भारतकोश
योगिनी हृदयम् (अमृतानन्दनाथ विमर्शिनी एवं पं. व्रजवल्लभ द्विवेदी सविस्तार सटीक)

योगिनी हृदयम् (अमृतानन्दनाथ विमर्शिनी एवं पं. व्रजवल्लभ द्विवेदी सविस्तार सटीक)

Yogini Hridayam with Amritanandanatha Dipika by Vraj Vallabha Dwivedi

अमृतानन्दनाथ (भाष्यकार: पं. व्रजवल्लभ द्विवेदी) द्वारा

DevanagariHindipublished485 पृष्ठ

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तृतीयः ] दीपिकाभाषानुवादसहितम् ३३१ निरन्तरप्रथोरूपसौभाग्यबलयोगतः ॥१३९॥ अन्वर्थसंज्ञके देवि अणिमासदृशाः² शुभाः । सर्वसंक्षोभिणीपूर्वा देहाक्षादिशुद्धिदा ॥१४०॥ ईशित्वसिद्धिरपि च प्रोक्तरूपे पुरत्रये । योगादिक्लेशभेदेन सिद्धा त्रिपुरवासिनी ॥१४१॥ एताः सम्पूजयेद् देवि सर्वाः सर्वोपचारकैः । अणिमासदृशाः "तास्तु रक्ततरा वर्णैः” (३।११५) इत्यादिपूर्वोक्ता³ अणिमा- सिद्धिसदृशरूपाः । सर्वसंक्षोभिणीपूर्वाः “सर्वसंक्षोभिणी शक्तिः” (१।१६५) इत्यादिचतुःशतीशास्त्रोक्ताः । निरन्तरप्रथा⁴ शिवा द्वैतभावना, ⁵सैव सौभाग्यम्, परमसुभगपरमप्रेमास्पदपरशिवाभेदगोचरत्वात्, तदेव बलं शक्तिः, तद्योगातः अनित्याशुचिरूपपरमदुर्भगसंवंजुगुप्साभेदलक्षणसंसारपरिपन्थिपरमप्रेमास्पदसर्व- स्पृहणीयपरमसुभगपरमशिवाहन्तालक्षणसौभाग्यप्रतिपादकशक्तिसंयोगात् । अन्वर्थ- शक्तियां उन्हीं वर्णों से अभिव्यक्त होती हैं, अतः इन शक्तियों को सम्प्रदाय योगिनियों के नाम से जाना जाता है ॥१३८-१३९॥ हे देवि ! अणिमा सिद्धि के समान रूपवाली और कल्याणकारिणी सर्वसंक्षो- भिणी आदि शक्तियाँ निरन्तर प्रथा रूप सौभाग्य-बल से सम्पन्न होने के कारण अन्वर्थसंज्ञक सौभाग्यदायक चक्र में पूजी जाती हैं। देह, इन्द्रिय आदि को विशुद्ध करने वाली ईशित्व सिद्धि को, प्रोक्तरूप पुरत्रय में योग आदि के क्लेशों का भेदन करने वाली त्रिपुरवासिनी की और इन सब देवियों की पहले बताये गये सभी प्रकार के उपचारों से सविधि पूजा करनी चाहिये ॥१३९-१४२॥ अणिमा आदि सिद्धियों के विषय में पहले (३।११५) बताया गया है कि इनका वर्ण चटक लाल है। वैसा ही रूप इन सर्वसंक्षोभिणी आदि देवियों का भी है। इनके नाम चतुःशती शास्त्र (१।१६५-१६८) में बताये गये हैं। निरन्तर प्रथा का अर्थ है शिवा द्वैत- भावना । इसी का नाम है सौभाग्य, क्योंकि परम सुभग परम प्रेमास्पद परम शिव से यह अभेद स्थापित करने वाला है। इस सौभाग्य के बल (शक्ति) के योग से, अनित्य अशुचि- रूप परम दुर्भग सभी के लिये जुगुप्सा (घृणा) के योग्य भेददृष्टिप्रधान इस संसार के परिपन्थी (शत्रु) परम प्रेमास्पद सर्वस्पृहणीय परम सुभग परम शिव के साथ अभेद दृष्टि को स्थापित करने वाली परम सौभाग्य को प्राप्त कराने वाली शक्ति के सम्पर्क से, अन्वर्थ १. प्रथा-क. ग. । २. सदृशीः-ख. ने. च. छ. ज. झ. । ३. क्ताणिमादिसिद्धि- सदृशीः-ख. ने. ज. झ. उ. । ४. प्रथा-क. ग., अन्तरभेदो निरन्तरप्रथा-ख. ने. ज. झ. उ. । ५. 'सैव' नास्ति-ख. ने. ज. झ. उ. ।