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योगिनी हृदयम् (अमृतानन्दनाथ विमर्शिनी एवं पं. व्रजवल्लभ द्विवेदी सविस्तार सटीक)

Yogini Hridayam with Amritanandanatha Dipika by Vraj Vallabha Dwivedi

अमृतानन्दनाथ (भाष्यकार: पं. व्रजवल्लभ द्विवेदी) द्वारा

DevanagariHindipublished485 पृष्ठ

३१२ योगिनीहृदयम् [ पूजासंकेतः इत्यत्रैवोक्तत्वात्¹। महारत्नं चिन्तामणिः। शेषं² स्पष्टम् ॥११५-११६॥ ब्राह्मयाद्या अपि तत्रैव यष्टव्याः ³क्रमशः प्रिये ॥११६॥ ब्राह्मयाद्याः “ब्रह्माणी पश्चिमद्वारे” (१।१५६) इति चतुःशतीशास्त्रोक्ताः। तत्रैव मध्यचतुरस्रे यष्टव्याः। क्रमशः क्रमेण ॥११६॥ तासां प्रत्येकं⁴ ध्यानमाह— ब्रह्माणी पीतवर्णा च चतुर्भिः शोभिता मुखैः । वरदाऽभयहस्ता च कुण्डिकाक्षस्रगुज्ज्वला⁵ ॥११७॥ करैरिति शेषः। शिष्टं स्पष्टम् ॥११७॥ माहेश्वरी श्वेतवर्णा त्रिनेत्रा शूलधारिणी । कपालमेणं परशुं दधाना पाणिभिः प्रिये ॥११८॥ एकेन पाणिना शूलधारिणी, त्रिभिः कपालमेणं परशुं दधाना ॥११८॥ का तथा बची दो सिद्धियों का पाद तल में न्यास बताया गया है। चिन्तामणि को महा- रत्न माना जाता है। शेष शब्दों का अर्थ स्पष्ट है ॥११५-११६॥ हे प्रिये ! ब्राह्मी प्रभृति देवियों की भी यहीं क्रमशः पूजा करनी चाहिये ॥११६॥ चतुःशती शास्त्र (१।१५६-१५७) में वर्णित ब्रह्माणी आदि देवियों की भी पूजा क्रमशः यहीं मध्य चतुरस्र में करनी चाहिये ॥११६॥ इनमें से प्रत्येक का ध्यान बताते हैं— ब्रह्माणी का वर्ण पीत है। चार मुंह इसकी शोभा बढ़ाते हैं। वर और अभय मुद्रा, कुण्डिका और अक्षमाला से इसके चार हाथ शोभायमान है ॥११७॥ वर, अभय, कुण्डिका और अक्षमाला का संबन्ध 'करैः' शब्द का अध्याहार कर किया जाता है। बाकी का अर्थ स्पष्ट है ॥११७॥ माहेश्वरी का वर्ण श्वेत है। यह तीन नेत्रों वाली है। हे प्रिये ! यह अपने चार हाथों में शूल, कपाल, एण (हिरन) और परशु धारण किये हुए है ॥११८॥ एक हाथ से यह शूल को धारण करती है और बाकी तीन हाथों में कपाल, एण और परशु धारण किये हुए है ॥११८॥ १. वोक्तम्-ख. ने. ज. उ. । २. शिष्टं-ख. ज. झ. उ. । ३. क्रमतः-क. ग. । ४. 'प्रत्येकं' नास्ति-ख. ने. ज. झ. उ. । ५. लसत्करा-ख. ग. ने. ज. झ. ।

तृतीयः ] दीपिकाभाषानुवादसहितम् ३१३ कौमारी पीतवर्णा च शक्तितोमरधारिणी । वरदाभयहस्ता च ध्यातव्या ^१परमेश्वरी ॥११९॥ स्पष्टम् ॥११९॥ वैष्णवी श्यामवर्णा च शङ्खचक्रगदाब्जकान्^२ । हस्तपद्मैश्च बिभ्राणा भूषिता दिव्यभूषणैः ॥१२०॥ वाराही श्यामलच्छाया ^३पोत्रिवक्त्रसमुज्ज्वला । हलं च मुसलं खड्गं खेटकं दधती भुजैः ॥१२१॥ स्पष्टम् ॥१२०-१२१॥ ऐन्द्री श्यामलवर्णा च वज्रोत्पललसत्करा । स्पष्टम् ॥१२२॥ चामुण्डा कृष्णवर्णा च शूलं डमरुकं तथा ॥१२२॥ खड्गं वेतालकं चैव दधाना दक्षिणेर्भुजैः^४ । नागखेटकघण्टाख्यान्^५ दधानान्त्यैः कपालकम् ॥१२३॥ कौमारी का वर्ण पीत है। इस परमेश्वरी का ध्यान शक्ति और तोमर धारिणी देवी के रूप में करना चाहिये। इसके अन्य दो हाथ वर और अभय मुद्रा से सुशोभित हैं ॥११९॥ इसका अर्थ स्पष्ट है ॥११९॥ वैष्णवी श्याम वर्ण की है। यह अपने हाथों में शंख, चक्र, गदा और पद्म धारण किये हुए है और दिव्य भूषणों से भूषित है। वाराही श्यामल वर्ण की है, इसका मुह सूकर का है और यह अपनो भुजाओं में हल, मुसल, खड्ग (तलवार) और खेटक (दण्ड) लिये हुए है ॥१२०-१२१॥ अर्थ स्पष्ट है ॥१२०-१-१॥ ऐन्द्री श्यामल वर्ण की है। इसके दोनों हाथों में वज्र और कमल शोभित है ॥ अर्थ स्पष्ट है ॥१२२॥ चामुण्डा कृष्ण वर्ण की है। यह अपने दाहिने चार हाथों में शूल, डमरु, खड्ग और वेताल धारण किये हुए है और बायें चार हाथों में नाग, खेटक, घण्टा और कपाल लिये हुए है ॥१२२-१२३॥ १. च सुरेश्वरि-ख. ने. छ. ज. झ. । २. वराभयान्-क. ग. उ. । ३. पोत्र-क. । ४. णैः करैः-क. ग. । ५. मुण्डाख्यं-ख., घण्टाख्यं-ने. च. छ. । Courtesy: Shri Tarun Dwivedi, Surviving Son of Late Vraj Vallabh Dwivediji (15 Jul 1926 - 17 Feb 2012)

३१४ योगिनीहृदयम् [ पूजासंकेतः वेतालः पिशाचविशेषः । शूलडमरुखङ्गवेतालान् दक्षिणेः करैः, नागखेटक- ^१घण्टाकपालानि वामकरैर्दधानेत्यर्थः ॥१२२-१२३॥ महालक्ष्मीस्तु पीताभा पद्मौ^२ दर्पणमेव च । मातुलुङ्ग^३फलं चैव दधाना परमेश्वरी ॥१२४॥ स्पष्टम् । ननु मुद्रादशकं किमित्यन्तश्चतुरस्रे पूज्यत्वेन ^४नोक्तम् ? सत्यम्, चतुःशतीशास्त्रे^५ऽनुक्तत्वादत्रापि^६ प्राधान्येन^७ नाख्याताः, किन्तु श्रीचक्रन्यासे “मूलाधारे न्यसेन्मुद्रादशकं साधकोत्तमः” (३।७७) इति सूचिताः । अतोऽन्तश्चतु- रस्रे मुद्रादशकमपि पूजयेत् ॥१२४॥ एवं ध्यात्वा यजेदेताश्चक्रेशीं त्रिपुरां ततः । एवम् उक्तप्रकारेण । एताः प्रकटयोगिनीर्ध्यात्वा, चक्रेशीं त्रैलोक्यमोहन- चक्रेशीं त्रिपुरां यजेत् ॥१२५॥ वेताल एक प्रकार का पिशाच है। चामुण्डा के दाहिने हाथों में शूल, डमरु, खड्ग और वेताल तथा बाये हाथों में नाग, खेटक, घण्टा और कपाल सुशोभित हैं ॥१२२- १२३॥ महालक्ष्मी का वर्ण पीत है। इस परमेश्वरी के चार हाथों में से दो में पद्म और बाकी के दो हाथों में दर्पण और मातुलुंग फल (चकोतरा) सुशोभित हैं ॥१२४॥ इसका अर्थ स्पष्ट है । प्रश्न होता है कि चतुरस्र चक्र में दस मुद्राओं का भी पूजन होना चाहिये । उनका यहाँ उल्लेख क्यों नहीं किया गया ? आपका कहना सही है। चतुःशती शास्त्र में मुद्राओं का पूजन नहीं बताया गया है, इसीलिये यहाँ भी उनका उल्लेख नहीं किया गया है, किन्तु श्रीचक्र न्यास प्रकरण में यहाँ (३।७७) मूलाधार में दस मुद्राओं का न्यास बताया गया है। अतः इस चतुरस्र चक्र में ही दस मुद्राओं का भी पूजन करना चाहिये ॥१२४॥ इस तरह से इन प्रकट योगिनियों का ध्यान कर पूजा करे और तब चक्रेशी त्रिपुरा का भी पूजन करे ॥ इस तरह से ऊपर बताई गई विधि से इन प्रकट योगिनियों का ध्यान करके तब त्रैलोक्यमोहन चक्र की स्वामिनी त्रिपुरा की भी पूजा करे ॥१२५॥ १. मुण्डक-ख., घण्टास्थ्य-ने. झ. उ. । २. पद्म-क. ग., पद्मं-उ. । ३. लिङ्ग-क. छ. ज. । ४. नात्रोक्तं-झ. । ५. स्त्रेऽप्यनु-ख. झ. उ. । ६. दत्रैव-ख. झ. उ. । ७. न्येनाख्या तव्याः-ख. ने. ।

