भारतकोश
योगिनी हृदयम् (अमृतानन्दनाथ विमर्शिनी एवं पं. व्रजवल्लभ द्विवेदी सविस्तार सटीक)

योगिनी हृदयम् (अमृतानन्दनाथ विमर्शिनी एवं पं. व्रजवल्लभ द्विवेदी सविस्तार सटीक)

Yogini Hridayam with Amritanandanatha Dipika by Vraj Vallabha Dwivedi

अमृतानन्दनाथ (भाष्यकार: पं. व्रजवल्लभ द्विवेदी) द्वारा

DevanagariHindipublished485 पृष्ठ

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पृष्ठ 380

३३२ योगिनीहृदयम् [ पूजासंकेतः संज्ञकेऽनुकूलार्थाक्षरशालिनि¹ संज्ञावति सौभाग्यदायके² चक्रे, सम्पूजयेदि- त्यनुषङ्गः। देहः षट्त्रिंशत्तत्त्वसमुदायलक्षणः। तच्छब्देन तदहन्ताभिमानी प्रमाता लक्ष्यते। अक्षाणि इन्द्रियाणि प्रमाणानि। आदिशब्दाद् विषयाः प्रमेयरूपा गृह्यन्ते। तेषां विशुद्धि³श्चिदेकविश्रान्तिः, तत्प्रदा। तस्यां विशुद्धौ यष्टुरीश्वरत्वं⁴ स्वातन्त्र्यं सिद्ध्यति। सा चात्र प्रोक्तरूपे प्रमातृप्रमाणप्रमेयक्षणे पुरत्रये⁵ चिन्निवास- स्थानत्वात्। अत्रैव वक्ष्यति— "मातृमानप्रमेयाणां पुराणां परिपोषिणी" (३।५०) इति। योगादिक्लेशभेदेन। "आत्मा मनसा संयुज्यते, मन इन्द्रियेण, इन्द्रियमर्थेन, इन्द्रियाणां प्राप्यकारित्वनियमात् ततोऽप्यर्थसन्निकृष्टेनेन्द्रियेण" इति तन्त्रान्त- रोकरीत्या मातृमानमेयेषु तत्तद्रूपेण चिन्मरीचीनां प्रसरस्तत्समवायो योगः, स एवादिक्लेशः। असङ्गाद्वयापरिच्छिन्नसंविदात्मनो मानसेन्द्रियविषयात्मना बहि- संज्ञा वाले, अर्थ के अनुकूल अक्षरों की संज्ञा वाले, अर्थात् ऊपर वर्णित सौभाग्य को सच- मुच देने वाले सौभाग्यदायक चक्र में सर्वसंक्षोभिणी आदि देवियों की पूजा करनी चाहिये। छत्तीस तत्त्वों का समुदाय देह है। देह शब्द से यहाँ उसमें अपनापन देखने वाला प्रमाता लक्षित होता है। अक्ष अर्थात् इन्द्रियाँ, इनसे प्रमाण लक्षित होता है। आदि शब्द से प्रमेय स्वरूप विषयों का ग्रहण किया जाता है। इन सबकी विशुद्धि का अर्थ है इनकी एकमात्र चित्स्वरूप में विश्रान्ति। इस विशुद्धि के हो जाने पर साधक की ईश्वरता सिद्ध हो जाती है, वह परम स्वतन्त्र हो जाता है। यह ईशित्व सिद्धि ऊपर बताये गये प्रमाता, प्रमाण, प्रमेय स्वरूप पुरत्रय में चित्स्वरूप का आलोक फैला देती है। यहीं आगे बताया जायगा—"माता, मान और प्रमेय लक्षण तीनों पुरों का यह पालन करने वाली है"। न्यायदर्शन¹ में बताया गया है—"आत्मा मन से, मन इन्द्रिय से और इन्द्रिय अर्थ से संयुक्त होती है। इन्द्रियों का यह नियम है कि वे वस्तु के पास पहुँच कर उसका ग्रहण करती हैं। इस तरह से यह आत्मा अन्ततः अर्थसन्निकृष्ट इन्द्रिय से संयुक्त हो जाता है"। इस तरह माता, मान और मेय के रूप में चिन्मरीचियों का प्रसार ही यहाँ संयोग कहा जाता है। त्रिपुटी (माता, मान और मेय) का यह योग ही सबसे बड़ा क्लेश है। असंग, अद्वय, अपरिच्छिन्न, संवित्स्वरूप आत्मा पर मन, इन्द्रिय और विषय की यह बाहरी छाया ही सब प्रकार के दुःखों को जन्म देती है। इस क्लेश का यह शक्ति भेदन कर देती है। १. शालिसंज्ञा-ख. ने. उ. । २. कारके-ख ने. ज. झ. उ. । ३. विवेक- ख. ने. ज. झ. उ. । ४. रीशित्वं-ख. ने. झ. । ५. त्रयेऽपि निवा-ख. ने. ज. झ. ।

  1. इस उद्धरण का आधा अंश न्यायभाष्य (१।१।४) में आनुपूर्वी से मिलता है। पूरा उद्धरण वहाँ उपलब्ध नहीं है।