योगिनी हृदयम् (अमृतानन्दनाथ विमर्शिनी एवं पं. व्रजवल्लभ द्विवेदी सविस्तार सटीक)
Yogini Hridayam with Amritanandanatha Dipika by Vraj Vallabha Dwivedi
अमृतानन्दनाथ (भाष्यकार: पं. व्रजवल्लभ द्विवेदी) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंतृतीयः ] दीपिकाभाषानुवादसहितम् ३०३ धोमुखसहस्रदलं कमलं महापद्मवनम् । मदङ्कोपाश्रयाम् अनाश्रितस्य^१ स्वप्रकाशा- त्मनो ममाऽङ्कस्थाम् । कारणानन्दविग्रहाम् । कारणं नाम^२ हेतुद्रव्यम् । अत्रैव वक्ष्यति—"क्षेत्राणां पतये मह्यं बलिं कुर्वीत हेतुना" (३।१९९) इति । द्रव्यपानेन तेन य आनन्दः, स एव विग्रह आकारो यस्यास्ताम् । कोऽर्थः ? शोधितामृतीभूत- द्रव्यपानपरिस्फुरत्परमानन्दमात्रशरीरामित्यर्थः । भवतीम् अनाश्रितां [मम^३ देवीं विमर्शात्मिकाम् । इच्छाकामफलप्रदाम् इच्छया यत् काम्यते फल^४ तस्य सर्वस्य दात्रीम् । महापद्मवनान्तस्थे कारणानन्दविग्रहे । सर्वभूतहिते मातरेह्येहि परमेश्वरि ॥ इति मन्त्रेण आवाह्य यजेत् । ननु महापद्मवनान्तस्थामित्यनेनैवानाश्रितो देवोऽनाश्रिता देवी चाऽत्र चक्रे समावाह्य कामेश्वरीकामेश्वररूपेण पूज्याविति कथमवसीयत इति चेदुच्यते— महापद्मवनान्तस्थः सकलागमशास्त्राणां वक्ता देवोऽप्यनाश्रित एव, तच्छक्ति- रनाश्रिताऽत एव । अन्यथा महापद्मवनान्तस्थां मदङ्कोपाश्रयां भवतीमिति वचनं सहस्रदल कमल महापद्मवन कहलाता है । यह देवी उसमें विराजमान है । यह देवी अना- श्रित स्वप्रकाशमय शिवस्वरूप की, अर्थात् मेरी, गोद में बैठी हुई है । कारण हेतु-द्रव्य को कहते हैं । यहीं आगे (३।१९९) क्षेत्रपाल को बलि देने के प्रसंग में इस अर्थ में हेतु शब्द का प्रयोग हुआ है । कारण द्रव्य के पान से जो आनन्द उच्छलित होता है, वही उस शक्ति का स्वरूप है । इसका अभिप्राय यह है कि शोधन के कारण अमृतस्वरूप हुए द्रव्य के पान से उच्छलित आनन्द मात्र ही उस देवी का शरीर है । वह देवी दूसरी कोई नहीं है, स्वयं इस शास्त्र का श्रवण करने वाली तुम ही हो । अनाश्रित स्वरूप मेरी विमर्शात्मिका अनाश्रिता शक्ति तुम ही हो । साधक अपनी इच्छानुसार जिस फल की कामना करता है, वह भगवती उसे सब कुछ देती है । उसका 'महापद्म' इत्यादि मन्त्र से आवाहन कर पूजन करे । इस मन्त्र का अर्थ है— महापद्मवन में स्थित, करणानन्द स्वरूपिणी, सब प्राणियों का कल्याण करने वाली हे परमेश्वरि माता ! आओ आओ ॥ यहाँ प्रश्न उठता है कि 'महापद्मवनान्तस्थाम्' इस पद से अनाश्रित देव और अना- श्रिता देवी का यहाँ आवाहन कर कामेश्वर और कामेश्वरी के रूप में पूजन किया जाता है, इसका निर्णय कैसे होगा ? इसका उत्तर यह है कि महापद्मवन में बैठकर समस्त शास्त्रों का उपदेश करने वाले भगवान् अनाश्रित ही हैं । इसीलिये उनकी शक्ति अना- १. तस्येश्वरस्य-ख. ने. ज. उ. । २. 'नाम' नास्ति-ख. ने. ज. झ. उ. । ३. 'मम' नास्ति-झ., 'मम''''सर्वावयवभूषणः' नास्ति-ख. ने. ज. उ. । ४. तत्फलं-क. ग., फलं स्वसेवकेन-झ. ।