योगिनी हृदयम् (अमृतानन्दनाथ विमर्शिनी एवं पं. व्रजवल्लभ द्विवेदी सविस्तार सटीक)
Yogini Hridayam with Amritanandanatha Dipika by Vraj Vallabha Dwivedi
अमृतानन्दनाथ (भाष्यकार: पं. व्रजवल्लभ द्विवेदी) द्वारा
३३० योगिनीहृदयम् [ पूजासंकेतः सन्धिवर्णा ¹व्योमेराग्निजलं धरा" (शा० ति० ७।२)। इति तन्मयं चतुर्दशारचक्र- मित्यर्थः ।।१३६-१३८।। सम्प्रदायक्रमायातसौभाग्यदायकशब्दयोर्वासनामाह— शक्तेः सारमयत्वेन प्रसृतत्वान्महेश्वरि ।।१३८।। सम्प्रदायक्रमायाताश्चक्रे सौभाग्यदायके² । शक्तेरिच्छाशक्तेः कुण्डलिन्याः, सारः प्रसारः, पूर्वोक्तरीत्याऽकुलस्थानस्थाऽ- नुत्तरशिवसंसर्गः, तन्मयत्वेन तदुत्पन्नतत्वात्, एतेषां वर्णानां तैर्वर्णैः प्रसृतत्वात् सर्वसंक्षोभिण्यादिशक्तीनां सम्प्रदायक्रमायातत्वम्, "सम्प्रदायो महाबोधरूपो गुरुमुखे स्थितः" (२।३६) इति पूर्वोक्तरीत्या गुरु³मुखादधिगतत्वाद् वर्णोत्पत्तेः । आसां च तन्मयत्वम् । अत एव ⁴ताः सम्प्रदायक्रमायाता इत्यर्थः ।।१३८-१३९।। ¹आगमान्तर (शारदातिलक) में पाँच ह्रस्व स्वर, चार सन्धि वर्ण और आकाश, वायु, अग्नि, जल तथा पृथिवी वाचक पाँच वर्णों के रूप में इनका उद्धार किया गया है । चतु- र्दशार चक्र इन चौदह भूतलिपि वर्णों से सम्पन्न है ।।१३६-१३८।। अब सम्प्रदायक्रमायात और सौभाग्यदायक शब्दों की वासना बताते हैं— हे महेश्वरि ! कुण्डलिनी शक्ति के प्रसार से उत्पन्न होने के कारण सर्व- संक्षोभिणी आदि शक्तियों के स्वरूप का ज्ञान सम्प्रदाय से ही, गुरु-परम्परा से ही प्राप्त हो सकता है । अतः सर्वसंक्षोभिणी आदि सम्प्रदाय योगिनियों की सौभाग्यदायक चक्र में पूजा करनी चाहिये ।।१३८-१३९।। शक्ति का, इच्छा शक्ति कुण्डलिनी का, प्रसार ऊपर बताई गई पद्धति से अकुल स्थानगत अनुत्तर शिव पर्यन्त होता है । कुल कुण्डलिनी और अकुल शिव के संपर्क से ही समस्त वर्णों की उत्पत्ति मानी जाती है । ऊपर बताये गये चौदह भूतलिपि वर्णों से सर्वसंक्षोभिणी आदि चौदह शक्तियों का स्वरूप बनता है, इसका ज्ञान सम्प्रदाय क्रम से ही प्राप्त हो सकता है । यहाँ पहले ही बताया गया है कि सम्प्रदाय क्रम से प्राप्त होने वाला उत्तम ज्ञान गुरु के मुँह में विद्यमान है (२।२६) । इस तरह से वर्ण की उत्पत्ति की प्रक्रिया का ज्ञान गुरुमुख से ही प्राप्त हो सकता है और ये सर्वसंक्षोभिणी आदि १. द्योर्वाय्व-क. ग. ने. । २. कारके-ने. ज. झ. उ. । ३. वक्त्रावगतत्वाद्-ख. ने. ज. ञ. झ. उ. ४. एताः-ख. झ. ।
- आगमान्तर के नाम से उद्धृत यह श्लोक शारदातिलक (७।२) में मिलता है । इससे शारदातिलककार की स्थिति अमृतानन्द से पहले मानी जायगी । इस प्रसंग में लुप्ता० उपो० के पृ० ४६ की टिप्पणी देखिये । दीपिकाकार के अनुसार शारदातिलक आगमान्तर है । अतः इसको श्रीसम्प्रदाय का ग्रन्थ नहीं माना जा सकता ।
तृतीयः ] दीपिकाभाषानुवादसहितम् ३३१ निरन्तरप्रथोरूपसौभाग्यबलयोगतः ॥१३९॥ अन्वर्थसंज्ञके देवि अणिमासदृशाः² शुभाः । सर्वसंक्षोभिणीपूर्वा देहाक्षादिशुद्धिदा ॥१४०॥ ईशित्वसिद्धिरपि च प्रोक्तरूपे पुरत्रये । योगादिक्लेशभेदेन सिद्धा त्रिपुरवासिनी ॥१४१॥ एताः सम्पूजयेद् देवि सर्वाः सर्वोपचारकैः । अणिमासदृशाः "तास्तु रक्ततरा वर्णैः” (३।११५) इत्यादिपूर्वोक्ता³ अणिमा- सिद्धिसदृशरूपाः । सर्वसंक्षोभिणीपूर्वाः “सर्वसंक्षोभिणी शक्तिः” (१।