तृतीयः ] दीपिकाभाषानुवादसहितम् ३१५ विद्यादेवतयोरभेदविवक्षया च त्रैलोक्यमोहनचक्रेशीविद्यानिर्वचनमाह— कर्मेन्द्रियाणां वैमल्यात् करशुद्धिकरी स्मृता ॥१२५॥ आत्मतत्त्वगतयोरशुद्धयोरत्र कर्मकरणात्मनोर्द्वयोः । शुद्धतत्त्व¹लयभावनामयी शुद्धिरात्मकयोः परा मता ॥ (चि० स्त० ११) इत्यस्मदुक्तरीत्याऽऽत्मतत्त्वस्याशुद्धत्वात् कर्मेन्द्रियाणामप्यात्मतत्त्वान्तःपाति- त्वात् ²करयोश्च कर्मेन्द्रियत्वादशुद्धयोः ³कार्यकरणात्मनोः करयोः कार्ययोः, स्वकारणे शुद्धतत्त्वे शिवाद्वैतलयभावना करशुद्धिः, तत्करीयम् । स्मृता निरुक्ता ॥१२५॥ ⁴कार्यशुद्धिभवा सिद्धिरणिमा चात्र संस्थिता । कारणात्मपरामृष्टकार्य⁵रूपाऽङ्गुलिस्थिताम् । करोमि चिन्मयीं शुद्धिं करयोः ⁶स्पर्शशोधिनीम् ॥ (सु० वा० २४) अब भगवान् यह कहना चाहते हैं कि विद्या और देवता में कोई भेद नहीं है । इसी अभिप्राय से त्रैलोक्यमोहन चक्र की स्वामिनी त्रिपुरा की करशुद्धिकरी विद्या से अभिन्नता बताते हुए उसका निर्वचन करते हैं— कर्मेन्द्रियों को विमल करने वाली यह विद्या करशुद्धिकरी कहलाती है ॥१२५॥ साधक के दोनों हाथों की गिनती कर्मेन्द्रियों में होती है, जो कि अशुद्ध आत्मतत्त्व के अन्तर्गत आते हैं । इनकी शुद्ध शिवस्वरूप में लीन होने की भावना ही उत्कृष्ट शुद्धि मानी जाती है ॥ व्याख्याकार के चिद्विलास स्तव के इस वचन के अनुसार आत्मतत्त्व अशुद्ध है, कर्मेन्द्रियों की गिनती आत्मतत्त्व में ही होती है और हाथ कर्मेन्द्रिय होने से अशुद्ध हैं । इन कार्यकरणात्मक हाथों की शुद्धि यही है कि अपने कारण शुद्ध तत्त्व में, शिवाद्वय- भावना में उनको लीन कर दिया जाय । करशुद्धिकरी विद्या यही कार्य करती है ॥१२५॥ कार्य की शुद्धि से उत्पन्न अणिमा नाम की सिद्धि भी यहीं रहती है ॥ पाञ्चभौतिक देह में कार्यरूप से प्रकट हुई दाहिने और बायें हाथ की अंगुलियाँ वास्तव में अपने कारणभूत प्रकाश और विमर्श से अभिन्न हैं । प्रकाश और विमर्श स्वरूप कारण के रूप में भावना कर मैं इन कार्य रूप में परिणत अंगुलियों में चित्स्वरू- पिणी शुद्धि का आधान कर रहा हूँ, जिससे कि मेरे दोनों हाथ शुद्ध हो जाँय और इनसे मैं जिन पदार्थों का स्पर्श करूँ, वे भी शुद्ध हो जाँय, उनमें किसी प्रकार का स्पर्श दोष न आवे ॥ १. गत-ख. ने. उ. । २. 'करयोश्च' नास्ति-ख. झ. उ. । ३. 'कार्यकरणात्मनोः' नास्ति-ख. झ. उ. । ४. कर-ख. च. ज. । ५. भूता-मु. । ६. परि-मु. ।

३१६ योगिनीहृदयम् [ पूजासंकेतः इत्यभियुक्तवचनोक्तरीत्या कार्यस्य शुद्धिर्नाम कारणतावन्मात्रतया पर्यव- सानम् । "अणोरणीयान्" (क० उ० २।२०) इति श्रुत्युक्ताणीयसि कारणे विद्य- मानस्यात्मनोऽणिमा सिद्धयतीत्यणिमासिद्धिः । सा चात्र त्रैलोक्यमोहने चक्रे स्थितेति तात्पर्यम् ॥१२६॥ द्वितीयचक्रे पूजां सवासनामाह— षोडशस्पन्दसन्दोहे चमत्कृतिमयीः कलाः ॥१२६॥ प्राणादिषोडशानां तु वायूनां प्राणनात्मिकाः । बीजभूताः स्वरात्मत्वात् कलनाद् बीजरूपकाः ॥१२७॥ अन्तरङ्गतया गुप्ता योगिन्यः संव्यवस्थिताः । कामाकर्षणरूपाद्याः सृष्टेः प्राधान्यतः प्रिये ॥१२८॥ सर्वाशापूरणाख्ये तु चक्रे वामेन पूजयेत् । स्पन्दो नाम परायास्तत्त्वरूपेण प्रसारः । तदुक्तं परापञ्चाशिकायाम्— "सिसृक्षोः प्रथमस्पन्दः शिवतत्त्वं प्रभोः स्मृतम्" (श्लो० १८) इति । तेन षोडश शिवानन्द मुनि की इस उक्ति के अनुसार कार्य की शुद्धि यही है कि वह अपने कारण में केवल कारण रूप में ही पर्यवसित (परिणत) हो जाय । कारण ब्रह्म के लिये श्रुति में बताया गया है—"वह अणु से भी अणुतर है"। इस अत्यन्त सूक्ष्म कारण में अवस्थित हो जाने पर साधक को अणिमा सिद्धि प्राप्त हो जाती है। वह सिद्धि त्रैलोक्यमोहन नामक चक्र में स्थित है। इस प्रकरण का यही तात्पर्य है ॥१२६॥ द्वितीय चक्र की पूजा और वासना का अब वर्णन करते हैं— सोलह स्पन्दों के समूह रूप सर्वाशापरिपूरक चक्र में प्राण आदि सोलह पदार्थों में प्राण का संचार करने वाला चमत्कारमय कलाएँ रहती हैं। बीज (बिन्दु) से संयुक्त स्वर इनकी कलना करते हैं, अतः ये कलाएँ बीजस्वरूपिणी हैं। अन्तरङ्ग होने से ये गुप्त योगिनियाँ कहलाती हैं। इनके कामाकर्षिणी आदि नाम हैं। हे प्रिये ! सृष्टि की प्रधानता होने से सर्वाशापरिपूरक चक्र में इनकी पूजा वामावर्त क्रम से होनी चाहिये ॥१२६-१२९॥ परा शक्ति का तत्त्वों के रूप में जो प्रसार होता है, उसे स्पन्द कहते हैं। परा- पंचाशिका में बताया गया है—"सृष्टि करने के लिये उद्यत प्रभु का प्रथम स्पन्द शिव- १. तोति सिद्धिः-ख. ने. ज. झ. उ. । २. प्राणानां-ख. ने. च. छ. ज. झ. । ३. तत्त्व-ख. ने. च. झ. । ४. रूपगाः-ख. ने. च. छ. ज. । ५. प्तयो-ख. ने. च. छ. ज. झ. । ६. संस्थिता मताः-ख. ने. च. छ. ज. झ. । ७. ष्टिप्रा-ख. ने. च. छ. ज. झ. उ. । ८. 'तदुक्तं''''षोडश स्पन्दाः' नास्ति-ख. ने. ज. उ. ।

तृतीयः ] दीपिकाभाषानुवादसहितम् ३१७ स्पन्दाः षोडशविकारा भूतेन्द्रियमनांसि, तेषां सन्दोहः १। चमत्कारो नाम२ तस्मिन् चिदतिशयोदयः । तदुक्तं क्रमोदये—“स्थैर्यमेति३ चमत्कारो विना विषय- संगतिम्” इति । तन्मय्यो भूतेन्द्रियमनःसु चिदनुप्रविष्टाः कलाः षोडश४ स्फुरन्ति, तदात्मिका इत्यर्थः । कलाः षोडशसंख्याकाः कलाभिधानाश्च । प्राण आदिर्येषां तेऽपानोदानसमानव्याननागकूर्मकृकरदेवदत्तधनञ्जया दश प्रसिद्धा वायवः । ५अन्ये षडागमान्तरेषु मृग्याः, तेषां प्राणनात्मिकाः, ६सर्वेषां प्राणना(त्मिकाः?त्मकाः) तत्त्व माना गया है”। तदनुसार षोडश स्पन्द शब्द से यहाँ सोलह विकारों (पाँच महा- भूत और एकादश इन्द्रिय) का ग्रहण किया जाता है। इनका संदोह (समूह) ही सर्वाशा- परिपूरक चक्र के रूप में परिणत होता है। चमत्कार कोई अनोखी वस्तु होती है। क्रमोदय में वर्णित है—"विषयों का सम्पर्क हुए बिना ही चमत्कार, अर्थात् अद्भुत सहजानन्द स्फुरित हो उठता है"। इस चमत्कार से परिपूर्ण चिच्छक्ति सम्पन्न सोलह कलाएँ पाँच महाभूतों और एकादश इन्द्रियों में स्फुरित होकर तदात्मक बन जाती हैं। कला शब्द सोलह संख्या और कला दोनों का वाचक है। प्राण के साथ जुड़ा आदि शब्द अपान, उदान, समान, व्यान, नाग, कूर्म, कृकर, देवदत्त, धनंजय—इन सभी दस वायुओं का द्योतक है। अन्य१ छः वायुओं के नाम अन्य आगमों में खोजने चाहिये । इन प्राणों में भी ये १. सन्दोहः समूहः-ख. ने. ज. झ. उ. । २. नाम कश्चिद-क. । ३. मेव-ख. ने. ज. झ. उ. । ४. षोडशधा-ख. ने. ज. झ. उ. । ५. अन्येष्वग्राग-सार्वत्रिकः पाठः, सेतु- बन्धानुसारी पाठोऽत्र स्थापितः । ६. 'सर्वेषां प्राणनात्मिकाः' नास्ति-ख. ज. झ. उ. ।

