योगिनी हृदयम् (अमृतानन्दनाथ विमर्शिनी एवं पं. व्रजवल्लभ द्विवेदी सविस्तार सटीक)
Yogini Hridayam with Amritanandanatha Dipika by Vraj Vallabha Dwivedi
अमृतानन्दनाथ (भाष्यकार: पं. व्रजवल्लभ द्विवेदी) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंतृतीयः ] दीपिकाभाषानुवादसहितम् ३११ धातूनां स्थूलशरीरावयवतया तद्व्यापकत्वात् त्रैलोक्यमोहनचक्रस्य स्थूलविश्वम्भरा- त्मकत्वाच्च १ तदन्तर्गताः सिद्धयो ब्राह्म्याद्याश्च प्रकटा ज्ञेया इत्यर्थः ॥११४॥ अन्त्यभूगृहनिवासिनीनां नामग्रहणपूर्वकं ध्यानमाह— अणिमाद्या महादेवि सिद्धयोऽष्टौ व्यवस्थिताः । तास्तु २ रक्ततरा वर्णैर्वराभयकरास्तथा ॥११५॥ धृतचिन्तामहारत्ना मनीषितफलप्रदाः । अणिमाद्याः "अणिमां पश्चिमद्वारे" (१।१५३) इत्यादि चतुःशती- शास्त्रोक्ताः । लघिमामहिमेशितावशिताप्राकाम्यभुक्तीच्छाप्राप्तिसर्वकामाख्याः ३ सिद्धयस्तत्रादिशब्देन गृह्यन्ते । अष्टौ व्यवस्थिता ४अष्टसिद्धयो निघण्टुप्रसिद्धाः । अत्र तु दशेति तात्पर्यम्— वामजङ्घां समारभ्य वामादिक्रमतोऽपि च । सिद्धयष्टकं न्यसेत् तेषु द्वयं पादतले न्यसेत् ॥ (३।७९-८०) चक्र की स्थूल विश्वम्भरात्मकता (पार्थिवता) के कारण भी इनमें रहने वाली सिद्धियाँ और ब्राह्मी प्रभृति देवियाँ प्रकट योगिनियाँ कही जाती हैं ॥११४॥ अन्तिम भूगृह में रहने वाली शक्तियों के नाम और ध्यान इस प्रकार हैं— हे महादेवि ! अणिमा आदि १आठ सिद्धियाँ यहाँ स्थित हैं। इनका वर्ण चटक लाल है। वर और अभय मुद्रा में ये स्थित हैं। चिन्तामणि नामक महारत्न इनके पास है, जिससे कि ये साधक को अभीष्ट फल प्रदान करती हैं ॥११५-११६॥ चतुःशती शास्त्र (१।१५३-१५५) में अणिमा, लघिमा, महिमा, ईशिता, वशिता, प्राकाम्य, भुक्ति, इच्छा, प्राप्ति और सर्वकामा नाम की दस सिद्धियाँ वर्णित हैं। आदि शब्द से अणिमा तथा अन्य सिद्धियों का ग्रहण किया जाता है। इनमें से आठ सिद्धियाँ निघण्टु (कोश) ग्रन्थों में भी प्रसिद्ध हैं, यहाँ दस सिद्धियाँ वर्णित हैं। न्यास प्रकरण में यहाँ (३।७९-८०) वाम जंघा के वाम भाग से और वाम अन्तराल क्रम से आठ सिद्धियों १. 'च' नास्ति-ख. ने. ज. झ. उ. । २. तासु-क. ख. ग. ने. । ३. ख्यसिद्धयो दशादि-ख. ने. झ. उ. । ४. अष्टौ-ख. ने. ज. झ. उ. । १. दीपिका और सेतुबन्ध दोनों टीकाओं में आठ शब्द को दस का उपलक्षण माना है। यहाँ दस सिद्धियाँ मानी गई हैं, अतः ध्यान भी दसों सिद्धियों का होना चाहिये । आठ वर्गों की अधिष्ठात्री सिद्धियाँ अणिमा आदि आठ ही हैं, अतः उनकी ओर इंगित करने के लिये मूल में आठ शब्द दे दिया गया है।