भारतकोश
योगिनी हृदयम् (अमृतानन्दनाथ विमर्शिनी एवं पं. व्रजवल्लभ द्विवेदी सविस्तार सटीक)

योगिनी हृदयम् (अमृतानन्दनाथ विमर्शिनी एवं पं. व्रजवल्लभ द्विवेदी सविस्तार सटीक)

Yogini Hridayam with Amritanandanatha Dipika by Vraj Vallabha Dwivedi

अमृतानन्दनाथ (भाष्यकार: पं. व्रजवल्लभ द्विवेदी) द्वारा

DevanagariHindipublished485 पृष्ठ

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३०८ योगिनीहृदयम् [ पूजासंकेतः कर्मानुरूपिणोः१ "नवचक्रक्रमो२ योऽसौ महावश्यादिसिद्धिदः" इति संकेत- पद्धत्युक्तरीत्या बाह्यचक्रार्चनं काम्यं कर्म, तदनुरूपकरचरणादिमद्रूपधारिणीः३ । उत्पत्तिविनाशरहितत्वान्नित्याः, ततः कामेश्वरी नित्या नित्या च भगमालिनी । नित्यक्लिन्नाऽपि४ च तथा भेरुण्डा वह्निवासिनी ॥ महाविद्येश्वरी दूती त्वरिता कुलसुन्दरी । नित्या नीलपताका च विजया सर्वमङ्गला ॥ ज्वालामालिनी५ चित्रा चेत्येवं नित्यास्तु षोडश । (१।२६-२८) इति चतुःशतीशास्त्रोक्ताः । पुनः शब्दादर्चयेदित्यनुषङ्गः ॥११२-११३॥ तत्र प्रकटयोगिन्यश्चक्रे त्रैलोक्यमोहने ॥११३॥ तत्र श्रीचक्रे। त्रैलोक्यमोहने चक्रे पूर्वोक्त(१।८२)निर्वचने चतुरस्रत्रय- इसका भाव यह है कि इस त्रिकोण में श्रीविद्या के पन्द्रह अक्षर प्रतिबिम्बित होते हैं और वे ही प्रतिपत् आदि पन्द्रह तिथिनित्याओं का स्वरूप धारण कर लेते हैं। इनकी पूजा विभिन्न कामनाओं की पूर्ति के लिये की जाती है। संकेतपद्धति में बताया गया है— “यह जो नवचक्र का क्रम बताया गया है, वह महावश्यादि सिद्धियों का देने वाला है”। बाह्य चक्र की पूजा एक प्रकार का काम्य कर्म है। यह भगवती उस काम्य कर्म की सिद्धि के लिये तदनुरूप कर-चरण आदि से संयुक्त स्वरूप धारण कर लेती है। ये सब स्वरूप 'नित्या' के नाम से इस लिये कहे जाते हैं कि ये सब उत्पत्ति और विनाश से रहित हैं। चतुःशती शास्त्र में इन पन्द्रह नित्याओं के नाम गिनाये गये हैं— कामेश्वरी नित्या, भगमालिनी नित्या, नित्यक्लिन्ना, भेरुण्डा, वह्निवासिनी, महा- विद्येश्वरी, दूती, त्वरिता, कुलसुन्दरी, नित्या, नीलपताका, विजया, सर्वमङ्गला, ज्वाला- मालिनी और चित्रा। महात्रिपुरसुन्दरी को मिलाने से इनकी संख्या सोलह होती है ॥ श्लोक में पुनः शब्द आया है। इससे 'अर्चयेत्' क्रिया का अध्याहार किया जाता है। इसका अभिप्राय यह होगा कि त्रिकोण में पन्द्रह तिथिनित्याओं का पूजन अपनी कामना की पूर्ति के लिये करे ॥११२-११३॥ उस श्रीचक्र में स्थित त्रैलोक्यमोहन नामक चक्र में प्रकट योगिनियों का पूजन करे ॥११३॥ उस श्रीचक्र में स्थित त्रैलोक्यमाहन चक्र में, जिसका कि निर्वचन पहले (१।८२) बताया जा चुका है, तीन चतुरस्र के लेखन से सम्पन्न होने वाले उस चक्र में प्रकट १. सारिणीः-क. ख. ग. ने. । २. मयो-ख. झ. । ३. धारिण्यः-ख. ने. ज. झ. उ. । ४. भिधा नित्या-म. । ५. लिनिका चित्रेत्येवं-ख. ने. ज. झ. । Courtesy: Shri Tarun Dwivedi, Surviving Son of Late Vraj Vallabh Dvivediji (15 Jul 1926 - 17 Feb 2012)