  1. सभी मातृकाओं में मिले पाठ के अनुसार यहाँ अर्थ होगा कि इन दस वायुओं के नाम आगमान्तर से जानने चाहिये, किन्तु इनके नाम तो योगिनीहृदय (२।६२) में भी मिलते हैं। इनके लिये कालोत्तर (१०।५-६) आदि अन्य आगमों को देखने की आवश्यकता नहीं है। भास्करराय ने अपनी व्याख्या में दीपिका के इस प्रसंग को उठाया है और वहाँ स्पष्ट लिखा है कि इन दस वायुओं के अतिरिक्त अन्य छः वायुओं के नाम आगमान्तर से जानने चाहिये । तदनुसार हमने दीपिका का संशोधित पाठ मूल में रखा है। किन्तु अन्य किसी भी आगम में उक्त दस वायुओं के अतिरिक्त अन्य छः वायुओं के नाम नहीं मिलते । प्राण की पाँच वृत्तियों की आहंकारिकता की चर्चा हम पहले (२।५९) कर चुके हैं। यह अहंकार की समष्ट्यात्मक वृत्ति है। अहंकार की व्यष्ट्यात्मक वृत्तियाँ सोलह मानी गई हैं, जो कि इनके सात्त्विक, राजस और तामस भेद से प्रकट होती है। दीपिकाकार ने सोलह स्पन्दों के रूप में इन्हीं का ग्रहण किया है, किन्तु भास्करराय पाँच प्राण और एकादश इन्द्रियों की गणना षोडश स्पन्दों में

३१८ योगिनीहृदयम् [ पूजासंकेतः

प्राणादयो हि, (एते तु ? एतास्तु) तेषां प्राणादीनामपि प्राणनात्मिका इत्यर्थः । बीजभूता बिन्दुयुक्तत्वात् । स्वराः षोडश अकारादिविसर्गान्ताः, तदात्मकत्वात् । कलनात् प्रक्रमात् । सबिन्दुकस्वरप्राप्तत्वात् १कलनाद् बीजरूपकाः२ [३स्वस्व- बीजस्वरूपाः । अन्तरङ्गतया षोडशविकाराणां त्वगादिधातुवत् तत्राप्रकटत्वात् तन्मय्यः ।] तन्मया योगिन्यो गुप्ताः ४संव्यवस्थिताः । अन्तरङ्गतया अन्तरङ्गम् अन्तरिन्द्रियं बुद्धिः, तच्चमत्कारमयत्वादेता अप्यन्तरङ्गाः, अत एव गुप्ताः, सर्वाशापूरणाख्ये तु चक्रे, योगिन्य इत्यत्र छान्दसत्वाद् द्वितीयार्थे प्रथमा । कामाकर्षणरूपाद्या “कामाकर्षणरूपां च” (१।१५८) इत्यादि चतुःशतीशास्त्रोक्ताः । सृष्टेः५ प्राधान्यतः सृष्टौ वामचक्रस्यैव प्रधानत्वात्, अस्यैव६ चक्रस्य सृष्टिरूपत्वात् । ७अतस्ता योगिनीर्वमिन पूजयेद् वामावर्तक्रमेण८ पूजयेत् । विकाराः षोडश विलासभूताः । प्राणादि९षोडशवायूनां जगत्प्राणनादिशक्त्यात्मिकाः सबिन्दुषोडशस्वरैराकलिताः प्रत्येकं तन्मयीरन्तरङ्गचिदनुप्रविष्टषोडशविकारतया गुप्ताः कामाकर्षिण्याद्याः कलाः सर्वाशापरिपूरके चक्रे वाममार्गेण पूजयेदित्यर्थः ॥१२६-१२९॥ ही कलाएँ प्राण का संचार करती हैं। बिन्दु से संयुक्त होने से ये बीजात्मक हैं। अकार से विसर्ग पर्यन्त स्वर सोलह हैं। ये सोलह कलाएँ इन स्वरों का ही प्रतिनिधित्व करती हैं। बिन्दु से संयुक्त इन सोलह स्वरों से इनकी पहचान होती है, अतः ये कलारूप योगिनियाँ बीजस्वरूपिणी मानी जाती हैं। ये योगिनियाँ गुप्त रूप से रहती हैं, क्योंकि ये अन्तरङ्ग हैं। बुद्धि भीतर की इन्द्रिय है, उसी के चमत्कार से, अनोखे विस्तार से, इनका निर्माण हुआ है। अतः ये भी अन्तरंग हैं और इसी लिये गुप्त रूप से सर्वाशा- परिपूरक चक्र में रहती हैं। योगिनी शब्द में द्वितीया के अर्थ में प्रथमा विभक्ति का प्रयोग छान्दस है। चतुःशती शास्त्र (१।१५८-१६१) में इन कामाकर्षिणी आदि सोलह कलाओं (योगिनियों) के नाम बताये गये हैं। सृष्टि में वाम चक्र की प्रधानता रहने से और सर्वाशापरिपूरक के सृष्टि चक्र होने से इन योगिनियों की पूजा भी यहाँ वामावर्त क्रम से ही होनी चाहिये। इसका अभिप्राय यह है कि सोलह विकार परा शक्ति के विलास हैं। प्राण आदि सोलह वायुओं में प्राण का संचार करने वाली शक्तियाँ बिन्दुसंयुक्त सोलह स्वरों से आकलित होती हैं और उसी रूप में परिणत हो जाती हैं। अन्तःकरण में चिच्छक्ति के प्रवेश से प्राण आदि सोलह विकारों की सृष्टि होने से ये गुप्त हैं। इन कामाकर्षिणी आदि गुप्त योगिनियों की पूजा वामावर्त क्रम से सर्वाशापरिपूरक चक्र में की जाती है ॥१२६-१२९॥


१. 'कलनाद्' नास्ति-ख. ज. ड. । २. पगाः-ख. ज. उ. । ३. 'स्वस्व'...'तन्मय्यः' नास्ति-ख. ज. झ. उ. । ४. संस्थिताः-ख. ने. ज. झ. । ५. सृष्टिप्रा-ख. ने. ज. झ. उ. । ६. 'एव' नास्ति-ख. ने. ज. झ. उ. । ७. ततस्ताः-ख. ने. ज. झ. उ. । ८. णार्चयेत्- ख. ने. ज. झ. उ. । ९. विदश-ख.

तृतीयः ] दीपिकाभाषानुवादसहितम् ३१९ एतासां ध्यानमाह— पाशाङ्कुशधरा ह्येता रक्ता रक्ताम्बरावृताः ॥१२९॥ स्पष्टम् ॥१२९॥ तच्चक्रदेवतार्चने सिद्धिमाह— प्राणशुद्धिमयी सिद्धिर्लघिमा भोक्तुरात्मनः । “आनीदवातं स्वधया तदेकम्” (ऋ० १०।१२९।२) इति श्रुत्युक्तरीत्या विश्व- प्राणन्२रूपया स्वधया३ सह यदेकरसमयं प्राणिति, तस्मिन् स्वकारणे लयः प्राणा- दीनां वायूनां शुद्धिर्नाम । अत्र प्राणशब्दो वायुमात्रोपलक्षणपरः । तेन वायुलय- लक्षणायां शुद्धौ मनोलयलक्षणः समाधिर्भवति । ततस्तदेकरसभूतस्य भोक्तुरात्मनो जीवस्य यष्टुस्तद्गुणो लघिमा सिद्धिर्भवति ॥१३०॥ त्रिपुरेशी च चक्रेशी पूज्या सर्वोपचारकैः ॥१३०॥ इनका ध्यान बताते हैं— ये सब गुप्त योगिनियाँ रक्त वर्ण की हैं, रक्त वस्त्र पहने हुए हैं और पाश तथा अंकुश धारिणी हैं ॥१२९॥ इसका अर्थ स्पष्ट है ॥१२९॥ इस चक्र में देवता की पूजा करने से यह सिद्धि मिलती है— इस चक्र में निर्दिष्ट देवताओं की पूजा करने वाला साधक प्राण की शुद्धि से उत्पन्न लघिमा सिद्धि को प्राप्त कर लेता है ॥ “उस प्रलयावस्था में वह अकेला ब्रह्म ही बिना प्राण वायु के अपनी स्वधा शक्ति से जीवित था” इस श्रुति के अनुसार विश्व में प्राण का संचार करने वाली अपनी स्वधा शक्ति के साथ एकरस होकर जो अवस्थित है, उस परम कारण में लीन हो जाना ही प्राण आदि वायुओं की शुद्धि मानी जाती है। यहाँ प्राण शब्द समस्त वायुओं का संग्राहक है। इससे समस्त पवनों की लयरूप शुद्धि के हो जाने पर मनोलय स्वरूप समाधि लग जाती है। तब उस परम तत्त्व के साथ समरस हुए साधक जीव को तदनुरूप लघिमा सिद्धि प्राप्त हो जाती है ॥१३०॥ साधक को यहाँ सभी उपचारों से चक्रेश्वरी त्रिपुरेशी की पूजा करनी चाहिये ॥१३०॥ १. करा एताः-ख. ने. च. छ. ज. झ. उ. । २. प्रीणन-ख. ने. ज. । ३. सुधया- ख. ने. झ. उ. ।

