योगिनी हृदयम् (अमृतानन्दनाथ विमर्शिनी एवं पं. व्रजवल्लभ द्विवेदी सविस्तार सटीक)
Yogini Hridayam with Amritanandanatha Dipika by Vraj Vallabha Dwivedi
अमृतानन्दनाथ (भाष्यकार: पं. व्रजवल्लभ द्विवेदी) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंतृतीयः ] दीपिकाभाषानुवादसहितम् ३०७ दीपसमर्पणम् । स्वादु¹रसवत्पदार्थानुभवेन प्रत्यङ्मुखतया प्रमातरि विश्रान्तिर्नैवेद्य- समर्पणमित्यर्थः । तदुक्तं मुख्याम्नायरहस्ये— इन्द्रियद्वार²संग्राह्यैर्गन्धाद्यैः स्वात्मदेवता । ³स्वभावेन समाराध्या ज्ञातुः सोऽयं महामखः ॥ इति । बहिरपि गन्धपुष्पधूपदीपनैवेद्यानि ⁴पृथिव्याकाशवायुतेजःसलिलभावनया देव्यै समर्पयेदि⁵त्युपचारोपनिषत् ॥११२॥ त्रिकोणे तत्स्फुरत्तायाः प्रतिबिम्बाकृतीः पुनः ।।११२।। तत्तत्तिथिमयोर्नित्याः काम्यकर्मानुरूपिणीः⁶ । त्रिकोणे श्रीचक्रस्य त्रिकोणे⁷ रेखात्रये, तत्स्फुरत्तायाः प्रतिबिम्बाकृतीः, "गुणाः पञ्चदश प्रोक्ता भूतानां तन्मयी शिवा" (२।३०) इत्यत्रैव पूर्वोक्तरीत्या भूतगुणात्मिकायाः पञ्चदशाक्षरशरीरिण्याः⁸ श्रीविद्यायास्तत्र⁹ स्फुरणात् पञ्च- दशप्रतिबिम्बरूपाः, तत्तत्तिथिमयीः तत्संख्याकप्रतिपदादितिथ्यात्मिकाः, काम्य- की तरफ) बना देना ही आन्तर पंचोपचार पूजा है । मुख्याम्नायरहस्य² नामक ग्रन्थ में बताया गया है— इन्द्रियों के द्वारा जिनका संग्रह किया जाता है, उन गन्ध आदि से स्वात्मदेवता की स्वाभाविक पूजा करनी चाहिये । यही योगी साधक का महान् यज्ञ है ॥ बाह्य पूजा में भी गन्ध, पुष्प, धूप, दीप और नैवेद्य का देवी को समर्पण पृथिवी, आकाश, वायु, तेज और जल की भावना के साथ ही करना चाहिये । पंचोपचार पूजा का यही रहस्य है ॥११२॥ त्रिकोण में श्रीविद्या के पन्द्रह अक्षरों की प्रतिबिम्ब-स्वरूपिणी पन्द्रह तिथि- नित्याओं का पूजन कामना के अनुसार करे ॥११२-११३॥ श्रीचक्र के मध्यत्रिकोण की तीन रेखाओं में पन्द्रह तिथिनित्याओं का पूजन करे । पहले (२।३०) बताया गया है—"पाँच भूतों के पन्द्रह गुण होते हैं । अतः पंचभूतमयी यह विद्या भी पन्द्रह अक्षरों वाली है" । तदनुसार भूतगुणात्मिका पंचदशाक्षरी विद्या इस त्रिकोण में प्रतिबिम्बित होकर पन्द्रह तिथिनित्याओं का स्वरूप धारण कर लेती है । १. स्वादूषदंशवत्-ख. ने. ज. झ. उ. । २. ग्राम-क. ख. ग. । ३. स्वाभेदेन- क. ग. । ४. पृथिवीवाय्वाकाशतेजः-ख. ने. ज. झ. । ५. दित्युपनि-ख. ने. ज. झ. उ. । ६. सारिणीः-क. ख. ग. ने. । ७. णरे-झ. उ. । ८. शालिन्याः-ख. ने. ज. झ. उ. । ९. 'तत्र' नास्ति-ख. ने. ज. उ. । १. पृ० २३० की टिप्पणी देखिये ।