१६५) इत्यादिचतुःशतीशास्त्रोक्ताः । निरन्तरप्रथा⁴ शिवा द्वैतभावना, ⁵सैव सौभाग्यम्, परमसुभगपरमप्रेमास्पदपरशिवाभेदगोचरत्वात्, तदेव बलं शक्तिः, तद्योगातः अनित्याशुचिरूपपरमदुर्भगसंवंजुगुप्साभेदलक्षणसंसारपरिपन्थिपरमप्रेमास्पदसर्व- स्पृहणीयपरमसुभगपरमशिवाहन्तालक्षणसौभाग्यप्रतिपादकशक्तिसंयोगात् । अन्वर्थ- शक्तियां उन्हीं वर्णों से अभिव्यक्त होती हैं, अतः इन शक्तियों को सम्प्रदाय योगिनियों के नाम से जाना जाता है ॥१३८-१३९॥ हे देवि ! अणिमा सिद्धि के समान रूपवाली और कल्याणकारिणी सर्वसंक्षो- भिणी आदि शक्तियाँ निरन्तर प्रथा रूप सौभाग्य-बल से सम्पन्न होने के कारण अन्वर्थसंज्ञक सौभाग्यदायक चक्र में पूजी जाती हैं। देह, इन्द्रिय आदि को विशुद्ध करने वाली ईशित्व सिद्धि को, प्रोक्तरूप पुरत्रय में योग आदि के क्लेशों का भेदन करने वाली त्रिपुरवासिनी की और इन सब देवियों की पहले बताये गये सभी प्रकार के उपचारों से सविधि पूजा करनी चाहिये ॥१३९-१४२॥ अणिमा आदि सिद्धियों के विषय में पहले (३।११५) बताया गया है कि इनका वर्ण चटक लाल है। वैसा ही रूप इन सर्वसंक्षोभिणी आदि देवियों का भी है। इनके नाम चतुःशती शास्त्र (१।१६५-१६८) में बताये गये हैं। निरन्तर प्रथा का अर्थ है शिवा द्वैत- भावना । इसी का नाम है सौभाग्य, क्योंकि परम सुभग परम प्रेमास्पद परम शिव से यह अभेद स्थापित करने वाला है। इस सौभाग्य के बल (शक्ति) के योग से, अनित्य अशुचि- रूप परम दुर्भग सभी के लिये जुगुप्सा (घृणा) के योग्य भेददृष्टिप्रधान इस संसार के परिपन्थी (शत्रु) परम प्रेमास्पद सर्वस्पृहणीय परम सुभग परम शिव के साथ अभेद दृष्टि को स्थापित करने वाली परम सौभाग्य को प्राप्त कराने वाली शक्ति के सम्पर्क से, अन्वर्थ १. प्रथा-क. ग. । २. सदृशीः-ख. ने. च. छ. ज. झ. । ३. क्ताणिमादिसिद्धि- सदृशीः-ख. ने. ज. झ. उ. । ४. प्रथा-क. ग., अन्तरभेदो निरन्तरप्रथा-ख. ने. ज. झ. उ. । ५. 'सैव' नास्ति-ख. ने. ज. झ. उ. ।
३३२ योगिनीहृदयम् [ पूजासंकेतः संज्ञकेऽनुकूलार्थाक्षरशालिनि¹ संज्ञावति सौभाग्यदायके² चक्रे, सम्पूजयेदि- त्यनुषङ्गः। देहः षट्त्रिंशत्तत्त्वसमुदायलक्षणः। तच्छब्देन तदहन्ताभिमानी प्रमाता लक्ष्यते। अक्षाणि इन्द्रियाणि प्रमाणानि। आदिशब्दाद् विषयाः प्रमेयरूपा गृह्यन्ते। तेषां विशुद्धि³श्चिदेकविश्रान्तिः, तत्प्रदा। तस्यां विशुद्धौ यष्टुरीश्वरत्वं⁴ स्वातन्त्र्यं सिद्ध्यति। सा चात्र प्रोक्तरूपे प्रमातृप्रमाणप्रमेयक्षणे पुरत्रये⁵ चिन्निवास- स्थानत्वात्। अत्रैव वक्ष्यति— "मातृमानप्रमेयाणां पुराणां परिपोषिणी" (३।५०) इति। योगादिक्लेशभेदेन। "आत्मा मनसा संयुज्यते, मन इन्द्रियेण, इन्द्रियमर्थेन, इन्द्रियाणां प्राप्यकारित्वनियमात् ततोऽप्यर्थसन्निकृष्टेनेन्द्रियेण" इति तन्त्रान्त- रोकरीत्या मातृमानमेयेषु तत्तद्रूपेण चिन्मरीचीनां प्रसरस्तत्समवायो योगः, स एवादिक्लेशः। असङ्गाद्वयापरिच्छिन्नसंविदात्मनो मानसेन्द्रियविषयात्मना बहि- संज्ञा वाले, अर्थ के अनुकूल अक्षरों की संज्ञा वाले, अर्थात् ऊपर वर्णित सौभाग्य को सच- मुच देने वाले सौभाग्यदायक चक्र में सर्वसंक्षोभिणी आदि देवियों की पूजा करनी चाहिये। छत्तीस तत्त्वों का समुदाय देह है। देह शब्द से यहाँ उसमें अपनापन देखने वाला प्रमाता लक्षित होता है। अक्ष अर्थात् इन्द्रियाँ, इनसे प्रमाण लक्षित होता है। आदि शब्द से प्रमेय स्वरूप विषयों का ग्रहण किया जाता है। इन सबकी विशुद्धि का अर्थ है इनकी एकमात्र चित्स्वरूप में विश्रान्ति। इस विशुद्धि के हो जाने पर साधक की ईश्वरता सिद्ध हो