योगिनी हृदयम् (अमृतानन्दनाथ विमर्शिनी एवं पं. व्रजवल्लभ द्विवेदी सविस्तार सटीक)
Yogini Hridayam with Amritanandanatha Dipika by Vraj Vallabha Dwivedi
अमृतानन्दनाथ (भाष्यकार: पं. व्रजवल्लभ द्विवेदी) द्वारा
पृष्ठ 354, कुल 485 में से
संदर्भ में पढ़ें३०६ योगिनीहृदयम् [ पूजासंकेतः इति पूर्वोक्तरीत्या $^१$पञ्चभूतानि भवदिच्छाविजृम्भितानि त्वद्रूपाणि, $^२$पञ्चरूपिणमात्मानं दिव्यैः पञ्चोपचारकैः । $^३$अर्चयेत् सह गन्धेन पृथिवीं कुसुमेन खम् ॥ धूपेन वायुं दीपेन तेजोऽन्नेन रसं पुनः । इति प्रामाणिकवचनोक्तरीत्या $^४$तैरेव नैवेद्यादिभिरर्चयेत्। नैवेद्यादिभिरित्यादि- पदेन गन्धपुष्पधूपदीपनैवेद्यानि गृह्यन्ते । सुगन्धवत्पदार्थानुभवेन प्रत्यङ्मुखतया प्रमातरि विश्रान्तिर्गन्धसमर्पणम् । $^५$सुशब्दवत्पदार्थानुभवेन प्रत्यङ्मुखतया प्रमा- तरि विश्रान्तिः पुष्पसमर्पणम् । $^६$सुस्पर्शवत्पदार्थानुभवेन प्रत्यङ्मुखतया प्रमातरि विश्रान्तिर्धूपसमर्पणम् । सुरूपवत्पदार्थानुभवेन प्रत्यङ्मुखतया प्रमातरि विश्रान्ति- यह विश्व पंचभूतमय है । हे अनघे ! यह परा देवता भी पंचभूतमयी है और यह मूलविद्या परादेवता और पंचभूत दोनों का बोध जिस तरह से कराती है, अब मैं उसका वर्णन कर रहा हूँ ॥ इस तरह पंचभूत की उत्पत्ति भगवती की इच्छा से ही होती है, अतः ये सब भग- वती के स्वरूप हैं। किसी प्रामाणिक व्यक्ति ने कहा है— पंचमहाभूत से उत्पन्न इस देह में विराजमान स्वात्मस्वरूप की दिव्य पंचोपचार से पूजा करे। गन्ध के साथ पृथिवी को, पुष्प के साथ आकाश को, धूप के साथ वायु को, दीप के साथ तेज को और अन्न (नैवेद्य) के साथ रस को समर्पित किया जाता है ॥ इसके अनुसार भगवतीस्वरूप इन पाँच महाभूतों को ही यहाँ नैवेद्य आदि के रूप में समर्पित करे । आदि पद से नैवेद्य के साथ गन्ध, पुष्प धूप, दीप का ग्रहण होता है । सुगन्धित पदार्थों का अनुभव करके उनको अपने भीतर के प्रमाता को समर्पित कर देना गन्धसमर्पण है । सुन्दर शब्द से परिपूर्ण गान आदि का अनुभव कर उसको अपने भीतर के प्रमाता को समर्पित कर देना पुष्पसमर्पण है । सुन्दर सुकोमल स्पर्श से परिपूर्ण पदार्थों का अनुभव कर उसको अपने भीतर के प्रमाता को समर्पित कर देना धूपसमर्पण है । सुन्दर स्वरूप वाले पदार्थों का अनुभव कर उनको अपने भीतर के प्रमाता को समर्पित कर देना दीपसमर्पण है । स्वादु रस से परिपूर्ण पदार्थों का अनुभव कर उनको अपने भीतर के प्रमाता को समर्पित कर देना नैवेद्यसमर्पण है । इसका अभिप्राय यह है कि जो इन्द्रियाँ प्रायः पराङ्मुख (बाहर की तरफ) दौड़ती हैं, उनको प्रत्यङ्मुख (भीतर १. 'पञ्च....त्वद्रूपाणि' इत्यस्य स्थाने 'पञ्चोपचारैरर्चयेत्' इति पाठः-ख. ने. ज. उ. । २. नास्त्येषा पङ्क्तिः-ख. ने. ज. उ. । ३. अर्चं-ने. ज. झ. । ४. 'तैरेव....गृह्यन्ते' इत्यस्य स्थाने 'नैवेद्यायागं चरेत् । कोऽर्थः' इति पाठः-ख. ने. ज. झ. उ. । ५. तन्त्र्यात्म- शब्दानु-ख. ने. ज. झ. उ. । ६. 'सु' नास्ति-ख. ने. ज. झ. उ. ।