योगिनी हृदयम् (अमृतानन्दनाथ विमर्शिनी एवं पं. व्रजवल्लभ द्विवेदी सविस्तार सटीक)
Yogini Hridayam with Amritanandanatha Dipika by Vraj Vallabha Dwivedi
अमृतानन्दनाथ (भाष्यकार: पं. व्रजवल्लभ द्विवेदी) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंतृतीयः ] दीपिकाभाषानुवादसहितम् ३३७ 'सर्वसिद्धिप्रदाद्याः “सर्वसिद्धिप्रदा देवी” (१।१६९) इत्यादिचतुःशती- शास्त्रोक्ताः। मन्त्राणां पूर्वोक्त(२।१)निर्वचनानां मननत्राणवताम्, स्वप्रथारूपयोगात्, स्वस्य शिवात्मनः साधकस्य, २प्रथा शिवाहम्भावभावना, तदेव मननत्राणनम्, तद्योगात्। अन्वर्थसंज्ञके सर्वार्थसाधकपदानुकूलार्थवत्संज्ञाशालिनि शिवाहम्भाव- भावनालक्षणमननात् सर्वेषां स्वसाधकानामर्थं परमप्रयोजनं मोक्षं साधयतीति विशेषात् सर्वार्थसाधकचक्रे, संस्थिता इति शेषः ॥१४५॥ स्वनाम³पदार्थव्युत्पत्तिपुरःसरमेतच्चक्रेश्वरी⁴माह— लोकत्रयसमृद्धीनां हेतुत्वाच्चक्रनायिका। त्रिपुराश्रीमहेशानि मन्त्रशुद्धिभवा पुनः ॥१४६॥ वशित्वसिद्धिराख्याता एताः सर्वाः समर्चयेत्। ५लोकयतीति लोकः, लोकनं लोकः, लोक्यत इति लोक इति व्युत्पत्त्या लोकत्रयस्य मातृमानमेयलक्षणस्य समृद्धीनां ६परिपूर्णप्रमातृविश्रान्तिलक्षणानां
आदि शब्द से सर्वसिद्धिप्रदा के साथ चतुःशती शास्त्र (१।१६९-१७१) में वर्णित अन्य शक्तियों का भी ग्रहण होता है। मन्त्रों के निर्वचन के प्रसंग में पहले (२।१) बताया जा चुका है कि मन्त्रों का मनन करने से वे साधक की रक्षा करते हैं। साधक अपने स्वरूप को भूल जाता है, मन्त्र उसको अपने शिवस्वरूप का बोध करा देते हैं। इसी को मन्त्रों की मनन-त्राणता कहते हैं। यह सर्वार्थसाधक चक्र अपने पद के अनुकूल अर्थ, अभीष्ट पदार्थ को देकर अपने नाम को सार्थक बना देता है, अर्थात् मैं शिव ही हूँ, इस तथ्य का मनन करने वाले सभी साधकों के परम प्रयोजन मोक्ष को सिद्ध कर देता है। इसीलिये इस चक्र में सर्वसिद्धिप्रदा आदि शक्तियां निवास करती हैं ॥१४५॥ अपने नामपद की व्युत्पत्ति के साथ इस चक्र की स्वामिनी का वर्णन करते है— हे महेशानि ! तीनों लोकों की समृद्धि को देने वाली इस चक्र की स्वामिनी त्रिपुराश्री कहलाती है। मन्त्र की शुद्धि के सम्पन्न होने पर यह साधक को वशित्व सिद्धि प्रदान करती है। इन सबकी यहाँ पूजा करनी चाहिये ॥१४६-१४७॥ लोक शब्द की कर्ता, कर्म और करण व्युत्पत्ति के आधार पर माता, मान और मेय- लक्षण लोकत्रय का ग्रहण होता है। इस विषय का वर्णन पहले (१।८२) भी किया जा चुका है। इन तीनों की समृद्धि यही है कि परिपूर्ण प्रमातृस्वरूप में पूरी तरह से विश्राम
१. 'सर्व''''साधकस्य' नास्ति-ख. ने. ज. ब. उ.। २. स्वप्रथा-ख. ने. ज. उ.। ३. मर्थवदुत्पत्ति-ख. ने. उ.। ४. चक्रेशी-ख. ने. ज. झ. उ.। ५. लोकयतोति, लोक्यतेनेनेति, लोक्यत-ख. ने. ज. क. उ.। ६. परप्रमातृ-ख. ने. ज. झ. उ.। २२