भारतकोश
योगिनी हृदयम् (अमृतानन्दनाथ विमर्शिनी एवं पं. व्रजवल्लभ द्विवेदी सविस्तार सटीक)

योगिनी हृदयम् (अमृतानन्दनाथ विमर्शिनी एवं पं. व्रजवल्लभ द्विवेदी सविस्तार सटीक)

Yogini Hridayam with Amritanandanatha Dipika by Vraj Vallabha Dwivedi

अमृतानन्दनाथ (भाष्यकार: पं. व्रजवल्लभ द्विवेदी) द्वारा

DevanagariHindipublished485 पृष्ठ

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३०४ योगिनीहृदयम् [ पूजासंकेतः कथं घटते ? सदाशिवादीनां तु यद्यप्यागमशास्त्रवक्तृत्वमस्ति, तथापि महा- पद्मवनान्तस्थत्वं नास्ति। तदुक्तं स्वच्छन्दसंग्रहे— अनाश्रितस्य मध्यस्थं व्योमपद्मं सुविस्तरम्। असंख्ययोजनायामं तत्र सिंहासनस्थितः १॥ सूर्यकोट्यर्बुदप्रख्यः शशाङ्ककृतशेखरः। पञ्चवक्त्रो दशभुजस्त्रिपञ्चनयनः प्रभुः॥ सर्वावयवसम्पूर्णो ब्रह्ममूर्तिः २ सनातनः। सर्वज्ञः सर्वकर्ता च सर्वानुग्रहणे रतः॥ सर्वरत्नसमाकीर्णः सर्वा ३वयवभूषणः।] अनाश्रितकला देवो ४तस्योत्सङ्गे सदा स्थिता॥ पञ्चवक्त्रा त्रिनेत्रा च दशबाहीन्दुशेखरा। व्यापिन्यादिचतुष्कं च तादृशं परिकीर्तितम्॥ पूर्वा ५द्युत्तरपर्यन्तं ६दिग्गतैः सेवकैः शिवः। रुद्रकोट्यर्बुदानीकैः ७स्वसारूप्यैःस्वशक्तिभिः॥ श्रिता कहलाती है। अन्यथा 'महापद्मवनान्तस्था मदङ्गोपाश्रया भवती' इन विशेषणों की संगति नहीं बैठेगी। सदाशिव आदि को भी यद्यपि शास्त्र का प्रवक्ता माना गया है, तथापि इनका निवास महापद्मवन में नहीं है। स्वच्छन्दसंग्रह में इस विषय का विशद वर्णन किया गया है— अनाश्रित लोक के बीच में असंख्य योजन विस्तार वाला विशाल व्योमपद्म है। वहाँ सिंहासन पर विराजमान, अरबों-करोड़ों सूर्यों के समान कान्ति वाले, शशांकशेखर, पाँच मुंह, दस भुजा और पन्द्रह नेत्रों वाले भगवान् अनाश्रित शिव विराजमान हैं। यह देव सभी अवयवों से परिपूर्ण सनातन ब्रह्मा हैं, सर्वज्ञ और सर्वकर्ता हैं, सदा सब पर अनु- ग्रह करते रहते हैं। इनका शरीर नाना प्रकार के रत्नों और आभूषणों से सुशोभित है। इनकी गोद में सदा अनाश्रित कला विराजमान रहती है। यह भी पाँच मुख, तीन नेत्र और दस बाहु वाली है। इनके भी ललाट में चन्द्रमा शोभित है। ऐसे ही स्वरूप वाली व्यापिनी १ आदि चार शक्तियाँ पूर्व आदि दिशाओं में विद्यमान हैं। इन्हीं दिशाओं में विद्यमान समान रूपवाले लोकनाथों, सेवकों, करोड़ों-अरबों की संख्या वाली सेनाओं और १. इतः परम्-'अनाश्रितस्येश्वरस्य मध्यस्थः परमेश्वरः' इत्यधिकः पाठः-झ.। २. बृहन्मूर्तिः-झ.। ३. भरणभूषितः-झ.। ४. तदुत्सङ्गे-ख. ने. ज. उ.। ५. दुत्तर- क. ग.। ६. निर्याता सेविका शिवा-ख. ने. ज. उ.। ७. स्वस्वरूपस्व-झ.। १. पहले (पृ० ४७-४८) व्यापिनी की मध्य में तथा सूक्ष्मा आदि चार शक्तियों की चार दिशाओं में स्थिति बताई गई है। व्यापिनी के साथ उन्हीं चार शक्तियों का उल्लेख यहाँ भी किया गया है।

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