनुसार श्रीचक्र के मध्य में स्थित त्रिकोणान्तर्गत बैन्दव चक्र में विद्यमान अकुल नाम का अधोमुख १. केषु-झ.। २. श्रितां-क. ग.। ३. श्रीचक्रमध्यबैन्द-ख. ने. ज. झ. उ.। ४. रूपकुलाधोमुखसहस्रदलकमलमहापद्मवनमध्यस्थाम्-ख. ने. ज. झ उ.। १. हादि और कादि विद्या की दिव्यौघ, सिद्धौघ और मानवौघ गुरुपरम्परा ऋजु- विमर्शिनी (पृ० २१८-२२४), अर्थरत्नावली (पृ० २१८-२२५), ज्ञानदीपविमर्शिनी (दीक्षा प्रकरण) और सौभाग्यसुभगोदय (पृ० ३१८-३२०) में देखी जा सकती है।