भारतकोश
योगिनी हृदयम् (अमृतानन्दनाथ विमर्शिनी एवं पं. व्रजवल्लभ द्विवेदी सविस्तार सटीक)

योगिनी हृदयम् (अमृतानन्दनाथ विमर्शिनी एवं पं. व्रजवल्लभ द्विवेदी सविस्तार सटीक)

Yogini Hridayam with Amritanandanatha Dipika by Vraj Vallabha Dwivedi

अमृतानन्दनाथ (भाष्यकार: पं. व्रजवल्लभ द्विवेदी) द्वारा

DevanagariHindipublished485 पृष्ठ

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तृतीयः ] दीपिकाभाषानुवादसहितम् ३३९ ऊर्ध्वाधोमुखया "यदोल्लसति" (४।१२) इत्यादिश्चतुःशतीशास्त्रोक्तरीत्याऽ- कुलस्थ१परपुरुषप्राप्तये ऊर्ध्वमुखया, पुनरधोमुखया २विश्वसृष्टये मूलाधारं प्रविशन्त्या कुण्डलिन्या, प्रकाशिता अभिव्यञ्जिताः, कारणे सत्त्वात् । कुलेच्छया कुलमुक्तलक्षणं मातृमानमेयरूपम्, तत्रेच्छया तन्निर्माणेच्छया । बहिर्भावात् कादिवर्णप्रथामयाः३ । षट्त्रिंशत्तत्त्वसंकलनरूपतत्त्वत्रयमयमातृमानमेयलक्षण- ४कुलनिर्माणेच्छया अकुलस्थपरशिवाद् बहिः प्रसृतया समस्ततत्त्ववर्णगर्भिण्या कुण्डलिन्या ककारादिदशवर्णप्रथारूपा निर्मितेत्यर्थः । निगर्भयोगिनीवाच्या निगर्भयोगिन्य इति वचनाः५, "निगर्भोऽपि महादेवि शिवगुर्वात्मगोचरः" (२।४८) इति पूर्वोक्तरीत्याऽद्वैत६प्रथालक्षणपरप्रमातृयोगो यासां ता योगिन्यो विषयेन्द्रिय- संसर्गलक्षण७दशेन्द्रियवृत्तयश्चिन्मरीचयो निगर्भयोगिन्यः । स्वरूपावेशरूपके स्वरूपस्य साधक८स्यात्मनः प्रमातुरावेशः परशिवोऽहमिति मतिः । आवेशो हि लोके ब्रह्मराक्षसोऽहमितिवत् पराहन्ताप्रथा, तद्रूपके तन्निरूपके । अत एव सर्वा- वेशकरे । "यत्र यत्र मनो याति" (श्लो० ११३), "यत्र९ यत्राक्षमार्गेण चैतन्यं चतुःशती शास्त्र (४।१२) की पद्धति से कुण्डलिनी शक्ति अकुल पुरुष की प्राप्ति के लिये ऊर्ध्वमुख होती है और विश्व की सृष्टि के लिये पुनः अधोमुख होकर मूलाधार में प्रविष्ट हो जाती है । निगर्भयोगिनियों की सृष्टि इसी क्रम से होती है। माता, मान और मेय लक्षण कुल के निर्माण की जब इसकी इच्छा होती है, तो यह बाहर निकलती है और ककार आदि वर्णों के रूप में प्रथित हो जाती है। इसका अभिप्राय यह है कि छत्तीस तत्त्वों को जब हम संकलित करते हैं, तो माता, मान और मेय रूप तीन तत्त्वों में वे उपसंहृत हो जाते हैं । इस लोकत्रय के निर्माण की इच्छा से कुण्डलिनी नामक परा शक्ति अकुल पद्म में स्थित परशिव से अलग हो कर बाहर निकलती है, तो समस्त तत्त्वों और वर्णों को अपने में समेटे हुए इस कुण्डलिनी से ककार आदि दस वर्ण आविर्भूत होते हैं और ये ही निगर्भयोगिनियों के नाम से प्रथित होते हैं । निगर्भ पद के विषय में पहले (२।४८) बताया जा चुका है । अद्वैतप्रथास्वरूप परप्रमाता शिव के साथ जिनका योग है, वे विषय और इन्द्रियों के संसर्ग से समुद्भूत दस विषयों की वृत्तियाँ, चिच्छक्ति की किरणें निगर्भयोगिनी के नाम से प्रख्यात होती हैं । स्वस्वरूप का आवेश साधक की आत्मा में 'मैं पर शिव ही हूँ' इस तरह की बुद्धि के रूप में होता है । जैसे लोक में ब्रह्मराक्षस से आविष्ट व्यक्ति अपने को ब्रह्मराक्षस ही मानता है, उसी तरह पराहन्ता से भरा हुआ १. 'स्थ' नास्ति-ख. ने. ज. झ. उ. । २. स्वसृष्टये-ख. ज. उ., स्वहृदये-ने. । ३. मयी-क. ग. । ४. 'कुल' नास्ति-ने. झ. उ. । ५. वचनात्-ख. ने. ज. उ. । ६. अद्वैतलक्षणपरप्रमातृयोग आसां ता-ख. ने. ज. ब. उ. । ७. लक्षणा-ख. ने. ज. झ. उ. । ८. कात्मनः-ख. ने. ज. झ. उ. । ९. तत्र तत्रेति सार्वत्रिकः पाठः ।