जाती है, वह परम स्वतन्त्र हो जाता है। यह ईशित्व सिद्धि ऊपर बताये गये प्रमाता, प्रमाण, प्रमेय स्वरूप पुरत्रय में चित्स्वरूप का आलोक फैला देती है। यहीं आगे बताया जायगा—"माता, मान और प्रमेय लक्षण तीनों पुरों का यह पालन करने वाली है"। न्यायदर्शन¹ में बताया गया है—"आत्मा मन से, मन इन्द्रिय से और इन्द्रिय अर्थ से संयुक्त होती है। इन्द्रियों का यह नियम है कि वे वस्तु के पास पहुँच कर उसका ग्रहण करती हैं। इस तरह से यह आत्मा अन्ततः अर्थसन्निकृष्ट इन्द्रिय से संयुक्त हो जाता है"। इस तरह माता, मान और मेय के रूप में चिन्मरीचियों का प्रसार ही यहाँ संयोग कहा जाता है। त्रिपुटी (माता, मान और मेय) का यह योग ही सबसे बड़ा क्लेश है। असंग, अद्वय, अपरिच्छिन्न, संवित्स्वरूप आत्मा पर मन, इन्द्रिय और विषय की यह बाहरी छाया ही सब प्रकार के दुःखों को जन्म देती है। इस क्लेश का यह शक्ति भेदन कर देती है। १. शालिसंज्ञा-ख. ने. उ. । २. कारके-ख ने. ज. झ. उ. । ३. विवेक- ख. ने. ज. झ. उ. । ४. रीशित्वं-ख. ने. झ. । ५. त्रयेऽपि निवा-ख. ने. ज. झ. ।
- इस उद्धरण का आधा अंश न्यायभाष्य (१।१।४) में आनुपूर्वी से मिलता है। पूरा उद्धरण वहाँ उपलब्ध नहीं है।
तृतीयः ] दीपिकाभाषानुवादसहितम् ३३३ रूपराग एव हि क्लेशः क्लिष्टत्वम्, तद्भेदेन । प्रत्यङ्मुखतया तदैकरस्येन परप्रमातृविश्रान्तिर्भेदः । तदुक्तं परापञ्चाशिकायाम्— १सर्वसंविन्नदीभेदभिन्नविश्रान्तिभूमये । नमः प्रमातृवपुषे२ शिवचैतन्यसिन्धवे३ ॥ इति । स्तोत्रावल्यामपि— “यत्र यत्र मिलिता मरीचयस्तत्र तत्र विभुरेव जृम्भते” इति । सिद्धा त्रिपुरवासिनी । पूर्वोक्तपुरत्रयविश्रान्तिरूपिणी चतुर्थचक्रेश्वरी । एताः पूज्या आवरणदेवताः सिद्धिचक्रेश्वरीयुताः । सर्वाः सर्वोपचारैर्गन्धादिभिः पूजयेत् ॥१३९-१४२॥ यहाँ भेदन शब्द का अर्थ है पराङ्मुख इन्द्रियों को प्रत्यङ्मुख बना कर, उनके द्वारा उत्पन्न की गई भेददृष्टि को समरसता में समेट कर परम प्रमातृ पद में विश्राम दिलाना । १परापंचाशिका में कहा गया है— समस्त संवित्स्वरूपिणी नदियों के भेद को जिस भूमि में विश्रान्ति मिल गई, उस परम प्रमाता स्वरूप शिव चैतन्य रूपी सिन्धु (समुद्र) को मैं नमन करता हूँ ॥ २स्तोत्रावली में भी बताया गया है— जहाँ जहाँ मरीचियाँ मिलती हैं, अर्थात् बाह्य इन्द्रियां जिन जिन विषयों को ग्रहण करती हैं, सर्वत्र भगवान् शिव का ही स्वरूप भासित होता है ॥ यह विश्राम दिलाने वाली देवी यहाँ सिद्धा त्रिपुरवासिनी कही गई है । ऊपर बताये गये पुरत्रय को परम स्वरूप में समरस कर देने वाली यह देवी चतुर्थ चक्र की स्वामिनी हैं । ईशित्व सिद्धि और चक्रेश्वरी के साथ इस चक्र में चौदह आवरण देवताओं की पूजा सर्वविध गन्ध आदि उपचारों से करनी चाहिये ॥१३९-१४२॥ १. सर्वचित्तादिकाद् भेदाद्-ख. ने. ज. झ. उ. । २. विघये-ख. ने. ज. उ. । ३. सिद्धये-ख. ने. ज. उ. । 1. परापंचाशिका के नाम से उद्धृत यह श्लोक मुद्रित ग्रन्थ में अथवा उसकी किसी भी मातृका में हमें अब तक उपलब्ध नहीं हुआ । 2. उत्पलभट्ट की मुद्रित शिवस्तोत्रावली में यह श्लोक उपलब्ध नहीं है । पृ० २११ की पहली टिप्पणी देखिये ।
