योगिनी हृदयम् (अमृतानन्दनाथ विमर्शिनी एवं पं. व्रजवल्लभ द्विवेदी सविस्तार सटीक)
Yogini Hridayam with Amritanandanatha Dipika by Vraj Vallabha Dwivedi
अमृतानन्दनाथ (भाष्यकार: पं. व्रजवल्लभ द्विवेदी) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें३१० योगिनीहृदयम् [ पूजासंकेतः त्वगादिव्यापकत्वतः त्वगसृङ्मांसमेदोऽस्थिमज्जाशुक्रौजस ¹आदिशब्देन गृह्यन्ते। तद्व्यापकत्वात् त्वगाधारभ्रूमध्य-रक्तनितम्ब-मांसनाभि-मेदोहृदय- अस्थिकण्ठ-मज्जास्य-शुक्रनासापुट-(क्रोध ? ओजो)ललाटचक्रेषु स्थितत्वाद् ब्राह्मया- दीनाम्। स्थूलविश्व²प्रधात्मनि (इति) स्थूलत्वकथनम्³। अत एव विश्वं प्रकर्षेण धत्त इति विश्वप्रधा⁴ विश्वम्भरा, तदात्मनि भूगृह⁵त्रयात्मके त्रैलोक्य- मोहने चक्रे स्थितत्वात्। मातृकास्थूलरूपत्वाद् ⁶वैखर्यवयवत्वाच्च त्वगादि- ये योगिनियाँ त्वक् आदि ¹आठ स्थूल धातुओं की भी स्वामिनियाँ हैं। आदि शब्द से असृग् (रक्त), मांस, मेदा, अस्थि, मज्जा, शुक्र और ओज का ग्रहण किया जाता है। त्वचा के आधार भ्रूमध्य में, रक्त के आधार नितम्ब में, मांस के आधार नाभि में, मेदा के आधार हृदय में, अस्थि के आधार कण्ठ में, मज्जा के आधार आस्य (मुँह) में, शुक्र के आधार नासापुट में और क्रोध (ओज) के आधार ललाट चक्र में क्रमशः ब्राह्मी आदि योगिनियाँ स्थित हैं। इस कारण से भी ये योगिनियाँ प्रकट कही जाती हैं। स्थूल विश्व का प्रथन करने वाली इन योगिनियों को स्थूल मानना इसलिये भी उचित है कि ये देवियाँ स्थूल विश्व को भलीभाँति ²धारण करने वाली विश्वम्भरा (पृथिवी) स्वरूप भूगृहत्रयात्मक त्रैलोक्यमोहन चक्र में स्थित हैं। इस तरह से मातृकाओं की स्थूलरूपता के कारण, वैखरी मातृका के स्थूल अवयवों के कारण, त्वग् आदि धातुओं के स्थूलशरीर की अवयवता को लेकर इन सबमें व्यापक रूप से रहने के कारण और त्रैलोक्यमोहन १. आदिना गृ-ख. ने. ज. झ. उ. । २. प्रथा-ख. ने. ज. झ. उ. । ३. नात्-क. ग. घ. । ४. प्रथा-ख. ने. ज. झ. उ. । ५. हात्मके-ख. ने. ज. उ. । ६. 'वैखर्य- वयवत्वाच्च' नास्ति-ख. ने. ज. झ. उ. ।
- यहाँ आठ धातुओं की चर्चा है और इनका संबन्ध आठ वर्गों की अधिष्ठात्री ब्राह्मी आदि आठ देवियों से बताया गया है, जो अणिमा आदि आठ सिद्धियों की अधिष्ठात्री हैं। अष्टम धातु के रूप में यहाँ क्रोध (ओज) की चर्चा है। सात्त्विक क्रोध को ही ओज कहा जा सकता है। तेजस्वी पुरुष का ओज कभी कभी क्रोध के रूप में भी प्रकट होता देखा गया है। प्रसंगवश यह अवधेय है कि आयुर्वेद के ग्रन्थों में प्रथम धातु के रूप में रस वर्णित है, त्वक् नहीं। पहले (२।६०-६१) छः धातुओं की जो चर्चा आई है, उनका संबन्ध छः डाकिनियों से है।
- यहाँ दीपिकाकार ने "विश्वं प्रकर्षेण धत्त इति विश्वप्रधा" इस तरह से प्रधा शब्द की व्युत्पत्ति दी है। तदनुसार दीपिका में सर्वत्र प्रथा शब्द के स्थान पर प्रधा शब्द होना चाहिये, किन्तु प्रस्तुत स्थल को छोड़ कर यह पाठ किसी भी मातृका में कहीं भी नहीं मिलता। यहाँ भी मूल ग्रन्थ की अनेक मातृकाओं में 'प्रथा' पाठ ही मिलता है।