भारतकोश
योगिनी हृदयम् (अमृतानन्दनाथ विमर्शिनी एवं पं. व्रजवल्लभ द्विवेदी सविस्तार सटीक)

योगिनी हृदयम् (अमृतानन्दनाथ विमर्शिनी एवं पं. व्रजवल्लभ द्विवेदी सविस्तार सटीक)

Yogini Hridayam with Amritanandanatha Dipika by Vraj Vallabha Dwivedi

अमृतानन्दनाथ (भाष्यकार: पं. व्रजवल्लभ द्विवेदी) द्वारा

DevanagariHindipublished485 पृष्ठ

पृष्ठ 383, कुल 485 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 383

तृतीयः ] दीपिकाभाषानुवादसहितम् ३३५ तेषु स्थितात्मनां तेषाम् । महासामान्यरूपेण । महत् आद्यन्तरहितं निर्विशेषध्वनि- लक्षणं सामान्यं समष्टिः, तद्रूपेण । व्यावृत्तध्वनिरूपिणी । एवं व्यावृत्तो विभक्तो दशधा ध्वनिः, तद्रूपिणी, अविकृतादिनादमयसूक्ष्ममध्यमारूपिणीत्यर्थः । अस्थिर- स्थिरवेद्यानाम् । अस्थिरवेद्यानि कर्मेन्द्रियगोचरतया क्रियारूपाणि वचनादान- गमनविसर्गानन्दाख्यानि, स्थिरवेद्यानि ज्ञानेन्द्रियगोचराः शब्दस्पर्शरूपरसगन्धाः, तेषामस्थिरस्थिरवेद्यानाम् । छायारूपैः प्रतिबिम्बभूतैः । दशार्णकैः ततवर्गद्वयदशार्णैः, आविष्कृता इति शेषः । कुलकौलिकयोगिन्यः । अत एव कुलस्य देहस्यावयव- भूतानि दशेन्द्रियाणि कुलशब्देनोच्यन्ते, १तत्संबन्धात् तद्ग्राह्यदशविषयाः कौलिका इत्युच्यन्ते, तैर्योगः संबन्धः कार्यकारण२भावलक्षणो यासां ताः कुलकौलिक- योगिन्यः । ननु भूतलिप्युद्धारक्रमेण३ क्रमप्राप्तौ कवर्गचवर्गौ, कथं टतवर्गौ ४तस्मिन् दशारे व्युत्क्रमेण कथ्येते ? उच्यते—चतुर्दशारदशारद्वयचक्राणां स्थितिरूपत्वाद् भूतलिपेर्मध्यमावयवत्वान्मध्यमायाश्च स्थितिरूपत्वात् स्थितिक्रमोऽयं ५वर्ग- इन नौ आधारों में नौ प्रकार के नाद स्थित हैं । दसवां नाद इन सबकी महासमष्टि है । आदि और अन्त से रहित होने से यह महान् और निर्विशेष ध्वनि स्वरूप होने से सामान्य, अर्थात् समष्टि स्वरूप है । इस तरह दशधा विभक्त नाद ही इस पंचम चक्रे- श्वरी का स्वरूप है । यह देवी अविकृत आदि दस नादों वाली है । यही सूक्ष्म मध्यमा वाणी का भी स्वरूप है । कर्मेन्द्रियों से सम्पन्न होने वाली वचन, आदान, गमन, विसर्ग और आनन्द नामक क्रियाएँ अस्थिर वेद्य तथा ज्ञानेन्द्रियों से गृहीत होने वाले शब्द, स्पर्श, रूप, रस और गन्ध नामक विषय स्थिर वेद्य कहलाते हैं । इन अस्थिर और स्थिर वेद्यो के प्रतिबिम्बभूत दस वर्ण टवर्ग और तवर्ग हैं । इनसे कुलकौलिक योगिनियों का आविष्कार होता है । कुल (शरीर) की अवयवभूत दस इन्द्रियां भी कुल शब्द से बोधित होती हैं । इन इन्द्रियों से संबद्ध बाह्य दस विषय कौलिक कहे जाते हैं । इन कुलों और कौलिकों से जिनका कार्यकारणभाव संबन्ध है, वे कुलकौलिक योगनियां हैं । प्रश्न उठता है कि भूतलिपि का उद्धार यहाँ बताया जा रहा है । तदनुसार पूर्वोक्त १४ वर्णों के उद्धार के बाद कवर्ग और चवर्ग का उद्धार बताया जाना चाहिये । उस क्रम को बदल कर यहाँ टवर्ग और तवर्ग का उद्धार कैसे किया जा रहा है ? इसका समाधान यह है कि चतुर्दशार और द्विदशार (बाह्यदशार और अन्तर्दशार) ये तीनों १. तत्संग्राह्या दश–ख. ने. ज. झ. उ. । २. 'भाव' नास्ति–ख. ने. ज. झ. उ. । ३. क्रमे–ख. ने. ज. झ. उ. । ४. अस्मिन्–क. । ५. वर्गन्यासः–ख. ने. ज. झ. उ. ।