३३४ योगिनीहृदयम् [ पूजासंकेतः पञ्चमचक्रपूजां सवासनामाह— सदातनानां नादानां नवरन्ध्रस्थितात्मनाम् ॥१४२॥ महासामान्यरूपेण व्यावृत्तध्वनिरूपिणी । अस्थिरस्थिरवेद्यानां छायारूपैर्दशार्णकैः ॥१४३॥ कुलकौलिकयोगिन्यः सर्वसिद्धिप्रदायिकाः । सदातनानां यावच्छरीरभावितानाम्। नादानाम् अविकृतशून्यस्पर्शनाद- ध्वनिबिन्दुशक्तिबीजाक्षराख्यानाम्। नवरन्ध्रस्थितात्मनाम्। नवरन्ध्राणि नवा- धाराणि सुषुम्नान्तर्गतगगन^२भागरूपाणि ^३आधारस्वाधिष्ठानमणिपूरानाहत- तदूर्ध्ववज्रपद्मकण्ठलम्बिकाविशुद्धाज्ञाख्यानि। तदुक्तं स्वच्छन्दसंग्रहे— ^४आधारं स्वाधिष्ठानं च मणिपुरमनाहतम्। मध्यमं वज्रकण्ठं च लम्बिकां च विशुद्धिकाम् ॥ आज्ञां च ^५नवकं विद्धि षट्चक्राणि त्रिहीनकम्। इति। वासना के साथ अब पंचम चक्र की पूजाविधि बताते हैं— नवरन्ध्र स्थित सनातन नौ नादों और एक महासामान्य स्वरूप समष्टिनाद के भेद से दशधा विभक्त स्वरूप वाली यह पंचम चक्रेश्वरी देवी पहचानी जाती है। यह पहले अपने अस्थिर और स्थिर वेद्यों के छाया स्वरूप दस वर्णों के रूप में तथा बाद में समस्त सिद्धियों को देने वाली कुलकौलिक योगिनियों के रूप में प्रकट होती है॥ १४२-१४४॥ ^१अविकृत, शून्य, स्पर्श, नाद, ध्वनि, बिन्दु, शक्ति, बीज और अक्षर नामक नौ नाद सनातन हैं। जब तक शरीर है, तब तक इनका निरन्तर नदन होता रहता है। ये नव- रन्ध्रों में स्थित हैं। सुषुम्ना नाडी के मध्यगत आकाश में आधार, स्वाधिष्ठान, मणिपूर, अनाहत, ^२तदूर्ध्व वज्रपद्म, कण्ठ, लम्बिका, विशुद्ध और आज्ञा नामक जो नौ आधार हैं, उन्हीं को यहाँ नवरन्ध्र कहा गया है। स्वच्छन्दसंग्रह में इनके नाम ये हैं— आधार, स्वाधिष्ठान, मणिपूर, अनाहत, मध्यम वज्र, कण्ठ, लम्बिका, विशुद्धिका और आज्ञा। इन नौ में से तीन को हटा देने पर षट्चक्र बच जाते हैं॥ १. चक्र-ज.। २. नाभासरूपत्वात्-ख. ने. ज. झ. उ.। ३. 'आधार...ज्ञाख्यानि' नास्ति-ख. ज. ब. उ.। ४. मूलाधारं स्वाधिष्ठानं-ज.। ५. नवके-ख. ज. उ. । १. संकेतपद्धति में आठ ही नाद गिनाये गये हैं। पृ० १९३ की पहली टिप्पणी देखिये। यहाँ गिनाये गये अविकृत नाद की नवम निर्विशेष नाद से अभिन्नता मानी जा सकती है। २. नवाधारों के यहाँ दिये गये नामों के विषय में उपोद्घात में विचार किया जायगा।
तृतीयः ] दीपिकाभाषानुवादसहितम् ३३५ तेषु स्थितात्मनां तेषाम् । महासामान्यरूपेण । महत् आद्यन्तरहितं निर्विशेषध्वनि- लक्षणं सामान्यं समष्टिः, तद्रूपेण । व्यावृत्तध्वनिरूपिणी । एवं व्यावृत्तो विभक्तो दशधा ध्वनिः, तद्रूपिणी, अविकृतादिनादमयसूक्ष्ममध्यमारूपिणीत्यर्थः । अस्थिर- स्थिरवेद्यानाम् । अस्थिरवेद्यानि कर्मेन्द्रियगोचरतया क्रियारूपाणि वचनादान- गमनविसर्गानन्दाख्यानि, स्थिरवेद्यानि ज्ञानेन्द्रियगोचराः शब्दस्पर्शरूपरसगन्धाः, तेषामस्थिरस्थिरवेद्यानाम् । छायारूपैः प्रतिबिम्बभूतैः । दशार्णकैः ततवर्गद्वयदशार्णैः, आविष्कृता इति शेषः । कुलकौलिकयोगिन्यः । अत एव कुलस्य देहस्यावयव- भूतानि दशेन्द्रियाणि कुलशब्देनोच्यन्ते, १तत्संबन्धात् तद्ग्राह्यदशविषयाः कौलिका इत्युच्यन्ते, तैर्योगः संबन्धः कार्यकारण२भावलक्षणो यासां ताः कुलकौलिक- योगिन्यः । ननु भूतलिप्युद्धारक्रमेण३ क्रमप्राप्तौ कवर्गचवर्गौ, कथं टतवर्गौ ४तस्मिन् दशारे व्युत्क्रमेण कथ्येते ? उच्यते—चतुर्दशारदशारद्वयचक्राणां स्थितिरूपत्वाद् भूतलिपेर्मध्यमावयवत्वान्मध्यमायाश्च स्थितिरूपत्वात् स्थितिक्रमोऽयं ५वर्ग- इन नौ आधारों में नौ प्रकार के नाद स्थित हैं । दसवां नाद इन सबकी महासमष्टि है । आदि और अन्त से रहित होने से यह महान् और निर्विशेष ध्वनि स्वरूप होने से सामान्य, अर्थात् समष्टि स्वरूप है । इस तरह दशधा विभक्त नाद ही इस पंचम चक्रे- श्वरी का स्वरूप है । यह देवी