भारतकोश
योगिनी हृदयम् (अमृतानन्दनाथ विमर्शिनी एवं पं. व्रजवल्लभ द्विवेदी सविस्तार सटीक)

योगिनी हृदयम् (अमृतानन्दनाथ विमर्शिनी एवं पं. व्रजवल्लभ द्विवेदी सविस्तार सटीक)

Yogini Hridayam with Amritanandanatha Dipika by Vraj Vallabha Dwivedi

अमृतानन्दनाथ (भाष्यकार: पं. व्रजवल्लभ द्विवेदी) द्वारा

DevanagariHindipublished485 पृष्ठ

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तृतीयः ] दीपिकाभाषानुवादसहितम् ३०५ सेवितो१ लोकनाथैस्तैः२ सृष्ट्यादीनि करोति सः३। अनाश्रितोऽयं भगवान् पञ्चवक्त्रस्त्रिदृक् तथा॥ दशबाहुश्चतुर्बाहुर्द्विबाहुश्चैकवक्त्रकः४। "कौलागमादिवक्ताऽसौ देवदेवः सदाशिवः॥ परापरविभागेन प्रोवाचासंख्यमागमम्। इति। उत्तरपदेऽप्युक्तम्— व्योमाम्बुजे सहस्रारे सितकेसरसंकुले। तत्रासीनं महादेवमपृच्छत् कुलनायिका॥ (१११) इति ॥११०-११२॥ तन्मयैरेव नैवेद्यादिभिरर्चयेत्। भवतीम् इत्यत्राप्यन्वेति। भवतीं स्वसंविल्लक्षणाम्। त्वन्मयैरेव पञ्चभूतमयं विश्वं तन्मयी सा सदाऽनघे। तन्मयी मूलविद्या च तत्तथा कथयामि ते॥ (२।२८) अपनी शक्तियों से सेवित यह अनाश्रित भगवान् शिव सृष्टि आदि कार्यों को सम्पन्न करते हैं। इनके पाँच मुँह, तीन नेत्र हैं। यह स्वरूप दस हाथ वाला, चार हाथ वाला, दो हाथ वाला और एक मुँह वाला भी है। यही देवदेव सदाशिव का स्वरूप धारण कर कौल आदि आगमों के तथा पर और अपर विभाग वाले अन्य असंख्य आगमों के प्रवक्ता हैं॥ १उत्तरपद में भी कहा गया है— श्वेत केसर से संकुल सहस्रार व्योमाम्बुज (अकुल पद्म) में विराजमान महादेव से कुलनायिका भगवती ने पूछा ॥११०-११२॥ यह पूजा संविच्छक्तिस्वरूपिणी आप भगवती के विस्फार से निष्पन्न नैवेद्य आदि से की जानी चाहिये॥ ऊपर के सन्दर्भ में आया 'भवतीम्' शब्द भी यहाँ गृहीत होता है। स्वसंवित्- स्वरूपिणी आप भगवती की पूजा आपकी इच्छा से निर्मित नैवेद्य आदि से की जानी चाहिये। पहले (२।२८) बताया गया है— १. सेविता-ख. ने. ज. उ. । २. पालैश्च-झ. । ३. सा-ख. ज. झ. । ४. बाहुकः— क. विहाय सार्वत्रिकः पाठः । ५ लोका-क. ग. । १. यहाँ उत्तरपद के नाम से उद्धृत वचन उत्तरषट्क नामक ग्रन्थ का प्रथम श्लोक है। शिवानन्द और विद्यानन्द (पृ० १०,७०, २३१, २७०) ने उत्तरषट्क के नाम से ही इस ग्रन्थ को उद्धृत किया है। लघुस्तव के जैन टीकाकार सोमतिलक सूरि भी इस ग्रन्थ को इसी नाम से स्मरण करते हैं। मद्रास और त्रिवेन्द्रम् में कुलदीपिका टीका के साथ प्रकाशित 'षडन्वय महारत्न' नाम से यह उपलब्ध है। २०

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