भारतकोश
योगिनी हृदयम् (अमृतानन्दनाथ विमर्शिनी एवं पं. व्रजवल्लभ द्विवेदी सविस्तार सटीक)

योगिनी हृदयम् (अमृतानन्दनाथ विमर्शिनी एवं पं. व्रजवल्लभ द्विवेदी सविस्तार सटीक)

Yogini Hridayam with Amritanandanatha Dipika by Vraj Vallabha Dwivedi

अमृतानन्दनाथ (भाष्यकार: पं. व्रजवल्लभ द्विवेदी) द्वारा

DevanagariHindipublished485 पृष्ठ

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तृतीयः ] दीपिकाभाषानुवादसहितम् ३३३ रूपराग एव हि क्लेशः क्लिष्टत्वम्, तद्भेदेन । प्रत्यङ्मुखतया तदैकरस्येन परप्रमातृविश्रान्तिर्भेदः । तदुक्तं परापञ्चाशिकायाम्— ⁠१सर्वसंविन्नदीभेदभिन्नविश्रान्तिभूमये । ⁠नमः प्रमातृवपुषे२ शिवचैतन्यसिन्धवे३ ॥ इति । स्तोत्रावल्यामपि— ⁠“यत्र यत्र मिलिता मरीचयस्तत्र तत्र विभुरेव जृम्भते” इति । सिद्धा त्रिपुरवासिनी । पूर्वोक्तपुरत्रयविश्रान्तिरूपिणी चतुर्थचक्रेश्वरी । एताः पूज्या आवरणदेवताः सिद्धिचक्रेश्वरीयुताः । सर्वाः सर्वोपचारैर्गन्धादिभिः पूजयेत् ॥१३९-१४२॥ यहाँ भेदन शब्द का अर्थ है पराङ्मुख इन्द्रियों को प्रत्यङ्मुख बना कर, उनके द्वारा उत्पन्न की गई भेददृष्टि को समरसता में समेट कर परम प्रमातृ पद में विश्राम दिलाना । १परापंचाशिका में कहा गया है— ⁠समस्त संवित्स्वरूपिणी नदियों के भेद को जिस भूमि में विश्रान्ति मिल गई, उस परम प्रमाता स्वरूप शिव चैतन्य रूपी सिन्धु (समुद्र) को मैं नमन करता हूँ ॥ ⁠२स्तोत्रावली में भी बताया गया है— ⁠जहाँ जहाँ मरीचियाँ मिलती हैं, अर्थात् बाह्य इन्द्रियां जिन जिन विषयों को ग्रहण करती हैं, सर्वत्र भगवान् शिव का ही स्वरूप भासित होता है ॥ ⁠यह विश्राम दिलाने वाली देवी यहाँ सिद्धा त्रिपुरवासिनी कही गई है । ऊपर बताये गये पुरत्रय को परम स्वरूप में समरस कर देने वाली यह देवी चतुर्थ चक्र की स्वामिनी हैं । ईशित्व सिद्धि और चक्रेश्वरी के साथ इस चक्र में चौदह आवरण देवताओं की पूजा सर्वविध गन्ध आदि उपचारों से करनी चाहिये ॥१३९-१४२॥ ⁠१. सर्वचित्तादिकाद् भेदाद्-ख. ने. ज. झ. उ. । २. विघये-ख. ने. ज. उ. । ३. सिद्धये-ख. ने. ज. उ. । ⁠1. परापंचाशिका के नाम से उद्धृत यह श्लोक मुद्रित ग्रन्थ में अथवा उसकी किसी भी मातृका में हमें अब तक उपलब्ध नहीं हुआ । ⁠2. उत्पलभट्ट की मुद्रित शिवस्तोत्रावली में यह श्लोक उपलब्ध नहीं है । पृ० २११ की पहली टिप्पणी देखिये ।