योगिनी हृदयम् (अमृतानन्दनाथ विमर्शिनी एवं पं. व्रजवल्लभ द्विवेदी सविस्तार सटीक)
Yogini Hridayam with Amritanandanatha Dipika by Vraj Vallabha Dwivedi
अमृतानन्दनाथ (भाष्यकार: पं. व्रजवल्लभ द्विवेदी) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें३१२ योगिनीहृदयम् [ पूजासंकेतः इत्यत्रैवोक्तत्वात्¹। महारत्नं चिन्तामणिः। शेषं² स्पष्टम् ॥११५-११६॥ ब्राह्मयाद्या अपि तत्रैव यष्टव्याः ³क्रमशः प्रिये ॥११६॥ ब्राह्मयाद्याः “ब्रह्माणी पश्चिमद्वारे” (१।१५६) इति चतुःशतीशास्त्रोक्ताः। तत्रैव मध्यचतुरस्रे यष्टव्याः। क्रमशः क्रमेण ॥११६॥ तासां प्रत्येकं⁴ ध्यानमाह— ब्रह्माणी पीतवर्णा च चतुर्भिः शोभिता मुखैः । वरदाऽभयहस्ता च कुण्डिकाक्षस्रगुज्ज्वला⁵ ॥११७॥ करैरिति शेषः। शिष्टं स्पष्टम् ॥११७॥ माहेश्वरी श्वेतवर्णा त्रिनेत्रा शूलधारिणी । कपालमेणं परशुं दधाना पाणिभिः प्रिये ॥११८॥ एकेन पाणिना शूलधारिणी, त्रिभिः कपालमेणं परशुं दधाना ॥११८॥ का तथा बची दो सिद्धियों का पाद तल में न्यास बताया गया है। चिन्तामणि को महा- रत्न माना जाता है। शेष शब्दों का अर्थ स्पष्ट है ॥११५-११६॥ हे प्रिये ! ब्राह्मी प्रभृति देवियों की भी यहीं क्रमशः पूजा करनी चाहिये ॥११६॥ चतुःशती शास्त्र (१।१५६-१५७) में वर्णित ब्रह्माणी आदि देवियों की भी पूजा क्रमशः यहीं मध्य चतुरस्र में करनी चाहिये ॥११६॥ इनमें से प्रत्येक का ध्यान बताते हैं— ब्रह्माणी का वर्ण पीत है। चार मुंह इसकी शोभा बढ़ाते हैं। वर और अभय मुद्रा, कुण्डिका और अक्षमाला से इसके चार हाथ शोभायमान है ॥११७॥ वर, अभय, कुण्डिका और अक्षमाला का संबन्ध 'करैः' शब्द का अध्याहार कर किया जाता है। बाकी का अर्थ स्पष्ट है ॥११७॥ माहेश्वरी का वर्ण श्वेत है। यह तीन नेत्रों वाली है। हे प्रिये ! यह अपने चार हाथों में शूल, कपाल, एण (हिरन) और परशु धारण किये हुए है ॥११८॥ एक हाथ से यह शूल को धारण करती है और बाकी तीन हाथों में कपाल, एण और परशु धारण किये हुए है ॥११८॥ १. वोक्तम्-ख. ने. ज. उ. । २. शिष्टं-ख. ज. झ. उ. । ३. क्रमतः-क. ग. । ४. 'प्रत्येकं' नास्ति-ख. ने. ज. झ. उ. । ५. लसत्करा-ख. ग. ने. ज. झ. ।