भारतकोश
योगिनी हृदयम् (अमृतानन्दनाथ विमर्शिनी एवं पं. व्रजवल्लभ द्विवेदी सविस्तार सटीक)

योगिनी हृदयम् (अमृतानन्दनाथ विमर्शिनी एवं पं. व्रजवल्लभ द्विवेदी सविस्तार सटीक)

Yogini Hridayam with Amritanandanatha Dipika by Vraj Vallabha Dwivedi

अमृतानन्दनाथ (भाष्यकार: पं. व्रजवल्लभ द्विवेदी) द्वारा

DevanagariHindipublished485 पृष्ठ

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तृतीयः ] दीपिकाभाषानुवादसहितम् ३०९ लक्षणे। प्रकटयोगिन्यः, यष्टव्या इत्युत्तरत्र¹ (१।११६) स्थितेनान्वयः ॥११३॥ प्रकटशब्दनिर्वचनमाह— मातृकास्थूलरूपत्वात् त्वगादिव्यापकत्वतः । योगिन्यः प्रकटा ज्ञेयाः स्थूलविश्वप्रधौत्मनि ॥११४॥ मातृकाः³ परापश्यन्तीमध्यमावैखर्यः, तासु स्थूलमकारादिक्षकारान्तं पञ्चा- शद्वर्णमयं वैखरीरूपम्। तदुक्तं स्वच्छन्दसंग्रहे—"स्थूलं पञ्चाशदाकारम्"⁴ इति। तद्रूपत्वात् मातृका⁵स्थूलरूपवैखरीवर्णवर्गाष्टकमयत्वात् सिद्धीनां ब्राह्म्या- दीनां च। तदुक्तं चतुःशत्याम्— वर्गानुक्रमयोगेन ⁶यस्यां मात्रष्टकं स्थितम्। वन्दे तामष्टवर्गोत्थमहासिद्ध्यष्टकेश्वरीम् ।। (१।११) इति । योगिनियों का पूजन करना चाहिये। ११६ व श्लोक में स्थित 'यष्टव्याः' पद का यहाँ भी अन्वय किया जाता है ॥११३॥ प्रकट शब्द का निर्वचन बताते हैं— मातृका का स्थूल स्वरूप इनका आधार है, त्वक् आदि धातुओं में ये व्याप्त हैं, अतः स्थूल विश्व को धारण करने वाले भूपुरयात्मक चक्र में स्थित ये योगिनियाँ प्रकट कहलाती हैं ॥११४॥ परा, पश्यन्ती, मध्यमा और वैखरी ये चार मातृकाएँ हैं। इनमें अकार से क्षकार पर्यन्त पचास वर्णों वाला वैखरी वाणी का आधार स्थूल माना जाता है। स्वच्छन्दसंग्रह में स्पष्ट बताया गया है—"पचास अक्षरों वाला यह आकार स्थूल है"। मातृका का यह स्थूल स्वरूप वैखरी वाणी के आठ वर्गों में विभक्त है और ब्राह्मी आदि सिद्धियां इन्हीं स्थूल वर्णों की अधिष्ठात्री देवियाँ हैं, अतः ये प्रकट योगिनियाँ कही जाती हैं। ¹चतुः- शती शास्त्र में कहा गया है— पूर्णाहन्ता स्वरूपिणी जिस देवी में वर्ग के क्रम से आठ ब्राह्मी प्रभृति मातृकाएँ स्थित हैं, आठ मातृका-वर्णों से उत्पन्न होने वाला आठ सिद्धियों की स्वामिनी उस महा- सिद्धिस्वरूपा भगवती की मैं वन्दना करता हूँ ॥ १. तरस्थि—ख. ने. ज. झ. उ. । २. प्रथा—ख. ने. ज. झ. उ. । ३. कायाः**** र्मात्मिकायाः स्थूल—ख. ने. ज. झ. उ. । ४. दक्षरम्—क. ग. । ५. 'स्थूलरूप' नास्ति— ख. ने. ज. उ. । ६. महासिद्धचष्टकं—क. ग. ।

  1. पृ० ९४ की टिप्पणी देखिये।