अविकृत आदि दस नादों वाली है । यही सूक्ष्म मध्यमा वाणी का भी स्वरूप है । कर्मेन्द्रियों से सम्पन्न होने वाली वचन, आदान, गमन, विसर्ग और आनन्द नामक क्रियाएँ अस्थिर वेद्य तथा ज्ञानेन्द्रियों से गृहीत होने वाले शब्द, स्पर्श, रूप, रस और गन्ध नामक विषय स्थिर वेद्य कहलाते हैं । इन अस्थिर और स्थिर वेद्यो के प्रतिबिम्बभूत दस वर्ण टवर्ग और तवर्ग हैं । इनसे कुलकौलिक योगिनियों का आविष्कार होता है । कुल (शरीर) की अवयवभूत दस इन्द्रियां भी कुल शब्द से बोधित होती हैं । इन इन्द्रियों से संबद्ध बाह्य दस विषय कौलिक कहे जाते हैं । इन कुलों और कौलिकों से जिनका कार्यकारणभाव संबन्ध है, वे कुलकौलिक योगनियां हैं । प्रश्न उठता है कि भूतलिपि का उद्धार यहाँ बताया जा रहा है । तदनुसार पूर्वोक्त १४ वर्णों के उद्धार के बाद कवर्ग और चवर्ग का उद्धार बताया जाना चाहिये । उस क्रम को बदल कर यहाँ टवर्ग और तवर्ग का उद्धार कैसे किया जा रहा है ? इसका समाधान यह है कि चतुर्दशार और द्विदशार (बाह्यदशार और अन्तर्दशार) ये तीनों १. तत्संग्राह्या दश–ख. ने. ज. झ. उ. । २. 'भाव' नास्ति–ख. ने. ज. झ. उ. । ३. क्रमे–ख. ने. ज. झ. उ. । ४. अस्मिन्–क. । ५. वर्गन्यासः–ख. ने. ज. झ. उ. ।
३३६ योगिनीहृदयम् [ पूजासंकेतः व्यत्ययः। अत एव च तत्कारणभूतसूक्ष्ममध्यमात्मना नादमयत्वसंज्ञाकथनमस्य चक्रस्य। सर्वसिद्धिप्रदायिकाः। सर्वस्य पूर्वोक्तस्य ज्ञानकर्मेन्द्रियविषयजातस्य, सिद्धिः प्रतीतिः प्रमातृविश्रान्तिः, तल्लक्षणायाः सिद्धेः२ प्रदायिकाः ॥१४२-१४४॥ ३तासां ध्यानमाह— श्वेताम्बरधराः श्वेताः श्वेताभरणभूषिताः । ४॥१४४॥ स्पष्टम्५ ॥१४४॥ सर्वार्थसाधकचक्र६व्युत्पत्तिमाह— ७मन्त्राणां स्वप्रथारूपयागादन्वर्थसंज्ञके। सर्वसिद्धिप्रदाह्यास्तु चक्रे सर्वार्थसाधके ॥१४५॥ चक्र स्थिति रूप हैं। भूतलिपि मध्यमा वाणीमय है और मध्यमा भी स्थिति रूप है। अतः इस स्थिति क्रम को बताने के लिये यहाँ वर्गों का क्रम बदल दिया गया गया है। इसी- लिये इन वर्गों की कारणभूत सूक्ष्म मध्यमा वाणी की नादात्मकता के आधार पर इस पंचम चक्र की भी नादात्मकता प्रतिपादित होती है। ये योगिनियां ज्ञानेन्द्रिय और कर्मेन्द्रियों के सभी विषयों की सिद्धि को प्रदान करने वाली हैं, अर्थात् अपने प्रमातृपद मे इनको विश्राम देकर सब तरह से कृतार्थ कर देती हैं ॥ १४२-१४४ ॥ अब इनका ध्यान बताते हैं— इनका वर्ण श्वेत है। ये श्वेत वस्त्र और श्वेत आभूषणों से सुशोभित हैं ॥ १४४ ॥ इसका अर्थ स्पष्ट है ॥ १४४ ॥ सर्वार्थसाधक चक्र की व्युत्पत्ति बताते हैं— मन्त्रों के स्वप्रथारूप सभी प्रयोजनों को यह सिद्ध कर देता है, अतः अर्थ के अनुरूप नाम वाले इस सर्वार्थसाधक चक्र में सर्वसिद्धिप्रदा आदि योगिनियाँ निवास करती हैं ॥१४५॥ १. मानादमयसंज्ञा-ख. ने. ज. झ. उ.। २. 'सिद्धेः' नास्ति-ख. ने. ज. झ. उ. । ३. आसां-ख. ने. ज. झ. उ.। ४. श्वेता वराभयकराः-ख. ने. च. छ. ज. झ.। ५. स्पष्टमेतत्-ज.। ६. चक्रोत्पत्ति-ख. ने. ज. झ. उ.। ७. स्वप्रथामननत्राणयोगा- ख. ने. च. छ. ज.।