३२० योगिनीहृदयम् [ पूजासंकेतः यादृशैरुपचारैः सर्वैर्गन्धादिभिर्मूलदेवी पूजिता, तादृशैरेवोपचारैः सर्वाशा- परि¹पूरणचक्रे चक्रेशी त्रिपुरेशी ²पूजनीयेत्यर्थः ॥१३०॥ तृतीयचक्रे पूजां सवासनामाह— कौलिकानुभवाविष्टभोगपुर्यष्टकाश्रिताः । वाग्भवाष्टकसंबद्धाः सूक्ष्मा वर्गस्वरूपतः ॥१३१॥ तास्तु गुप्ततराः सर्वाः सर्वसंक्षोभणात्मके । अनङ्गकुसुमाद्यास्तु ³कुलं षट्त्रिंशत्तत्त्वात्मकं शरीरम्, तद्विषयानुभवः कृशोऽहं स्थूलोऽहमित्यादि, तेनाविष्टो जीवस्तदाश्रिततया, तस्य भोगपुर्यष्टकम् चितिश्चित्तं च चैतन्यं चेतना⁴द्वयकर्म च । जीवः कला⁵ शरीरं च सूक्ष्मं पुर्यष्टकं मतम् ॥ इति स्वच्छन्दसंग्रहोक्तरीत्या सूक्ष्मपुर्यष्टकम्, तदाश्रिताः । तन्मयतया वाग्भवाना- मैकाराणामष्टकेन संबद्धाः । सूक्ष्मवर्गं वैखरीवर्णाष्टकवर्गम् । तदुक्तं स्वच्छन्द- जिन जिन गन्ध आदि द्रव्यों से मूलदेवी का पूजन किया गया, उन सभी उपचारों से सर्वाशापरिपूरक चक्र में चक्रेश्वरी त्रिपुरेशी की पूजा करनी चाहिये ॥१३०॥ अब तृतीय चक्र में पूजा और वासना का वर्णन करते हैं— कौलिक अनुभव से सम्पन्न साधक के भोगपुर्यष्टक में निवास करने वाली, सूक्ष्म वर्ग के रूप में वाग्भवाष्टक से संबद्ध शक्तियाँ गुप्ततर कहलाती हैं। अनङ्गकुसुमा आदि इन गुप्ततर योगिनियों की पूजा सर्वसंक्षोभण नामक चक्र में करनी चाहिये ॥१३१-१३२॥ ३६ तत्त्वात्मक शरीर को कुल कहते हैं। तद्विषयक अनुभव है—"मैं कृश हूँ, मैं स्थूल हूँ" इत्यादि। जीव इस तरह के अनुभवों से आविष्ट रहता है। इस जीव के भोगपुर्यष्टक, अर्थात् सूक्ष्म पुर्यष्टक का स्वच्छन्दसंग्रह में इस तरह से वर्णन किया गया है— चिति, चित्त, चैतन्य, ज्ञानेन्द्रिय, कर्मेन्द्रिय, जीव, कला और शरीर—इन आठ तत्त्वों को सूक्ष्म पुर्यष्टक माना जाता है ॥ जीव के इस सूक्ष्म पुर्यष्टक में ये गुप्ततर योगिनियाँ छिपी रहती हैं। सूक्ष्म पुर्यष्टक में विद्यमान, अत एव सूक्ष्म पुर्यष्टक स्वरूप ये योगिनियाँ आठ वाग्भव (ऐकार) अक्षरों से १. 'परि' नास्ति-ख. ने. ज. झ. उ. । २. पूज्येति-ख. ने. ज. झ. उ. । ३. 'कुलं....शुभाः । स्पष्टम्' नास्ति-ख. ने. ज. ब. उ. । ४. ह्वय-झ. । ५. कला च देहञ्च-ख. ने. ज. ब. उ. ।

तृतीयः ] दीपिकाभाषानुवादसहितम् ३२१ संग्रहे—"स्थूलं पञ्चाशदाकारं सूक्ष्ममष्टाष्टकं १स्मृतम्" इति। तत्स्वरूपत्वात् तदात्मकत्वात्। गुप्ततराः सूक्ष्मवैखरीवर्णवर्गाष्टकमयत्वादेता अपि सूक्ष्माः, अतो२ऽत्यन्तरङ्गतया गुप्ततरा इत्यर्थः। ताः सर्वा अनङ्गकुसुमाद्याः "अनङ्गकुसुमां पूर्वे" (१।१६३) इत्यादिश्चतुःशतीशास्त्रोक्ताः सर्वसंक्षोभणाख्ये तृतीये चक्रेऽष्ट- दलकमले, पूज्या इति योज्यम् ॥१३१-१३२॥ तासां ध्यानमाह— रक्तकञ्चुकशोभिताः ॥१३२॥ वेणीकृतलसत्केशाश्चापबाणधराः शुभाः। स्पष्टम् ॥१३२-१३३॥ तत्तदाकारबुद्ध्यात्मभोग्यभोक्तुर्महेशितुः ३ ॥१३३॥ पिण्डादिपदविश्रान्तिसौन्दर्यगुणसंयुता। चक्रेश्वरी बुद्धिशुद्धिरूपा च परमेश्वरी ॥१३४॥ महिमासिद्धिरूपा च पूज्या सर्वोपचारकैः। संबद्ध हैं। वैखरी वर्णों के आठ वर्ग सूक्ष्म वर्ग कहलाते हैं। स्वच्छन्दसंग्रह में बताया गया है—"स्थूल वर्ण पचास आकार वाले और सूक्ष्म अष्टाष्टक वर्ग वाले हैं"। ये गुप्ततर योगिनियाँ अष्टवर्गस्वरूपिणी भी हैं। वैखरी वर्णों के सूक्ष्म वर्गाष्टक से सम्बद्ध होने से ये योगिनियाँ भी गुप्ततर हैं, सूक्ष्म हैं। इस तरह से अति अन्तरंग होने से गुप्ततर हैं। चतुःशती शास्त्र (१।१६३-१६४) में वर्णित इन सब अनङ्गकुसुमा आदि योगिनियों की सर्वसंक्षोभण नामक तृतीय चक्र में, अष्टदल कमल में पूजा करनी चाहिये ॥१३१-१३२॥ इनका ध्यान इस तरह से किया जाय— रक्त कंचुक पहने हुए और केशों का जूड़ा बाँधे हुए ये शुभ शक्तियाँ धनुष और बाण धारण किये हुए हैं ॥१३२-१३३॥ अर्थ स्पष्ट है ॥१३२-१३३॥ उन उन विषयों का आकार ग्रहण करने वाली बुद्धि के द्वारा विषयाकार भोग्य पदार्थों का भोक्ता प्रमाता (क्षेत्रज्ञ) यहाँ भूपति माना गया है। उस भूपति को पिण्ड आदि पदों में विश्राम दिलाने वाली यह देवी अपने सौन्दर्य गुण के कारण तृतीय चक्र की स्वामिनी त्रिपुरसुन्दरी के नाम से प्रसिद्ध है। साधक की बुद्धि को शुद्ध करने वाली यह परमेश्वरी महिमा सिद्धि को देने वाली है। तृतीय चक्र में सर्वविध उपचारों से इसकी पूजा करनी चाहिये ॥१३३-१३५॥ १. मतम्-झ.। २. त्यन्तान्त-झ.। ३. महेशितुः-क. ग. छ.। ४. श्वरि-ख. ने. घ. ङ. झ. उ.। २१

