भारतकोश
योगिनी हृदयम् (अमृतानन्दनाथ विमर्शिनी एवं पं. व्रजवल्लभ द्विवेदी सविस्तार सटीक)

योगिनी हृदयम् (अमृतानन्दनाथ विमर्शिनी एवं पं. व्रजवल्लभ द्विवेदी सविस्तार सटीक)

Yogini Hridayam with Amritanandanatha Dipika by Vraj Vallabha Dwivedi

अमृतानन्दनाथ (भाष्यकार: पं. व्रजवल्लभ द्विवेदी) द्वारा

DevanagariHindipublished485 पृष्ठ

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पृष्ठ 378

३३० योगिनीहृदयम् [ पूजासंकेतः सन्धिवर्णा ¹व्योमेराग्निजलं धरा" (शा० ति० ७।२)। इति तन्मयं चतुर्दशारचक्र- मित्यर्थः ।।१३६-१३८।। सम्प्रदायक्रमायातसौभाग्यदायकशब्दयोर्वासनामाह— शक्तेः सारमयत्वेन प्रसृतत्वान्महेश्वरि ।।१३८।। सम्प्रदायक्रमायाताश्चक्रे सौभाग्यदायके² । शक्तेरिच्छाशक्तेः कुण्डलिन्याः, सारः प्रसारः, पूर्वोक्तरीत्याऽकुलस्थानस्थाऽ- नुत्तरशिवसंसर्गः, तन्मयत्वेन तदुत्पन्नतत्वात्, एतेषां वर्णानां तैर्वर्णैः प्रसृतत्वात् सर्वसंक्षोभिण्यादिशक्तीनां सम्प्रदायक्रमायातत्वम्, "सम्प्रदायो महाबोधरूपो गुरुमुखे स्थितः" (२।३६) इति पूर्वोक्तरीत्या गुरु³मुखादधिगतत्वाद् वर्णोत्पत्तेः । आसां च तन्मयत्वम् । अत एव ⁴ताः सम्प्रदायक्रमायाता इत्यर्थः ।।१३८-१३९।। ¹आगमान्तर (शारदातिलक) में पाँच ह्रस्व स्वर, चार सन्धि वर्ण और आकाश, वायु, अग्नि, जल तथा पृथिवी वाचक पाँच वर्णों के रूप में इनका उद्धार किया गया है । चतु- र्दशार चक्र इन चौदह भूतलिपि वर्णों से सम्पन्न है ।।१३६-१३८।। अब सम्प्रदायक्रमायात और सौभाग्यदायक शब्दों की वासना बताते हैं— हे महेश्वरि ! कुण्डलिनी शक्ति के प्रसार से उत्पन्न होने के कारण सर्व- संक्षोभिणी आदि शक्तियों के स्वरूप का ज्ञान सम्प्रदाय से ही, गुरु-परम्परा से ही प्राप्त हो सकता है । अतः सर्वसंक्षोभिणी आदि सम्प्रदाय योगिनियों की सौभाग्यदायक चक्र में पूजा करनी चाहिये ।।१३८-१३९।। शक्ति का, इच्छा शक्ति कुण्डलिनी का, प्रसार ऊपर बताई गई पद्धति से अकुल स्थानगत अनुत्तर शिव पर्यन्त होता है । कुल कुण्डलिनी और अकुल शिव के संपर्क से ही समस्त वर्णों की उत्पत्ति मानी जाती है । ऊपर बताये गये चौदह भूतलिपि वर्णों से सर्वसंक्षोभिणी आदि चौदह शक्तियों का स्वरूप बनता है, इसका ज्ञान सम्प्रदाय क्रम से ही प्राप्त हो सकता है । यहाँ पहले ही बताया गया है कि सम्प्रदाय क्रम से प्राप्त होने वाला उत्तम ज्ञान गुरु के मुँह में विद्यमान है (२।२६) । इस तरह से वर्ण की उत्पत्ति की प्रक्रिया का ज्ञान गुरुमुख से ही प्राप्त हो सकता है और ये सर्वसंक्षोभिणी आदि १. द्योर्वाय्व-क. ग. ने. । २. कारके-ने. ज. झ. उ. । ३. वक्त्रावगतत्वाद्-ख. ने. ज. ञ. झ. उ. ४. एताः-ख. झ. ।

  1. आगमान्तर के नाम से उद्धृत यह श्लोक शारदातिलक (७।२) में मिलता है । इससे शारदातिलककार की स्थिति अमृतानन्द से पहले मानी जायगी । इस प्रसंग में लुप्ता० उपो० के पृ० ४६ की टिप्पणी देखिये । दीपिकाकार के अनुसार शारदातिलक आगमान्तर है । अतः इसको श्रीसम्प्रदाय का ग्रन्थ नहीं माना जा सकता ।