तृतीयः ] दीपिकाभाषानुवादसहितम् ३३७ 'सर्वसिद्धिप्रदाद्याः “सर्वसिद्धिप्रदा देवी” (१।१६९) इत्यादिचतुःशती- शास्त्रोक्ताः। मन्त्राणां पूर्वोक्त(२।१)निर्वचनानां मननत्राणवताम्, स्वप्रथारूपयोगात्, स्वस्य शिवात्मनः साधकस्य, २प्रथा शिवाहम्भावभावना, तदेव मननत्राणनम्, तद्योगात्। अन्वर्थसंज्ञके सर्वार्थसाधकपदानुकूलार्थवत्संज्ञाशालिनि शिवाहम्भाव- भावनालक्षणमननात् सर्वेषां स्वसाधकानामर्थं परमप्रयोजनं मोक्षं साधयतीति विशेषात् सर्वार्थसाधकचक्रे, संस्थिता इति शेषः ॥१४५॥ स्वनाम³पदार्थव्युत्पत्तिपुरःसरमेतच्चक्रेश्वरी⁴माह— लोकत्रयसमृद्धीनां हेतुत्वाच्चक्रनायिका। त्रिपुराश्रीमहेशानि मन्त्रशुद्धिभवा पुनः ॥१४६॥ वशित्वसिद्धिराख्याता एताः सर्वाः समर्चयेत्। ५लोकयतीति लोकः, लोकनं लोकः, लोक्यत इति लोक इति व्युत्पत्त्या लोकत्रयस्य मातृमानमेयलक्षणस्य समृद्धीनां ६परिपूर्णप्रमातृविश्रान्तिलक्षणानां
आदि शब्द से सर्वसिद्धिप्रदा के साथ चतुःशती शास्त्र (१।१६९-१७१) में वर्णित अन्य शक्तियों का भी ग्रहण होता है। मन्त्रों के निर्वचन के प्रसंग में पहले (२।१) बताया जा चुका है कि मन्त्रों का मनन करने से वे साधक की रक्षा करते हैं। साधक अपने स्वरूप को भूल जाता है, मन्त्र उसको अपने शिवस्वरूप का बोध करा देते हैं। इसी को मन्त्रों की मनन-त्राणता कहते हैं। यह सर्वार्थसाधक चक्र अपने पद के अनुकूल अर्थ, अभीष्ट पदार्थ को देकर अपने नाम को सार्थक बना देता है, अर्थात् मैं शिव ही हूँ, इस तथ्य का मनन करने वाले सभी साधकों के परम प्रयोजन मोक्ष को सिद्ध कर देता है। इसीलिये इस चक्र में सर्वसिद्धिप्रदा आदि शक्तियां निवास करती हैं ॥१४५॥ अपने नामपद की व्युत्पत्ति के साथ इस चक्र की स्वामिनी का वर्णन करते है— हे महेशानि ! तीनों लोकों की समृद्धि को देने वाली इस चक्र की स्वामिनी त्रिपुराश्री कहलाती है। मन्त्र की शुद्धि के सम्पन्न होने पर यह साधक को वशित्व सिद्धि प्रदान करती है। इन सबकी यहाँ पूजा करनी चाहिये ॥१४६-१४७॥ लोक शब्द की कर्ता, कर्म और करण व्युत्पत्ति के आधार पर माता, मान और मेय- लक्षण लोकत्रय का ग्रहण होता है। इस विषय का वर्णन पहले (१।८२) भी किया जा चुका है। इन तीनों की समृद्धि यही है कि परिपूर्ण प्रमातृस्वरूप में पूरी तरह से विश्राम
१. 'सर्व''''साधकस्य' नास्ति-ख. ने. ज. ब. उ.। २. स्वप्रथा-ख. ने. ज. उ.। ३. मर्थवदुत्पत्ति-ख. ने. उ.। ४. चक्रेशी-ख. ने. ज. झ. उ.। ५. लोकयतोति, लोक्यतेनेनेति, लोक्यत-ख. ने. ज. क. उ.। ६. परप्रमातृ-ख. ने. ज. झ. उ.। २२
३३८ योगिनीहृदयम् [ पूजासंकेतः हेतुत्वात् त्रिपुराश्रीः पञ्चमचक्रेश्वरी¹ पूज्येत्यर्थः । मन्त्राणां शुद्धिनम "अकुले विषुसंज्ञे च" (१।२५) इत्यादिपूर्वोक्तरीत्या ²उन्मन्यन्तकाललयलक्षणोच्चारणेन ³चिन्मयताभावना । तादृशमन्त्रशुद्ध्या स्वसाधकस्य वशित्वं ⁴सकलजगत्सर्जने रक्षणे संहारे च ⁵स्वातन्त्र्यं सिद्ध्यतीति तादृशी परशिवताप्राप्तिः । सा चास्मिन् चक्रे वशित्वसिद्धिरिति । एताः सर्वा आवरणदेवताश्चक्रेश्वरोसिद्धिसंयुताः समर्च्चयेत् ।।१४६-१४७।। षष्ठचक्रपूजां सवासनामाह— ऊर्ध्वाधोमुखया देवि कुण्डलिन्या प्रकाशिताः ॥१४७॥ कुलेच्छया बहिर्भावात् कादिवर्णप्रथामर्याः । निगर्भयोगिनीवाच्याः स्वरूपावेशरूपके ॥१४८॥ सर्वावेशकरे चक्रे सर्वरक्षाकरे पराः । सर्वज्ञाद्याः स्थिताः प्राप्त कर ले, समरसाकार हो जाय । यह देवी इस समृद्धि को देती है, इसीलिये इस पंचम चक्र की स्वामिनी का नाम त्रिपुराश्री है । इसी की इस चक्र में पूजा की जाती है । मन्त्रों की शुद्धि पहले (१।