३२२ योगिनीहृदयम् [ पूजासंकेतः इन्द्रियद्वारा बहिर्निर्गत्य तत्तदाकारा तत्तदिन्द्रियार्थाकाराकारिता१ बुद्धिरन्तः- करणपरिणतिः, तदात्मानो भोग्याः शब्दस्पर्शरूपरसगन्धाः, तेषां भोक्ता प्रमाता, स एव महीशिता भूपतिः, क्षेत्रज्ञ इति यावत्, तस्य । पिण्डादीनां पिण्डपदरूपरूपा- तीतानां स्थानानां विश्रान्तिः२ रूपातीते तुरीयपदे मुक्तिः । अत्र ३प्रामाणिक- वचनम्— पिण्डे मुक्ताः पदे मुक्ता रूपे मुक्ताः षडानन । रूपातीते तु ये मुक्तास्ते मुक्ता नात्र संशयः ॥ (ज्ञा० का० १।४-५) इति । सैव सौन्दर्यम्४ अनित्याशुचिसंसारलक्षणपरमदौर्भाग्यविदारण५नित्यशुद्धपरम- प्रेमास्पदसर्वस्पृहणीयपरमशिवस्वरूपप्रकाशनमेव सौन्दर्यम्, तदेव गुणः, तेन संयुता । तदेकरसतया चक्रेश्वरी सर्वसंक्षोभणाख्यतृतीयचक्रेश्वरी । कोऽर्थः ? इन्द्रियों के मार्ग से बाहर निकल कर उन उन विषयों के आकार को ग्रहण करने वाली बुद्धि एक प्रकार की अन्तःकरण की वृत्ति है । बाहर निकल कर अन्तःकरण की वृत्ति ने जिन आकारों का स्वरूप ग्रहण किया, वे हैं शब्द, स्पर्श, रूप, रस और गन्धात्मक भोग्य विषय । इनका भोक्ता प्रमाता है, वही इन सबका अधिपति है । इसी को क्षेत्रज्ञ कहा जाता है । इस प्रमाता को पिण्ड, पद, रूप और रूपातीत नामक स्थानों में शान्ति का अनुभव होता है । इसी को मुक्ति भी कहते हैं। रूपातीत नामक तुरीय (चतुर्थ) पद में इसकी अनुभूति होती है। किसी प्रामाणिक व्यक्ति ने कहा है— हे १षडानन ! पिण्ड में, पद में और रूप में भी मुक्तावस्था की अनुभूति अवश्य होती है, किन्तु जो साधक रूपातीत में मुक्त हो गये हैं, उनकी मुक्ति में किसी प्रकार का सन्देह नहीं रह जाता ॥ साधक को मुक्ति की तरफ बढ़ाना ही इस भगवती त्रिपुरसुन्दरी का सौन्दर्य है । यह देवी अनित्य और अपवित्र संसार लक्षण परम दुर्भाग्य को दूर कर नित्य, शुद्ध, परम प्रेमा- स्पद, सर्वस्पृहणीय, परम शिव स्वरूप को प्रकाशित करती है। यही इसका सौन्दर्य है, यही इसका गुण (स्वभाव) है । इस सौन्दर्य गुण से यह सदा संयुक्त है । इस सौन्दर्य गुण से समरस हुई यह चक्रेश्वरी त्रिपुरसुन्दरी सर्वसंक्षोभण नामक तृतीय चक्र की स्वामिनी है । १. 'कारिता' नास्ति-ख. ने. ज. उ. । २. न्ती रूपातीतं तुरीयपदं मुक्तिः-ख. ने. ज. । ३. प्रमाणव-ख. ने. ज. झ. । ४. यं सुन्दरत्वम्-ख. ने. ज. । ५. रणरूप-झ. ।

  1. प्रस्तुत उद्धरण को दीपिकाकार प्रामाणिक व्यक्ति का वचन मानते हैं, किन्तु इसमें आया 'षडानन' संबोधन इसकी आगमिकता को उजागर करता है । क्या इसका अर्थ यहाँ प्रामाणिक व्यक्ति के द्वारा उद्धृत वचन किया जाय ?

तृतीयः ] दीपिकार्याभाषानुवादसहितम् ३२३ १चिन्मयशब्दादिविषयप्रमातुः क्षेत्रज्ञस्य पिण्डपदरूपरूपातीतविश्रान्तिरूपलक्षणा तत्त्रितयपुरातनी तदैकरस्यसौन्दर्यशालिनी त्रिपुरसुन्दरी तृतीयचक्रेश्वरीत्यर्थः । बुद्धिशुद्धिरूपा बुद्धिशुद्धिर्नाम विषयसंसर्गं विहाय निर्विकल्पचिदात्मलयः, तद्रूपा । अत एव महिमासिद्धिरूपा । बुद्धेरविषयोपरागात् चिदात्मनो महिमा २महिमत्वं सिद्ध्यति । तत्सिद्धिरूपा चक्रेश्वरी सर्वोपचारकैः३ पूर्वोक्तैर्गन्धादिभिः४ पूज्या ॥१३३-१३५॥ चतुर्थचक्रे ५सवासनां पूजामाह— द्वादशग्रन्थिभेदेन समुल्लसितसंविदः ॥१३५॥ विसर्गान्तदशावेशाच्छाक्तानभवपूर्वकम् । ग्रन्थिः षट्चक्राणां प्रत्येकमूर्ध्वाधो ग्रन्थिद्वयमिति द्वादश ग्रन्थयः । अत्रैव इसका भाव यह है कि चिन्मय शब्द आदि विषयों के भोक्ता क्षेत्रज्ञ को पिण्ड, पद, रूप और रूपातीत पदों में विश्रान्ति दिलाने वाली, प्रमाता, प्रमाण और प्रमेय की इस त्रिपुटी से परे रहने वाली, इन सब से पुरानी, इन सबकी एकरसता रूपी सौन्दर्य से सम्पन्न यह त्रिपुरसुन्दरी तृतीय चक्र की स्वामिनी है । यह देवी बुद्धि की शुद्धि करने वाली है । बुद्धि की शुद्धि तब होती है, जब कि वह विषयों के सम्पर्क से अलग होकर निर्विकल्प चिदात्मस्वरूप में प्रतिष्ठित हो जाय । यह देवी जीवात्मा की बुद्धि को निर्वि- कल्प स्वरूप में प्रतिष्ठित कर देती है । इसीलिये यह महिमा सिद्धि स्वरूपिणी है । बुद्धि जब बाह्य विषयों के सम्पर्क में नहीं रहती, तब उसके सामने चिदात्मस्वरूप की महिमा आलोकित हो उठती है । महिमा सिद्धि को देने वाली इस तृतीय चक्रेश्वरी की पूर्वोक्त समस्त गन्ध आदि उपचारों से पूजा करनी चाहिये ॥१३३-१३५॥ चतुर्थ चक्र में वासना और पूजा का विधान बताते हैं— ऊपर की ओर उठती हुई कुण्डलिनी शक्ति बारह ग्रन्थियों का भेदन कर जब विसर्गान्त स्थान में प्रविष्ट होती है, तो उस समय जगी शाक्त अनुभूति से आगे बताये वर्णों की उत्पत्ति होती है ॥१३५-१३६॥ छः चक्रों में से प्रत्येक के ऊपर और नीचे दो दो१ ग्रन्थियां हैं । ये सब मिलकर बारह १. विनायक-झ. । २. महत्त्वं-ख. ने. ज. झ. । ३. पचारैः-क. ग. । ४. दिभि- रम्यर्च्या-ख. ने. ज. झ. उ. । ५. पूजां सवासनामाह-ख. ने. ज. झ. उ. । १. माया आदि बारह ग्रन्थियों की चर्चा नेत्रतन्त्र (७।२२-२५) में मिलती है, किन्तु वहाँ छः चक्रों के साथ इनके सम्बन्ध का उल्लेख नहीं मिलता । अर्थरत्नावलीकार (पृ० ६७) भी बारह ग्रन्थियों के भेदन की बात कहते हैं । सौन्दर्यलहरी के टीकाकार लक्ष्मी- धर (श्लो० १४) तीन ही ग्रन्थियां मानते हैं । देखिये—तन्त्रयात्रा, पृ० ४२

३२४ | योगिनीहृदयम् | [ पूजासंकेतः

वक्ष्यति- "द्वादशग्रन्थिभेदेन वर्णान् नाड्यन्तरे प्रिये" (३।१८४) इति । $^१$"यदोल्ल- सति शृङ्गाटपीठात् कुटिलरूपिणी" (४।१२) इति चतुःशतीशास्त्रोक्तरीत्या समुल्लसिताया $^२$उद्गच्छन्त्याः संविदः कुण्डलिन्या द्वादशग्रन्थिभेदेन विसर्गान्त- दशावेशात् । विसर्गः षोडशः स्वरः । तेन विसर्गशब्देन षोडशसंख्या गृह्यते । अतो विसर्गान्तं षोडशान्तम् यत् षोडशकलाकारं भूतान्तं व्योमगं च यत्$^३$ । षोडशान्तमिति ख्यातं व्योमस्थानेन्दुमण्डलम् ॥ इति स्वच्छन्दसंग्रहोक्तरीत्या, तदेव $^४$दशावेशश्चिद्दीपाकारत्वात् तदावेशः, तत्रा- सक्तिः । तदुक्तमत्रैव— "व्योमेन्दुमण्डलासक्ता सुधास्रोतःख्यरूपिणी" (२।७१) इति । शाक्तानुभवपूर्वकम् । मूलोत्थितायाः कुण्डलिन्याः षट्चक्रग्रन्थिसंचयभेद$^५$- क्रमेण व्योमेन्दुमण्डला$^६$सक्तिपरि$^७$कलनमेव शाक्तानुभवः, तत्पूर्वकम् । भावि- वर्णोत्पत्तिरिति क्रियाविशेषणम् ॥१३५-१३६॥

