भारतकोश
योगिनी हृदयम् (अमृतानन्दनाथ विमर्शिनी एवं पं. व्रजवल्लभ द्विवेदी सविस्तार सटीक)

योगिनी हृदयम् (अमृतानन्दनाथ विमर्शिनी एवं पं. व्रजवल्लभ द्विवेदी सविस्तार सटीक)

Yogini Hridayam with Amritanandanatha Dipika by Vraj Vallabha Dwivedi

अमृतानन्दनाथ (भाष्यकार: पं. व्रजवल्लभ द्विवेदी) द्वारा

DevanagariHindipublished485 पृष्ठ

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३३४ योगिनीहृदयम् [ पूजासंकेतः पञ्चमचक्रपूजां सवासनामाह— सदातनानां नादानां नवरन्ध्रस्थितात्मनाम् ॥१४२॥ महासामान्यरूपेण व्यावृत्तध्वनिरूपिणी । अस्थिरस्थिरवेद्यानां छायारूपैर्दशार्णकैः ॥१४३॥ कुलकौलिकयोगिन्यः सर्वसिद्धिप्रदायिकाः । सदातनानां यावच्छरीरभावितानाम्। नादानाम् अविकृतशून्यस्पर्शनाद- ध्वनिबिन्दुशक्तिबीजाक्षराख्यानाम्। नवरन्ध्रस्थितात्मनाम्। नवरन्ध्राणि नवा- धाराणि सुषुम्नान्तर्गतगगन^२भागरूपाणि ^३आधारस्वाधिष्ठानमणिपूरानाहत- तदूर्ध्ववज्रपद्मकण्ठलम्बिकाविशुद्धाज्ञाख्यानि। तदुक्तं स्वच्छन्दसंग्रहे— ^४आधारं स्वाधिष्ठानं च मणिपुरमनाहतम्। मध्यमं वज्रकण्ठं च लम्बिकां च विशुद्धिकाम् ॥ आज्ञां च ^५नवकं विद्धि षट्चक्राणि त्रिहीनकम्। इति। वासना के साथ अब पंचम चक्र की पूजाविधि बताते हैं— नवरन्ध्र स्थित सनातन नौ नादों और एक महासामान्य स्वरूप समष्टिनाद के भेद से दशधा विभक्त स्वरूप वाली यह पंचम चक्रेश्वरी देवी पहचानी जाती है। यह पहले अपने अस्थिर और स्थिर वेद्यों के छाया स्वरूप दस वर्णों के रूप में तथा बाद में समस्त सिद्धियों को देने वाली कुलकौलिक योगिनियों के रूप में प्रकट होती है॥ १४२-१४४॥ ^१अविकृत, शून्य, स्पर्श, नाद, ध्वनि, बिन्दु, शक्ति, बीज और अक्षर नामक नौ नाद सनातन हैं। जब तक शरीर है, तब तक इनका निरन्तर नदन होता रहता है। ये नव- रन्ध्रों में स्थित हैं। सुषुम्ना नाडी के मध्यगत आकाश में आधार, स्वाधिष्ठान, मणिपूर, अनाहत, ^२तदूर्ध्व वज्रपद्म, कण्ठ, लम्बिका, विशुद्ध और आज्ञा नामक जो नौ आधार हैं, उन्हीं को यहाँ नवरन्ध्र कहा गया है। स्वच्छन्दसंग्रह में इनके नाम ये हैं— आधार, स्वाधिष्ठान, मणिपूर, अनाहत, मध्यम वज्र, कण्ठ, लम्बिका, विशुद्धिका और आज्ञा। इन नौ में से तीन को हटा देने पर षट्चक्र बच जाते हैं॥ १. चक्र-ज.। २. नाभासरूपत्वात्-ख. ने. ज. झ. उ.। ३. 'आधार...ज्ञाख्यानि' नास्ति-ख. ज. ब. उ.। ४. मूलाधारं स्वाधिष्ठानं-ज.। ५. नवके-ख. ज. उ. । १. संकेतपद्धति में आठ ही नाद गिनाये गये हैं। पृ० १९३ की पहली टिप्पणी देखिये। यहाँ गिनाये गये अविकृत नाद की नवम निर्विशेष नाद से अभिन्नता मानी जा सकती है। २. नवाधारों के यहाँ दिये गये नामों के विषय में उपोद्घात में विचार किया जायगा।