२५) बताई गई पद्धति से उन्मनी पर्यन्त कलाओं में काल की मात्राओं को विलीन करते हुए उच्चारण के समय चिन्मय स्वरूप की भावना से होती है । मन्त्र की इस तरह से शुद्धि हो जाने पर यह देवी अपने साधक को वशिता सिद्धि प्रदान करती है । इससे साधक जगत् को सृष्टि, रक्षा और संहार करने में समर्थ हो जाता है, उसे परशिवता की प्राप्ति हो जाती है। इसी पंचम चक्र में यह वशिता सिद्धि भी रहती है । इसीलिये त्रिपुराश्री और वशिता सिद्धि के साथ सर्वसिद्धिप्रदा आदि सभी आवरण देवताओं की यहाँ पूजा करनी चाहिये ।।१४६-१४७।। अब वासना के साथ षष्ठ चक्र की पूजाविधि बताते हैं— हे देवि ! ऊर्ध्वमुख और अधोमुख कुण्डलिनी के द्वारा प्रकाशित, कुल के निर्माण की इच्छा से बहिर्भूत परा शक्ति ककारादि दस वर्णों और सर्वज्ञा आदि दस निगर्भयोगिनियों के रूप में सर्वरक्षाकर चक्र में अभिव्यक्त होती है । परा शक्ति इस स्वरूप में आविष्ट हो जाती है, अतः इसे सर्वावेशकर चक्र भी कहते हैं ।।१४७-१४९।। १. चक्रेशी—ख. ने. ज. झ. उ. । २. उन्मनीपर्यन्तं कलाबीजलक्षणो—ख. ने. ज. झ. उ. । ३. चिन्मयान्तर्भावनं मातृमन्त्रशुद्ध्यादौ—ख. ने. झ. उ. । ४. सर्वजगतप्रसवे सर्वजगत्संहारे च—ख. ने. ज. झ. ब. उ. । ५. स्वायत्तत्वं सिद्धयति, तादृशपरशिवप्राप्तिः-क. ग. । ६. मयी—क. ग. । ७. बाच्या—क. ग. । ८. सर्वरक्षाकरे चक्रे सर्वाविशकरे—ख. ने. च. छ. ज. झ. उ. ।
तृतीयः ] दीपिकाभाषानुवादसहितम् ३३९ ऊर्ध्वाधोमुखया "यदोल्लसति" (४।१२) इत्यादिश्चतुःशतीशास्त्रोक्तरीत्याऽ- कुलस्थ१परपुरुषप्राप्तये ऊर्ध्वमुखया, पुनरधोमुखया २विश्वसृष्टये मूलाधारं प्रविशन्त्या कुण्डलिन्या, प्रकाशिता अभिव्यञ्जिताः, कारणे सत्त्वात् । कुलेच्छया कुलमुक्तलक्षणं मातृमानमेयरूपम्, तत्रेच्छया तन्निर्माणेच्छया । बहिर्भावात् कादिवर्णप्रथामयाः३ । षट्त्रिंशत्तत्त्वसंकलनरूपतत्त्वत्रयमयमातृमानमेयलक्षण- ४कुलनिर्माणेच्छया अकुलस्थपरशिवाद् बहिः प्रसृतया समस्ततत्त्ववर्णगर्भिण्या कुण्डलिन्या ककारादिदशवर्णप्रथारूपा निर्मितेत्यर्थः । निगर्भयोगिनीवाच्या निगर्भयोगिन्य इति वचनाः५, "निगर्भोऽपि महादेवि शिवगुर्वात्मगोचरः" (२।४८) इति पूर्वोक्तरीत्याऽद्वैत६प्रथालक्षणपरप्रमातृयोगो यासां ता योगिन्यो विषयेन्द्रिय- संसर्गलक्षण७दशेन्द्रियवृत्तयश्चिन्मरीचयो निगर्भयोगिन्यः । स्वरूपावेशरूपके स्वरूपस्य साधक८स्यात्मनः प्रमातुरावेशः परशिवोऽहमिति मतिः । आवेशो हि लोके ब्रह्मराक्षसोऽहमितिवत् पराहन्ताप्रथा, तद्रूपके तन्निरूपके । अत एव सर्वा- वेशकरे । "यत्र यत्र मनो याति" (श्लो० ११३), "यत्र९ यत्राक्षमार्गेण चैतन्यं चतुःशती शास्त्र (४।१२) की पद्धति से कुण्डलिनी शक्ति अकुल पुरुष की प्राप्ति के लिये ऊर्ध्वमुख होती है और विश्व की सृष्टि के लिये पुनः अधोमुख होकर मूलाधार में प्रविष्ट हो जाती है । निगर्भयोगिनियों की सृष्टि इसी क्रम से होती है। माता, मान और मेय लक्षण कुल के निर्माण की जब इसकी इच्छा होती है, तो यह बाहर निकलती है और ककार आदि वर्णों के रूप में प्रथित हो जाती है। इसका अभिप्राय यह है कि छत्तीस तत्त्वों को जब हम संकलित करते हैं, तो माता, मान और मेय रूप तीन तत्त्वों में वे उपसंहृत हो जाते हैं । इस लोकत्रय के निर्माण की इच्छा से कुण्डलिनी नामक परा शक्ति अकुल पद्म में स्थित परशिव से अलग हो कर बाहर निकलती है, तो समस्त तत्त्वों और वर्णों को अपने में समेटे हुए इस कुण्डलिनी से ककार आदि दस वर्ण आविर्भूत होते हैं और ये ही निगर्भयोगिनियों के नाम से प्रथित होते हैं । निगर्भ पद के विषय में पहले (२।