हैं। यहाँ आगे (३।१८४) द्वादश ग्रन्थियों को भेद कर सुषुम्ना नाडी में वर्णों की भावना का उपदेश किया गया है। चतुःशती शास्त्र (४।१२) में बताया गया है— "यह कुटिल आकार वाली कुण्डलिनी जब शृंगाट पीठ से उठती है"। तदनुसार उल्लसित होकर ऊपर उठती हुई यह संवित्स्वरूपा कुण्डलिनी बारह ग्रन्थियों का भेदन कर विसर्गान्त पद में प्रतिष्ठित हो जाती है। विसर्ग सोलहवां स्वर है। तदनुसार विसर्ग शब्द यहाँ सोल- हवीं संख्या का संग्राहक है। अतः विसर्गान्त का अर्थ षोडशान्त होगा। स्वच्छन्दसंग्रह का यह वचन इसमें प्रमाण है— जो सोलह कलाओं के आकार वाला है, सभी भूतों की जिस व्योम में समाप्ति हो गई है, उस परम व्योम में स्थित वह इन्दुमण्डल षोडशान्त के नाम से प्रख्यात है ॥ कुण्डलिनी शक्ति के विसर्गान्त पद में प्रतिष्ठित होने पर साधक का हृदय भी उस दशा से, चिद्रूप दीपक के प्रकाश से, आविष्ट हो जाता है, प्रकाशित हो उठता है। तब वह उसी में लीन हो जाता है। चतुःशती शास्त्र में भी बताया गया है— "परम व्योमगत इन्दुमण्डल में आसक्त यह कुण्डलिनी शक्ति अमृत की वर्षा करने लगती है"। यहाँ साधक का अपना शाक्तानुभव जग जाता है। मूलाधार से उठी कुण्डलिनी शक्ति का षट् चक्र, द्वादश ग्रन्थि भेदन पूर्वक परम व्योमगत इन्दुमण्डल में आसक्ति का अनुभव ही शाक्तानुभव कहलाता है। इस शाक्तावेश की अनुभूति के बाद ही आगे बताये जा रहे वर्णों की उत्पत्ति होती है। 'शाक्तानुभवपूर्वकम्' यहाँ कोई क्रिया नहीं है, अतः क्रिया का यहाँ अध्याहार


१. यदुल्लसति-ख. ने. ज. झ. उ. । २. ऊर्ध्वं ग-ने. । ३. तत्-क. ग. । ४. 'दशा'.... तत्रासक्तिः' इत्यस्य स्थाने 'दशारचिदाधारत्वात् तदावेशस्तदापत्तिः' इति पाठः-ख. ने. ज. झ. उ. । ५. गमने-ने. । ६. सक्त-ख. ने. झ. । ७. कलनात्-क. ख. ग.

तृतीयः ] दीपिकाभाषानुवादसहितम् ३२५ त्रैलोक्यमोहनादिचक्रत्रये वैखरीमयतावासनामुक्त्वा सर्वसौभाग्यदायकादि- चक्रत्रये भूतलिपिमध्यमामयवासनामाह— उन्मेषशक्तिप्रसरैरिरिच्छाशक्तिप्रधानकैः ॥१३६॥ तथैवा¹कुलसंघट्टरुपवर्णचतुष्टयैः । वेद्योष्मरूपसौ²द्यर्णमिश्रेच्छाभावितैरपि ॥१३७॥ कुलशक्तिसमावेशरूपवर्णद्वयान्वितैः । किया जाता है और उसके विशेषण के रूप में 'भाविवर्णोत्पत्ति' इस समस्त पद को जोड़ दिया जाता है ॥ १३५-१३६ ॥ त्रैलोक्यमोहन आदि तीन चक्रों में वैखरी वर्णों की वासना (भावना) बताई गई है, अब सर्वसौभाग्यदायक आदि तीन चक्रों में भूतलिपिमय मध्यमा वाणी के वर्णों की वासना बताते हैं— अकुलसंघट्टरूप, इच्छाशक्ति प्रधान और उन्मेष शक्ति रूप तीन वर्णों से और इनके प्रसार रूप चार वर्णों से, मिश्रेच्छाभावित दो वर्णों से, वेद्योष्म रूप हकार आदि वर्णों से और कुलशक्तिसमावेश रूप दो वर्णों से ¹भूतलिपि के चतुर्दश वर्णात्मक तीन वर्ग बनते हैं ॥ १३६-१३७ ॥ १. तदेवा-क. ग. । २. सावर्णै-ख. ग. ज. ।

  1. शारदातिलक (७।१-४) के आधार पर ९ वर्ग और ४२ वर्ण वाली भूतलिपि का क्रम इस प्रकार बनता है— अ इ उ ऋ ऌ प्रथम वर्ग ए ऐ ओ औ द्वितीय वर्ग ह य र ल व तृतीय वर्ग ङ क ख घ ग चतुर्थ वर्ग ञ च छ झ ज पंचम वर्ग ण ट ठ ढ ड षष्ठ वर्ग न त थ ध द सप्तम वर्ग म प फ भ ब अष्टम वर्ग श ष स नवम वर्ग कामकलाविलास की चिद्वल्ली टीका (पृ० ५०) में भूतलिपि पद का अर्थ मिलता है । योगिनीहृदय के प्रस्तुत प्रकरण में मनुकोण, दशारद्वय तथा वसुकोण चक्रों में इस भूतलिपि का विन्यास-क्रम बताया गया है । कामकलाविलास (श्लोक २७-३१) में भी यह विषय देखा जा सकता है¹।

३२६ योगिनीहृदयम् [ पूजासंकेतः अकुलसंघट्टरूपैः । अकुलं ब्रह्मारन्ध्राधोमुखसितसहस्रदलकमलम्, तत्र- स्थोऽकारः “अकारः सर्ववर्णाग्र्यः प्रकाशः परमः शिवः” इति¹ संकेतपद्धत्युक्तोऽकारः परमशिवात्मकोऽकुलशब्देन लक्ष्यते । तेन संघट्टः संबन्धः, ²तद्रूपैः । इच्छाशक्ति- प्रधानकैः । इच्छाशक्तिरिकारः । उन्मेषशक्तिप्रसरैः । उन्मेषशक्तिरुकारः । तदुक्तं परापञ्चाशिकायाम्— अनुत्तरेच्छे³ उन्मेष आनन्देशनमूनता । क्रियेच्छाज्ञानशक्तीनां सत्ता चोच्छूनता च षट् ।। (श्लो० ३२) इति । कोऽर्थः ? मूलोत्थिताया इच्छाशक्तेः ⁴कुलकुण्डलिन्या अकुलस्थेन अकारेण संघट्टे सत्येकारो जायते । ⁵तस्यैवोन्मेषशक्तिसंघट्टे सत्योकारो जायते । तयोरेवाऽकुल- ब्रह्मारन्ध्र स्थित अधोमुख श्वेत सहस्रदल कमल को अकुल कहा जाता है । इस कमल में विद्यमान अकार भी अकुल कहलाता है । संकेतपद्धति के अनुसार यह अकार प्रकाशा- त्मक परम शिव है और सभी वर्णों का आदि कारण है, अतः यह भी अकुल शब्द से लक्षित होता है । आगे बताये गये सभी वर्ण इससे संबद्ध है । अकार के बाद इन वर्णों में इच्छा शक्ति स्वरूप इकार की प्रधानता रहती है और इसके बाद उन्मेष शक्ति स्वरूप उकार का प्रसार होता है । परापंचाशिका में बताया गया है— क्रिया, इच्छा और ज्ञान शक्ति की की ¹सत्ता से अनुत्तर (अकार), इच्छा (इकार) और उन्मेष (उकार) की तथा उच्छूनता (अंकुरण) से आनन्द (आकार), ईशन (ईकार) और ऊनता (ऊकार) इन छः वर्णों की सृष्टि होती है ॥ ऊपर बताये गये छः वर्णों के बाद चार सन्ध्यक्षरों की उत्पत्ति का क्रम इस प्रकार है— मूलाधार से उठी कुलकुण्डलिनी रूप इच्छाशक्ति (इकार) का जब अकुल स्थित अकार से संघट्ट होता है, तो इससे एकार की उत्पत्ति होती है । उसी अकार का उन्मेष शक्ति (उकार) से संघट्ट होता है, तो ओकार की उत्पत्ति होती है । बाद में इन एकार और ओकार का अकुल (अकार) से संघट्ट होने पर ऐकार और औकार इन दो स्वरों की १. त्युक्तरीत्या-क. ग. उ. । २. 'तद्रूपैः''''शक्तिरुकारः' नास्ति-ख. ने. ब. उ. । ३. च्छा उन्मेषाः-क. । ४. कुलाकुल-ने. उ. । ५. उन्मेषशक्तिरूपायास्तस्या एवाकुल- संघट्टे-ख. ने. ज. झ. उ. ।

  1. सौभाग्यसुधोदय (१।१८-१९) में सत्ता को शिव का तथा उद्रेक को शक्ति का प्रतीक माना गया है । वामा, ज्येष्ठा और रौद्री शक्तियाँ सत्ता के अंश है । इनसे क्रमशः अकार, इकार, उकार की अभिव्यक्ति होती है । इच्छा, ज्ञान और क्रिया शक्तियाँ उद्रेक के अंश हैं । इनसे क्रमशः आकार, ईकार, ऊकार की अभिव्यक्ति होती है । तदनुसार परापंचाशिका में भी इच्छा, ज्ञान और क्रिया शब्द से उपलक्षण के रूप में वामा, ज्येष्ठा और रौद्री का भी ग्रहण कर लेना चाहिये ।

