भारतकोश
योगिनी हृदयम् (अमृतानन्दनाथ विमर्शिनी एवं पं. व्रजवल्लभ द्विवेदी सविस्तार सटीक)

योगिनी हृदयम् (अमृतानन्दनाथ विमर्शिनी एवं पं. व्रजवल्लभ द्विवेदी सविस्तार सटीक)

Yogini Hridayam with Amritanandanatha Dipika by Vraj Vallabha Dwivedi

अमृतानन्दनाथ (भाष्यकार: पं. व्रजवल्लभ द्विवेदी) द्वारा

DevanagariHindipublished485 पृष्ठ

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३२८ योगिनीहृदयम् [ पूजासंकेतः इति परापञ्चाशिकोक्तरीत्याऽकुलेशानाभ्यां मिश्रेण भाविताः षण्ढात्मानः स्थूल- वर्णाः, तैरपि । तत्र ह्रस्वद्वयमेव ग्राह्यम् । अत एवाऽकुल एको वर्णः, इच्छात्मको द्वितीयः, उन्मेषोऽपरः, परं षण्ढं ह्रस्वद्वयं च, एकार-ऐकार-ओकार-औकाराश्चेति नव स्वरा भवन्ति । वेद्योष्मरूपसाद्यवर्णैः१ सत्तावाचिनि बीजे तु सादिमायान्तिमं जगत् । विलुप्तप्रत्ययाकारमेवैतत् परिशिष्यते ॥ (श्लो० ४४) इति परापञ्चाशिकोक्तरीत्या वेद्यस्य षट्त्रिंशत्तत्त्वात्मनः संकल्परूपा ऊष्माणः, “शषसहा ऊष्माणः” इति तन्त्रान्तरवचनात् । एवम्भूतः स आदियस्य हकारस्य स एव वेद्योष्मरूपसादिर्हंकारः, तदाद्यवर्णैः । अत्रैक आदिशब्दोऽध्याहार्यः । कुल- शक्तिसमावेशरूपवर्णद्वयान्वितैः । कुलशक्तिः कुण्डलिनी, तस्याः समावेश उदय- विश्रान्तिस्थानद्वयम् आधारब्रह्मरन्ध्रमयम्, तद्रूपं वर्णद्वयं लकारवकारात्मकम् । इस तरह से अकुल और ईशान के मिश्रण से षण्ढ संज्ञा वाले चार स्थूल वर्णों (ऋ ॠ ऌ ॡ) की उत्पत्ति होती है । उनमें से यहाँ दो ह्रस्व वर्णों का ग्रहण होता है । इस तरह से यहाँ पहला वर्ण अकुल (अकार), दूसरा इच्छात्मक इकार और तीसरा उन्मेष (उकार) है, इसके बाद षण्ढ अक्षरों में से ह्रस्व ऋकार और ऌकार तथा इसके बाद एकार, ऐकार, ओकार, औकार—ये नौ स्वर यहाँ गृहीत होते हैं । इसके बाद वेद्योष्मरूप सादि (हकार आदि) वर्णों की स्थिति मानी जाती है । परापंचाशिका में ही बताया गया है— सत्तावाचक बीज सकार में हकार से १ककार पर्यन्त सारा जगत् छिपा हुआ है । इसमें सत्तावाचक सकार ही बचा रहता है, बाकी सब इसी में विलीन हो जाते हैं ॥ तदनुसार छत्तीस तत्त्व वाले इस वेद्य जगत् के संकल्प स्वरूप हैं ऊष्म वर्ण । व्याक- रण शास्त्र में श ष स ह ये चार अक्षर ऊष्म कहे जाते हैं । वेद्योष्म रूप सादि वर्ण यहाँ हकार है, क्योंकि सकार उस हकार के आदि में है। सादि शब्द से हकार का ग्रहण हो जाता है । पुनः यहाँ आदि पद का अध्याहार कर हकारादि अर्थ करना पड़ता है । इनके साथ कुलशक्ति समावेश रूप दो वर्णों की और स्थिति रहती है । कुलशक्ति का अर्थ है कुण्डलिनी । उसके समावेश के, अर्थात् उदय और विश्रान्ति के दो स्थान हैं— आधार और ब्रह्मरन्ध्र । कुलशक्ति का उदय लकार और विश्रान्ति वकार में होती है । १. सावर्णैः—ख. ग. ज. ।

  1. तन्त्राभिधान (पृ० ३५-४०) में संगृहीत मातृकानिघण्टु (श्लो० १९) में माय शब्द से ककार का ग्रहण किया गया है ।