भारतकोश
योगिनी हृदयम् (अमृतानन्दनाथ विमर्शिनी एवं पं. व्रजवल्लभ द्विवेदी सविस्तार सटीक)

योगिनी हृदयम् (अमृतानन्दनाथ विमर्शिनी एवं पं. व्रजवल्लभ द्विवेदी सविस्तार सटीक)

Yogini Hridayam with Amritanandanatha Dipika by Vraj Vallabha Dwivedi

अमृतानन्दनाथ (भाष्यकार: पं. व्रजवल्लभ द्विवेदी) द्वारा

DevanagariHindipublished485 पृष्ठ

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तृतीयः ] दीपिकाभाषानुवादसहितम् ३०३ धोमुखसहस्रदलं कमलं महापद्मवनम् । मदङ्कोपाश्रयाम् अनाश्रितस्य^१ स्वप्रकाशा- त्मनो ममाऽङ्कस्थाम् । कारणानन्दविग्रहाम् । कारणं नाम^२ हेतुद्रव्यम् । अत्रैव वक्ष्यति—"क्षेत्राणां पतये मह्यं बलिं कुर्वीत हेतुना" (३।१९९) इति । द्रव्यपानेन तेन य आनन्दः, स एव विग्रह आकारो यस्यास्ताम् । कोऽर्थः ? शोधितामृतीभूत- द्रव्यपानपरिस्फुरत्परमानन्दमात्रशरीरामित्यर्थः । भवतीम् अनाश्रितां [मम^३ देवीं विमर्शात्मिकाम् । इच्छाकामफलप्रदाम् इच्छया यत् काम्यते फल^४ तस्य सर्वस्य दात्रीम् । महापद्मवनान्तस्थे कारणानन्दविग्रहे । सर्वभूतहिते मातरेह्येहि परमेश्वरि ॥ इति मन्त्रेण आवाह्य यजेत् । ननु महापद्मवनान्तस्थामित्यनेनैवानाश्रितो देवोऽनाश्रिता देवी चाऽत्र चक्रे समावाह्य कामेश्वरीकामेश्वररूपेण पूज्याविति कथमवसीयत इति चेदुच्यते— महापद्मवनान्तस्थः सकलागमशास्त्राणां वक्ता देवोऽप्यनाश्रित एव, तच्छक्ति- रनाश्रिताऽत एव । अन्यथा महापद्मवनान्तस्थां मदङ्कोपाश्रयां भवतीमिति वचनं सहस्रदल कमल महापद्मवन कहलाता है । यह देवी उसमें विराजमान है । यह देवी अना- श्रित स्वप्रकाशमय शिवस्वरूप की, अर्थात् मेरी, गोद में बैठी हुई है । कारण हेतु-द्रव्य को कहते हैं । यहीं आगे (३।१९९) क्षेत्रपाल को बलि देने के प्रसंग में इस अर्थ में हेतु शब्द का प्रयोग हुआ है । कारण द्रव्य के पान से जो आनन्द उच्छलित होता है, वही उस शक्ति का स्वरूप है । इसका अभिप्राय यह है कि शोधन के कारण अमृतस्वरूप हुए द्रव्य के पान से उच्छलित आनन्द मात्र ही उस देवी का शरीर है । वह देवी दूसरी कोई नहीं है, स्वयं इस शास्त्र का श्रवण करने वाली तुम ही हो । अनाश्रित स्वरूप मेरी विमर्शात्मिका अनाश्रिता शक्ति तुम ही हो । साधक अपनी इच्छानुसार जिस फल की कामना करता है, वह भगवती उसे सब कुछ देती है । उसका 'महापद्म' इत्यादि मन्त्र से आवाहन कर पूजन करे । इस मन्त्र का अर्थ है— महापद्मवन में स्थित, करणानन्द स्वरूपिणी, सब प्राणियों का कल्याण करने वाली हे परमेश्वरि माता ! आओ आओ ॥ यहाँ प्रश्न उठता है कि 'महापद्मवनान्तस्थाम्' इस पद से अनाश्रित देव और अना- श्रिता देवी का यहाँ आवाहन कर कामेश्वर और कामेश्वरी के रूप में पूजन किया जाता है, इसका निर्णय कैसे होगा ? इसका उत्तर यह है कि महापद्मवन में बैठकर समस्त शास्त्रों का उपदेश करने वाले भगवान् अनाश्रित ही हैं । इसीलिये उनकी शक्ति अना- १. तस्येश्वरस्य-ख. ने. ज. उ. । २. 'नाम' नास्ति-ख. ने. ज. झ. उ. । ३. 'मम' नास्ति-झ., 'मम''''सर्वावयवभूषणः' नास्ति-ख. ने. ज. उ. । ४. तत्फलं-क. ग., फलं स्वसेवकेन-झ. ।