तृतीयः ] दीपिकाभाषानुवादसहितम् ३२७ संघट्टे सत्येकारैकौकारौ जायेते इत्यर्थः । तदुक्तं परापञ्चाशिकायाम्— अनुत्तरानन्दशवती इच्छाशक्तौ नियोजिते । त्रिकोणमय षट्कोणमिच्छायां रूढिमा गते ॥ (श्लो० २४) इति, ते एवोन्मेषयोगेन क्रियाशवितस्फुटं वपुः । उक्तं शक्तित्रिसंघट्टत्रिशूलं द्वैतघस्मरम् ॥ (श्लो० ३५-३६) इति च । मिश्रेच्छाभावितैरपि इच्छेशनान्तरारूढाः स्फुटास्फुटजगन्मयाः । चत्वारः २परतो वर्णाः षण्ढात्मानः प्रचोदिताः ॥ (श्लो० ३३) निष्पत्ति होती है । संघट्ट (सन्धि) से उत्पन्न होने के कारण ये चार स्वर १सन्ध्यक्षर कहलाते हैं । परापंचाशिका में यह विषय इस तरह से वर्णित है— अनुत्तर (अकार) और आनन्द (आकार) शक्ति जब इच्छा शक्ति (इकार) से नियो- जित होती हैं, तो क्रमशः त्रिकोण (एकार) और षट्कोण (ऐकार) का स्वरूप स्पष्ट हो उठता है । उन्हीं अनुत्तर (अकार) और आनन्द (आकार) शक्तियों का उन्मेष शक्ति (उकार) से योग होने पर क्रमशः ओकार और तीन शक्तियों के संघट्ट स्वरूप औकार की निष्पत्ति होती है । यह त्रिशूल (औकार) सारे द्वैतप्रपंच को भस्म कर देने वाला है ॥ मिश्रेच्छाभावित शब्द का अर्थ भी परापंचाशिका की सहायता से जाना जा सकता है । वहाँ बताया गया है— २इच्छा और ईशन के मध्य में आरूढ, स्फुट और अस्फुट (मिश्रित) स्वरूप वाले आगे के चार वर्ण षण्ढ कहे जाते हैं ॥ १. शक्ती-ख. ने. ज. झ., शक्तेः-मु. । २. पुरतो-ख. ने. ज. झ. उ. । १. चार सन्ध्यक्षरों के उत्पत्तिक्रम की तुलना सौभाग्यसुधोदय (१।२२-२३) तथा तन्त्रालोक (३।९३-९७) से कीजिये । ओकार की त्रिशूलता की उपपत्ति तन्त्रालोक (३।१०४-१०५) में बताई गई है । २. सौभाग्यसुधोदय (१।२०-२१) में चार षण्ढ स्वरों की उत्पत्ति की प्रक्रिया स्पष्ट की गई है । तदनुसार प्रकाशात्मक अकार का स्वरूप धारण करने वाला परप्रमाता आदि- शिव अपनी विमर्श शक्ति को जगा कर जब इच्छाशक्ति के सहारे सारे जगत् की सृष्टि करना चाहता है, तो उस समय उसमें ईशन शक्ति का उदय होने लगता है । इच्छा- शक्ति के उन्मेष के बाद और ईशन शक्ति के उन्मेष से पहले, अर्थात् दोनों की अन्तराल अवस्था में मिश्रित स्वरूप वाले चार स्वरों की निष्पत्ति होती है । इनमें ह्रस्व स्वरों क अभिव्यक्ति में इच्छा (इकार) का और दीर्घ स्वरों की अभिव्यक्ति में ईशन (ईकार) का योगदान रहता है । शिक्षा ग्रन्थों और व्याकरण शास्त्र में वर्णों के उच्चारण के स्थानों का वर्णन मिलता है । वहाँ भी इकार और उकार के उच्चारण स्थान के बीच में ऋकार और ऌकार का स्थान माना गया है ।

३२८ योगिनीहृदयम् [ पूजासंकेतः इति परापञ्चाशिकोक्तरीत्याऽकुलेशानाभ्यां मिश्रेण भाविताः षण्ढात्मानः स्थूल- वर्णाः, तैरपि । तत्र ह्रस्वद्वयमेव ग्राह्यम् । अत एवाऽकुल एको वर्णः, इच्छात्मको द्वितीयः, उन्मेषोऽपरः, परं षण्ढं ह्रस्वद्वयं च, एकार-ऐकार-ओकार-औकाराश्चेति नव स्वरा भवन्ति । वेद्योष्मरूपसाद्यवर्णैः१ सत्तावाचिनि बीजे तु सादिमायान्तिमं जगत् । विलुप्तप्रत्ययाकारमेवैतत् परिशिष्यते ॥ (श्लो० ४४) इति परापञ्चाशिकोक्तरीत्या वेद्यस्य षट्त्रिंशत्तत्त्वात्मनः संकल्परूपा ऊष्माणः, “शषसहा ऊष्माणः” इति तन्त्रान्तरवचनात् । एवम्भूतः स आदियस्य हकारस्य स एव वेद्योष्मरूपसादिर्हंकारः, तदाद्यवर्णैः । अत्रैक आदिशब्दोऽध्याहार्यः । कुल- शक्तिसमावेशरूपवर्णद्वयान्वितैः । कुलशक्तिः कुण्डलिनी, तस्याः समावेश उदय- विश्रान्तिस्थानद्वयम् आधारब्रह्मरन्ध्रमयम्, तद्रूपं वर्णद्वयं लकारवकारात्मकम् । इस तरह से अकुल और ईशान के मिश्रण से षण्ढ संज्ञा वाले चार स्थूल वर्णों (ऋ ॠ ऌ ॡ) की उत्पत्ति होती है । उनमें से यहाँ दो ह्रस्व वर्णों का ग्रहण होता है । इस तरह से यहाँ पहला वर्ण अकुल (अकार), दूसरा इच्छात्मक इकार और तीसरा उन्मेष (उकार) है, इसके बाद षण्ढ अक्षरों में से ह्रस्व ऋकार और ऌकार तथा इसके बाद एकार, ऐकार, ओकार, औकार—ये नौ स्वर यहाँ गृहीत होते हैं । इसके बाद वेद्योष्मरूप सादि (हकार आदि) वर्णों की स्थिति मानी जाती है । परापंचाशिका में ही बताया गया है— सत्तावाचक बीज सकार में हकार से १ककार पर्यन्त सारा जगत् छिपा हुआ है । इसमें सत्तावाचक सकार ही बचा रहता है, बाकी सब इसी में विलीन हो जाते हैं ॥ तदनुसार छत्तीस तत्त्व वाले इस वेद्य जगत् के संकल्प स्वरूप हैं ऊष्म वर्ण । व्याक- रण शास्त्र में श ष स ह ये चार अक्षर ऊष्म कहे जाते हैं । वेद्योष्म रूप सादि वर्ण यहाँ हकार है, क्योंकि सकार उस हकार के आदि में है। सादि शब्द से हकार का ग्रहण हो जाता है । पुनः यहाँ आदि पद का अध्याहार कर हकारादि अर्थ करना पड़ता है । इनके साथ कुलशक्ति समावेश रूप दो वर्णों की और स्थिति रहती है । कुलशक्ति का अर्थ है कुण्डलिनी । उसके समावेश के, अर्थात् उदय और विश्रान्ति के दो स्थान हैं— आधार और ब्रह्मरन्ध्र । कुलशक्ति का उदय लकार और विश्रान्ति वकार में होती है । १. सावर्णैः—ख. ग. ज. ।

  1. तन्त्राभिधान (पृ० ३५-४०) में संगृहीत मातृकानिघण्टु (श्लो० १९) में माय शब्द से ककार का ग्रहण किया गया है ।

तृतीयः ] दीपिकाभाषानुवादसहितम् ३२९ "आधारपङ्कजं पीतं चतुष्पत्रं सुकेसरम्" इत्यादिना "पार्थिवं पङ्कजं ह्येतत्" इत्यन्तेन स्वच्छन्दसंग्रहोक्तरीत्याऽऽधारपङ्कजस्य पार्थिवात्मकतया लकारः । ब्रह्मरन्ध्रे १यवादूर्ध्वं कुलपद्मं महेश्वरि । श्वेतं सुकेसरोपेतं सहस्रारमधोमुखम् ॥ ३इत्यादिना व्यापिनी ४केवला शक्तिरमृत्यौघप्रवर्षिणी । इत्यन्तेन स्वच्छन्दसंग्रहोक्तरीत्याऽमृतमयो वकारः । एतद्वर्णद्वयान्वितैः । कोऽर्थः ? कुलशक्तेरिच्छात्मिकायाः कुण्डलिन्या उन्मेषात् षट्चक्रपञ्चगगनद्वादशग्रन्थिभेद- क्रमेणाकुलसमावेशाद् अ इ उ ऋ ऌ ए ऐ ओ औ ह य र व ल इति वर्ण- चतुर्दशकमुत्पद्यते । तदुक्तमागमान्तरे५ भूतलिप्युद्धारप्रसङ्गे—"पञ्च ह्रस्वाः

स्वच्छन्दसंग्रह में आधार पंकज पीत वर्ण, चार पत्र और सुकेसर वाला बताया गया है और कहा गया है कि यह पंकज पार्थिव है। इसके लिये इसका बीज लकार है। स्वच्छन्द- संग्रह के ही— हे महेश्वरि ! ब्रह्मरन्ध्र में एक जौ ऊपर १कुल पद्म है, यह श्वेत वर्ण का है, सुन्दर केसर से सुशोभित है और अधोमुख सहस्रदल वाला है। अमृत की घनघोर वर्षा करने वाली केवल व्यापिनी शक्ति यहाँ स्थित है॥ इन वचनों के अनुसार अमृतमय बीज वकार माना जाता है। इन दो वर्णों के साथ हकार आदि अक्षरों की भी यहाँ स्थिति मानी जाती है। इसका अभिप्राय यह है कि कुलशक्ति, अर्थात् इच्छाशक्तिस्वरूपाणी कुण्डलिनी शक्ति के उन्मेष से, २षट्चक्र, पंच- गगन, द्वादश ग्रन्थि को भेद कर अकुल कमल में प्रवेश करने पर अ इ उ ऋ ऌ ए ऐ ओ औ ह य र व ल इन चौदह वर्णों की उत्पत्ति होती है। भूतलिपि के उद्धार के प्रसंग में

