योगिनी हृदयम् (अमृतानन्दनाथ विमर्शिनी एवं पं. व्रजवल्लभ द्विवेदी सविस्तार सटीक)
Yogini Hridayam with Amritanandanatha Dipika by Vraj Vallabha Dwivedi
अमृतानन्दनाथ (भाष्यकार: पं. व्रजवल्लभ द्विवेदी) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंतृतीयः ] दीपिकाभाषानुवादसहितम् ३२९ "आधारपङ्कजं पीतं चतुष्पत्रं सुकेसरम्" इत्यादिना "पार्थिवं पङ्कजं ह्येतत्" इत्यन्तेन स्वच्छन्दसंग्रहोक्तरीत्याऽऽधारपङ्कजस्य पार्थिवात्मकतया लकारः । ब्रह्मरन्ध्रे १यवादूर्ध्वं कुलपद्मं महेश्वरि । श्वेतं सुकेसरोपेतं सहस्रारमधोमुखम् ॥ ३इत्यादिना व्यापिनी ४केवला शक्तिरमृत्यौघप्रवर्षिणी । इत्यन्तेन स्वच्छन्दसंग्रहोक्तरीत्याऽमृतमयो वकारः । एतद्वर्णद्वयान्वितैः । कोऽर्थः ? कुलशक्तेरिच्छात्मिकायाः कुण्डलिन्या उन्मेषात् षट्चक्रपञ्चगगनद्वादशग्रन्थिभेद- क्रमेणाकुलसमावेशाद् अ इ उ ऋ ऌ ए ऐ ओ औ ह य र व ल इति वर्ण- चतुर्दशकमुत्पद्यते । तदुक्तमागमान्तरे५ भूतलिप्युद्धारप्रसङ्गे—"पञ्च ह्रस्वाः
स्वच्छन्दसंग्रह में आधार पंकज पीत वर्ण, चार पत्र और सुकेसर वाला बताया गया है और कहा गया है कि यह पंकज पार्थिव है। इसके लिये इसका बीज लकार है। स्वच्छन्द- संग्रह के ही— हे महेश्वरि ! ब्रह्मरन्ध्र में एक जौ ऊपर १कुल पद्म है, यह श्वेत वर्ण का है, सुन्दर केसर से सुशोभित है और अधोमुख सहस्रदल वाला है। अमृत की घनघोर वर्षा करने वाली केवल व्यापिनी शक्ति यहाँ स्थित है॥ इन वचनों के अनुसार अमृतमय बीज वकार माना जाता है। इन दो वर्णों के साथ हकार आदि अक्षरों की भी यहाँ स्थिति मानी जाती है। इसका अभिप्राय यह है कि कुलशक्ति, अर्थात् इच्छाशक्तिस्वरूपाणी कुण्डलिनी शक्ति के उन्मेष से, २षट्चक्र, पंच- गगन, द्वादश ग्रन्थि को भेद कर अकुल कमल में प्रवेश करने पर अ इ उ ऋ ऌ ए ऐ ओ औ ह य र व ल इन चौदह वर्णों की उत्पत्ति होती है। भूतलिपि के उद्धार के प्रसंग में
१. वतया-ख. ने. झ. उ. । २. ध्रुवादूर्ध्वं-क. ग. । ३. 'इत्यादिना' नास्ति-क. ग. उ. । ४. केवलं शश्वद''''षिणम्-क. । ५. मसारे-ज., मागारे-झ. उ. । १. पृ० ३५ पर उद्धृत स्वच्छन्दसंग्रह के वचन के अनुसार ऊर्ध्वमुख सहस्रदल पद्म की संज्ञा कुल तथा अधोगत सहस्रदल की संज्ञा अकुल है। प्रस्तुत वचन उसके विपरीत अधोमुख सहस्रदल कमल को कुल नाम देता है। अन्यत्र शक्ति को कुल तथा शिव को अकुल कहा गया है। तदनुसार ब्रह्मरन्ध्र स्थित कमल की अकुल संज्ञा ही होनी चाहिये । दीपिकाकार ने भी पृ० ३२६ पर यही व्याख्या की है। 'यवादूर्ध्वेदुकुल' पाठ मानने पर यह विसंगति दूर हो सकती है । २. छः चक्र, पाँच गगन (शून्य) तथा बारह ग्रन्थियों का विवरण योगशास्त्र के अनेक ग्रन्थों में दिया गया है। नेत्रतन्त्र के सप्तम अधिकार में भी इनका वर्णन है।