भारतकोश
योगिनी हृदयम् (अमृतानन्दनाथ विमर्शिनी एवं पं. व्रजवल्लभ द्विवेदी सविस्तार सटीक)

योगिनी हृदयम् (अमृतानन्दनाथ विमर्शिनी एवं पं. व्रजवल्लभ द्विवेदी सविस्तार सटीक)

Yogini Hridayam with Amritanandanatha Dipika by Vraj Vallabha Dwivedi

अमृतानन्दनाथ (भाष्यकार: पं. व्रजवल्लभ द्विवेदी) द्वारा

DevanagariHindipublished485 पृष्ठ

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व्यज्यते प्रभोः” (श्लो० ११४) इति विज्ञानभैरवभट्टारकोक्तरीत्या सर्वत्र ¹तदावेश- तदभेदेन स्फुरणं करोतीति सर्वावेशकरे चक्रे षष्ठे चक्रे सर्वरक्षाकरे। काकेभ्यो दधि रक्षतामितिवत् प्रतिकूलपदार्थादुपहतिपरिहारो रक्षा नाम। सर्वस्माद् भेद- प्रपञ्चलक्षणात् परिपन्थिनो रक्षा परशिवाभेदप्रतीतिरूपा, तत्करे। पराः पर- शिवाद्धैतप्रतिपादनपरत्वा²दुत्कृष्टाः। सर्वज्ञाद्या "सर्वज्ञा सर्वशक्तिश्च" (१।१७३) इत्यादिचतुःशतीशास्त्रोक्ताः स्थिताः ॥१४७-१४९॥ तासां ध्यानमाह— एताः सह पुस्ताक्षमालिकाः ॥ १४९ ॥ पुस्तं पुस्तकम्। शिष्टं स्पष्टम् ॥१४९॥ व्यक्ति अपने को पर शिव ही मानने लगता है। इस आवेश दशा का निरूपक है यह चक्र। इसीलिये इसको सर्वावेशकर कहते हैं। विज्ञानभैरव भट्टारक ने बताया है—¹“जहाँ जहाँ मन जाता है”, “इन्द्रिय मार्ग से जहाँ जहाँ प्रभु का चैतन्य व्यक्त होता है, सर्वत्र प्रभु का ही स्वरूप दिखाई पड़ता है”। इस तरह से सर्वत्र भगवान् के ही स्वरूप को अभिन्न रूप से भासित कराने वाला यह सर्वावेशकर नामक षष्ठ चक्र सर्वरक्षाकर भी कहलाता है। काक (कौआ) से दधि (दही) की रक्षा करो, ऐसा कहने पर जैसे सभी प्राणियों से रक्षा करने का अभिप्राय निकलता है, उसी तरह से यह चक्र भी सभी विप- रीत परिस्थितियों से साधक की रक्षा करता है। समस्त भेदप्रपंचरूप प्रतिकूल पदार्थों (शत्रुओं) से रक्षा का अभिप्राय शिव के साथ अभेद प्रतीति की प्रथा का निरन्तर विस्तार है। यह चक्र इसी रक्षा का संपादक है। सर्वज्ञा आदि शक्तियों का यहाँ ‘पराः’ विशेषण इस लिये दिया गया है कि परमशिव के साथ अद्वैत संबन्ध का प्रतिपादन करने के कारण ये शक्तियाँ उत्कृष्ट मानो जातो हैं। चतुःशती शास्त्र (१।१७३-१७५) में इन सर्वज्ञा आदि दस शक्तियों के नाम बताए गये हैं ॥१४७-१४९॥ अब इनका ध्यान बताते हैं— इन सभी के हाथों में पुस्तक और अक्षमाला है ॥१४९॥ पुस्त का अर्थ पुस्तक है। बाकी का अर्थ स्पष्ट है ॥१४९॥ १. तत्पदावेशस्तदभेदेन स्वस्यैव स्फु-ख. झ. उ. । २. त्वात् सर्वो-ख. ।

  1. विज्ञानभैरव के दो श्लोकों के अंश यहाँ उद्धृत हैं। भाषानुवाद में इनका विस्तृत विवेचन देखा जा सकता है।