योगिनी हृदयम् (अमृतानन्दनाथ विमर्शिनी एवं पं. व्रजवल्लभ द्विवेदी सविस्तार सटीक)
Yogini Hridayam with Amritanandanatha Dipika by Vraj Vallabha Dwivedi
अमृतानन्दनाथ (भाष्यकार: पं. व्रजवल्लभ द्विवेदी) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें३३६ योगिनीहृदयम् [ पूजासंकेतः व्यत्ययः। अत एव च तत्कारणभूतसूक्ष्ममध्यमात्मना नादमयत्वसंज्ञाकथनमस्य चक्रस्य। सर्वसिद्धिप्रदायिकाः। सर्वस्य पूर्वोक्तस्य ज्ञानकर्मेन्द्रियविषयजातस्य, सिद्धिः प्रतीतिः प्रमातृविश्रान्तिः, तल्लक्षणायाः सिद्धेः२ प्रदायिकाः ॥१४२-१४४॥ ३तासां ध्यानमाह— श्वेताम्बरधराः श्वेताः श्वेताभरणभूषिताः । ४॥१४४॥ स्पष्टम्५ ॥१४४॥ सर्वार्थसाधकचक्र६व्युत्पत्तिमाह— ७मन्त्राणां स्वप्रथारूपयागादन्वर्थसंज्ञके। सर्वसिद्धिप्रदाह्यास्तु चक्रे सर्वार्थसाधके ॥१४५॥ चक्र स्थिति रूप हैं। भूतलिपि मध्यमा वाणीमय है और मध्यमा भी स्थिति रूप है। अतः इस स्थिति क्रम को बताने के लिये यहाँ वर्गों का क्रम बदल दिया गया गया है। इसी- लिये इन वर्गों की कारणभूत सूक्ष्म मध्यमा वाणी की नादात्मकता के आधार पर इस पंचम चक्र की भी नादात्मकता प्रतिपादित होती है। ये योगिनियां ज्ञानेन्द्रिय और कर्मेन्द्रियों के सभी विषयों की सिद्धि को प्रदान करने वाली हैं, अर्थात् अपने प्रमातृपद मे इनको विश्राम देकर सब तरह से कृतार्थ कर देती हैं ॥ १४२-१४४ ॥ अब इनका ध्यान बताते हैं— इनका वर्ण श्वेत है। ये श्वेत वस्त्र और श्वेत आभूषणों से सुशोभित हैं ॥ १४४ ॥ इसका अर्थ स्पष्ट है ॥ १४४ ॥ सर्वार्थसाधक चक्र की व्युत्पत्ति बताते हैं— मन्त्रों के स्वप्रथारूप सभी प्रयोजनों को यह सिद्ध कर देता है, अतः अर्थ के अनुरूप नाम वाले इस सर्वार्थसाधक चक्र में सर्वसिद्धिप्रदा आदि योगिनियाँ निवास करती हैं ॥१४५॥ १. मानादमयसंज्ञा-ख. ने. ज. झ. उ.। २. 'सिद्धेः' नास्ति-ख. ने. ज. झ. उ. । ३. आसां-ख. ने. ज. झ. उ.। ४. श्वेता वराभयकराः-ख. ने. च. छ. ज. झ.। ५. स्पष्टमेतत्-ज.। ६. चक्रोत्पत्ति-ख. ने. ज. झ. उ.। ७. स्वप्रथामननत्राणयोगा- ख. ने. च. छ. ज.।