१. वतया-ख. ने. झ. उ. । २. ध्रुवादूर्ध्वं-क. ग. । ३. 'इत्यादिना' नास्ति-क. ग. उ. । ४. केवलं शश्वद''''षिणम्-क. । ५. मसारे-ज., मागारे-झ. उ. । १. पृ० ३५ पर उद्धृत स्वच्छन्दसंग्रह के वचन के अनुसार ऊर्ध्वमुख सहस्रदल पद्म की संज्ञा कुल तथा अधोगत सहस्रदल की संज्ञा अकुल है। प्रस्तुत वचन उसके विपरीत अधोमुख सहस्रदल कमल को कुल नाम देता है। अन्यत्र शक्ति को कुल तथा शिव को अकुल कहा गया है। तदनुसार ब्रह्मरन्ध्र स्थित कमल की अकुल संज्ञा ही होनी चाहिये । दीपिकाकार ने भी पृ० ३२६ पर यही व्याख्या की है। 'यवादूर्ध्वेदुकुल' पाठ मानने पर यह विसंगति दूर हो सकती है । २. छः चक्र, पाँच गगन (शून्य) तथा बारह ग्रन्थियों का विवरण योगशास्त्र के अनेक ग्रन्थों में दिया गया है। नेत्रतन्त्र के सप्तम अधिकार में भी इनका वर्णन है।

३३० योगिनीहृदयम् [ पूजासंकेतः सन्धिवर्णा ¹व्योमेराग्निजलं धरा" (शा० ति० ७।२)। इति तन्मयं चतुर्दशारचक्र- मित्यर्थः ।।१३६-१३८।। सम्प्रदायक्रमायातसौभाग्यदायकशब्दयोर्वासनामाह— शक्तेः सारमयत्वेन प्रसृतत्वान्महेश्वरि ।।१३८।। सम्प्रदायक्रमायाताश्चक्रे सौभाग्यदायके² । शक्तेरिच्छाशक्तेः कुण्डलिन्याः, सारः प्रसारः, पूर्वोक्तरीत्याऽकुलस्थानस्थाऽ- नुत्तरशिवसंसर्गः, तन्मयत्वेन तदुत्पन्नतत्वात्, एतेषां वर्णानां तैर्वर्णैः प्रसृतत्वात् सर्वसंक्षोभिण्यादिशक्तीनां सम्प्रदायक्रमायातत्वम्, "सम्प्रदायो महाबोधरूपो गुरुमुखे स्थितः" (२।३६) इति पूर्वोक्तरीत्या गुरु³मुखादधिगतत्वाद् वर्णोत्पत्तेः । आसां च तन्मयत्वम् । अत एव ⁴ताः सम्प्रदायक्रमायाता इत्यर्थः ।।१३८-१३९।। ¹आगमान्तर (शारदातिलक) में पाँच ह्रस्व स्वर, चार सन्धि वर्ण और आकाश, वायु, अग्नि, जल तथा पृथिवी वाचक पाँच वर्णों के रूप में इनका उद्धार किया गया है । चतु- र्दशार चक्र इन चौदह भूतलिपि वर्णों से सम्पन्न है ।।१३६-१३८।। अब सम्प्रदायक्रमायात और सौभाग्यदायक शब्दों की वासना बताते हैं— हे महेश्वरि ! कुण्डलिनी शक्ति के प्रसार से उत्पन्न होने के कारण सर्व- संक्षोभिणी आदि शक्तियों के स्वरूप का ज्ञान सम्प्रदाय से ही, गुरु-परम्परा से ही प्राप्त हो सकता है । अतः सर्वसंक्षोभिणी आदि सम्प्रदाय योगिनियों की सौभाग्यदायक चक्र में पूजा करनी चाहिये ।।१३८-१३९।। शक्ति का, इच्छा शक्ति कुण्डलिनी का, प्रसार ऊपर बताई गई पद्धति से अकुल स्थानगत अनुत्तर शिव पर्यन्त होता है । कुल कुण्डलिनी और अकुल शिव के संपर्क से ही समस्त वर्णों की उत्पत्ति मानी जाती है । ऊपर बताये गये चौदह भूतलिपि वर्णों से सर्वसंक्षोभिणी आदि चौदह शक्तियों का स्वरूप बनता है, इसका ज्ञान सम्प्रदाय क्रम से ही प्राप्त हो सकता है । यहाँ पहले ही बताया गया है कि सम्प्रदाय क्रम से प्राप्त होने वाला उत्तम ज्ञान गुरु के मुँह में विद्यमान है (२।२६) । इस तरह से वर्ण की उत्पत्ति की प्रक्रिया का ज्ञान गुरुमुख से ही प्राप्त हो सकता है और ये सर्वसंक्षोभिणी आदि १. द्योर्वाय्व-क. ग. ने. । २. कारके-ने. ज. झ. उ. । ३. वक्त्रावगतत्वाद्-ख. ने. ज. ञ. झ. उ. ४. एताः-ख. झ. ।

  1. आगमान्तर के नाम से उद्धृत यह श्लोक शारदातिलक (७।२) में मिलता है । इससे शारदातिलककार की स्थिति अमृतानन्द से पहले मानी जायगी । इस प्रसंग में लुप्ता० उपो० के पृ० ४६ की टिप्पणी देखिये । दीपिकाकार के अनुसार शारदातिलक आगमान्तर है । अतः इसको श्रीसम्प्रदाय का ग्रन्थ नहीं माना जा सकता ।

तृतीयः ] दीपिकाभाषानुवादसहितम् ३३१ निरन्तरप्रथोरूपसौभाग्यबलयोगतः ॥१३९॥ अन्वर्थसंज्ञके देवि अणिमासदृशाः² शुभाः । सर्वसंक्षोभिणीपूर्वा देहाक्षादिशुद्धिदा ॥१४०॥ ईशित्वसिद्धिरपि च प्रोक्तरूपे पुरत्रये । योगादिक्लेशभेदेन सिद्धा त्रिपुरवासिनी ॥१४१॥ एताः सम्पूजयेद् देवि सर्वाः सर्वोपचारकैः । अणिमासदृशाः "तास्तु रक्ततरा वर्णैः” (३।११५) इत्यादिपूर्वोक्ता³ अणिमा- सिद्धिसदृशरूपाः । सर्वसंक्षोभिणीपूर्वाः “सर्वसंक्षोभिणी शक्तिः” (१।१६५) इत्यादिचतुःशतीशास्त्रोक्ताः । निरन्तरप्रथा⁴ शिवा द्वैतभावना, ⁵सैव सौभाग्यम्, परमसुभगपरमप्रेमास्पदपरशिवाभेदगोचरत्वात्, तदेव बलं शक्तिः, तद्योगातः अनित्याशुचिरूपपरमदुर्भगसंवंजुगुप्साभेदलक्षणसंसारपरिपन्थिपरमप्रेमास्पदसर्व- स्पृहणीयपरमसुभगपरमशिवाहन्तालक्षणसौभाग्यप्रतिपादकशक्तिसंयोगात् । अन्वर्थ- शक्तियां उन्हीं वर्णों से अभिव्यक्त होती हैं, अतः इन शक्तियों को सम्प्रदाय योगिनियों के नाम से जाना जाता है ॥१३८-१३९॥ हे देवि ! अणिमा सिद्धि के समान रूपवाली और कल्याणकारिणी सर्वसंक्षो- भिणी आदि शक्तियाँ निरन्तर प्रथा रूप सौभाग्य-बल से सम्पन्न होने के कारण अन्वर्थसंज्ञक सौभाग्यदायक चक्र में पूजी जाती हैं। देह, इन्द्रिय आदि को विशुद्ध करने वाली ईशित्व सिद्धि को, प्रोक्तरूप पुरत्रय में योग आदि के क्लेशों का भेदन करने वाली त्रिपुरवासिनी की और इन सब देवियों की पहले बताये गये सभी प्रकार के उपचारों से सविधि पूजा करनी चाहिये ॥१३९-१४२॥ अणिमा आदि सिद्धियों के विषय में पहले (३।११५) बताया गया है कि इनका वर्ण चटक लाल है। वैसा ही रूप इन सर्वसंक्षोभिणी आदि देवियों का भी है। इनके नाम चतुःशती शास्त्र (१।१६५-१६८) में बताये गये हैं। निरन्तर प्रथा का अर्थ है शिवा द्वैत- भावना । इसी का नाम है सौभाग्य, क्योंकि परम सुभग परम प्रेमास्पद परम शिव से यह अभेद स्थापित करने वाला है। इस सौभाग्य के बल (शक्ति) के योग से, अनित्य अशुचि- रूप परम दुर्भग सभी के लिये जुगुप्सा (घृणा) के योग्य भेददृष्टिप्रधान इस संसार के परिपन्थी (शत्रु) परम प्रेमास्पद सर्वस्पृहणीय परम सुभग परम शिव के साथ अभेद दृष्टि को स्थापित करने वाली परम सौभाग्य को प्राप्त कराने वाली शक्ति के सम्पर्क से, अन्वर्थ १. प्रथा-क. ग. । २. सदृशीः-ख. ने. च. छ. ज. झ. । ३. क्ताणिमादिसिद्धि- सदृशीः-ख. ने. ज. झ. उ. । ४. प्रथा-क. ग., अन्तरभेदो निरन्तरप्रथा-ख. ने. ज. झ. उ. । ५. 'सैव' नास्ति-ख. ने. ज. झ. उ. ।