भारतकोश
योगिनी हृदयम् (अमृतानन्दनाथ विमर्शिनी एवं पं. व्रजवल्लभ द्विवेदी सविस्तार सटीक)

योगिनी हृदयम् (अमृतानन्दनाथ विमर्शिनी एवं पं. व्रजवल्लभ द्विवेदी सविस्तार सटीक)

Yogini Hridayam with Amritanandanatha Dipika by Vraj Vallabha Dwivedi

अमृतानन्दनाथ (भाष्यकार: पं. व्रजवल्लभ द्विवेदी) द्वारा

DevanagariHindipublished485 पृष्ठ

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३३८ योगिनीहृदयम् [ पूजासंकेतः हेतुत्वात् त्रिपुराश्रीः पञ्चमचक्रेश्वरी¹ पूज्येत्यर्थः । मन्त्राणां शुद्धिनम "अकुले विषुसंज्ञे च" (१।२५) इत्यादिपूर्वोक्तरीत्या ²उन्मन्यन्तकाललयलक्षणोच्चारणेन ³चिन्मयताभावना । तादृशमन्त्रशुद्ध्या स्वसाधकस्य वशित्वं ⁴सकलजगत्सर्जने रक्षणे संहारे च ⁵स्वातन्त्र्यं सिद्ध्यतीति तादृशी परशिवताप्राप्तिः । सा चास्मिन् चक्रे वशित्वसिद्धिरिति । एताः सर्वा आवरणदेवताश्चक्रेश्वरोसिद्धिसंयुताः समर्च्चयेत् ।।१४६-१४७।। षष्ठचक्रपूजां सवासनामाह— ऊर्ध्वाधोमुखया देवि कुण्डलिन्या प्रकाशिताः ॥१४७॥ कुलेच्छया बहिर्भावात् कादिवर्णप्रथामर्याः । निगर्भयोगिनीवाच्याः स्वरूपावेशरूपके ॥१४८॥ सर्वावेशकरे चक्रे सर्वरक्षाकरे पराः । सर्वज्ञाद्याः स्थिताः प्राप्त कर ले, समरसाकार हो जाय । यह देवी इस समृद्धि को देती है, इसीलिये इस पंचम चक्र की स्वामिनी का नाम त्रिपुराश्री है । इसी की इस चक्र में पूजा की जाती है । मन्त्रों की शुद्धि पहले (१।२५) बताई गई पद्धति से उन्मनी पर्यन्त कलाओं में काल की मात्राओं को विलीन करते हुए उच्चारण के समय चिन्मय स्वरूप की भावना से होती है । मन्त्र की इस तरह से शुद्धि हो जाने पर यह देवी अपने साधक को वशिता सिद्धि प्रदान करती है । इससे साधक जगत् को सृष्टि, रक्षा और संहार करने में समर्थ हो जाता है, उसे परशिवता की प्राप्ति हो जाती है। इसी पंचम चक्र में यह वशिता सिद्धि भी रहती है । इसीलिये त्रिपुराश्री और वशिता सिद्धि के साथ सर्वसिद्धिप्रदा आदि सभी आवरण देवताओं की यहाँ पूजा करनी चाहिये ।।१४६-१४७।। अब वासना के साथ षष्ठ चक्र की पूजाविधि बताते हैं— हे देवि ! ऊर्ध्वमुख और अधोमुख कुण्डलिनी के द्वारा प्रकाशित, कुल के निर्माण की इच्छा से बहिर्भूत परा शक्ति ककारादि दस वर्णों और सर्वज्ञा आदि दस निगर्भयोगिनियों के रूप में सर्वरक्षाकर चक्र में अभिव्यक्त होती है । परा शक्ति इस स्वरूप में आविष्ट हो जाती है, अतः इसे सर्वावेशकर चक्र भी कहते हैं ।।१४७-१४९।। १. चक्रेशी—ख. ने. ज. झ. उ. । २. उन्मनीपर्यन्तं कलाबीजलक्षणो—ख. ने. ज. झ. उ. । ३. चिन्मयान्तर्भावनं मातृमन्त्रशुद्ध्यादौ—ख. ने. झ. उ. । ४. सर्वजगतप्रसवे सर्वजगत्संहारे च—ख. ने. ज. झ. ब. उ. । ५. स्वायत्तत्वं सिद्धयति, तादृशपरशिवप्राप्तिः-क. ग. । ६. मयी—क. ग. । ७. बाच्या—क. ग. । ८. सर्वरक्षाकरे चक्रे सर्वाविशकरे—ख. ने. च. छ. ज. झ. उ. ।