४८) बताया जा चुका है । अद्वैतप्रथास्वरूप परप्रमाता शिव के साथ जिनका योग है, वे विषय और इन्द्रियों के संसर्ग से समुद्भूत दस विषयों की वृत्तियाँ, चिच्छक्ति की किरणें निगर्भयोगिनी के नाम से प्रख्यात होती हैं । स्वस्वरूप का आवेश साधक की आत्मा में 'मैं पर शिव ही हूँ' इस तरह की बुद्धि के रूप में होता है । जैसे लोक में ब्रह्मराक्षस से आविष्ट व्यक्ति अपने को ब्रह्मराक्षस ही मानता है, उसी तरह पराहन्ता से भरा हुआ १. 'स्थ' नास्ति-ख. ने. ज. झ. उ. । २. स्वसृष्टये-ख. ज. उ., स्वहृदये-ने. । ३. मयी-क. ग. । ४. 'कुल' नास्ति-ने. झ. उ. । ५. वचनात्-ख. ने. ज. उ. । ६. अद्वैतलक्षणपरप्रमातृयोग आसां ता-ख. ने. ज. ब. उ. । ७. लक्षणा-ख. ने. ज. झ. उ. । ८. कात्मनः-ख. ने. ज. झ. उ. । ९. तत्र तत्रेति सार्वत्रिकः पाठः ।
व्यज्यते प्रभोः” (श्लो० ११४) इति विज्ञानभैरवभट्टारकोक्तरीत्या सर्वत्र ¹तदावेश- तदभेदेन स्फुरणं करोतीति सर्वावेशकरे चक्रे षष्ठे चक्रे सर्वरक्षाकरे। काकेभ्यो दधि रक्षतामितिवत् प्रतिकूलपदार्थादुपहतिपरिहारो रक्षा नाम। सर्वस्माद् भेद- प्रपञ्चलक्षणात् परिपन्थिनो रक्षा परशिवाभेदप्रतीतिरूपा, तत्करे। पराः पर- शिवाद्धैतप्रतिपादनपरत्वा²दुत्कृष्टाः। सर्वज्ञाद्या "सर्वज्ञा सर्वशक्तिश्च" (१।१७३) इत्यादिचतुःशतीशास्त्रोक्ताः स्थिताः ॥१४७-१४९॥ तासां ध्यानमाह— एताः सह पुस्ताक्षमालिकाः ॥ १४९ ॥ पुस्तं पुस्तकम्। शिष्टं स्पष्टम् ॥१४९॥ व्यक्ति अपने को पर शिव ही मानने लगता है। इस आवेश दशा का निरूपक है यह चक्र। इसीलिये इसको सर्वावेशकर कहते हैं। विज्ञानभैरव भट्टारक ने बताया है—¹“जहाँ जहाँ मन जाता है”, “इन्द्रिय मार्ग से जहाँ जहाँ प्रभु का चैतन्य व्यक्त होता है, सर्वत्र प्रभु का ही स्वरूप दिखाई पड़ता है”। इस तरह से सर्वत्र भगवान् के ही स्वरूप को अभिन्न रूप से भासित कराने वाला यह सर्वावेशकर नामक षष्ठ चक्र सर्वरक्षाकर भी कहलाता है। काक (कौआ) से दधि (दही) की रक्षा करो, ऐसा कहने पर जैसे सभी प्राणियों से रक्षा करने का अभिप्राय निकलता है, उसी तरह से यह चक्र भी सभी विप- रीत परिस्थितियों से साधक की रक्षा करता है। समस्त भेदप्रपंचरूप प्रतिकूल पदार्थों (शत्रुओं) से रक्षा का अभिप्राय शिव के साथ अभेद प्रतीति की प्रथा का निरन्तर विस्तार है। यह चक्र इसी रक्षा का संपादक है। सर्वज्ञा आदि शक्तियों का यहाँ ‘पराः’ विशेषण इस लिये दिया गया है कि परमशिव के साथ अद्वैत संबन्ध का प्रतिपादन करने के कारण ये शक्तियाँ उत्कृष्ट मानो जातो हैं। चतुःशती शास्त्र (१।१७३-१७५) में इन सर्वज्ञा आदि दस शक्तियों के नाम बताए गये हैं ॥१४७-१४९॥ अब इनका ध्यान बताते हैं— इन सभी के हाथों में पुस्तक और अक्षमाला है ॥१४९॥ पुस्त का अर्थ पुस्तक है। बाकी का अर्थ स्पष्ट है ॥१४९॥ १. तत्पदावेशस्तदभेदेन स्वस्यैव स्फु-ख. झ. उ. । २. त्वात् सर्वो-ख. ।
- विज्ञानभैरव के दो श्लोकों के अंश यहाँ उद्धृत हैं। भाषानुवाद में इनका विस्तृत विवेचन देखा जा सकता है।
तृतीयः ] दीपिकाभाषानुवादसहितम् ३४१ नामव्युत्पत्तिपुरःसरं १चक्रेशीमाह— मातृमानप्रमेयाणां पुराणां परिपोषिणी । त्रिपुरामालिनी ख्याता चक्रेशी सर्वमोहिनी ॥ १५० ॥ २परसंवित्स्पन्दरूपत्वान्मातृमानमेयान्येव पुराणि, तेषां पुराणां परिपोषिणी प्रधानेनोपबृंहिणी। अत एव त्रिपुरामालिनी ख्याता निरुक्ता। ३चक्रेशी षष्ठचक्रेशी सर्वमोहिनी। ४एतत्कृतमोहवशादेव हि मातृमानप्रमेयरूपा ५प्रथा। तदुक्तं परा- पञ्चाशिकायाम्—"६स्वाङ्गरूपेषु ७भावेषु मायातत्त्वं विभेदधीः" (श्लो० २१) इति ॥१५०॥ विद्याशक्तिविशुद्धिं च सिद्धिं प्राकाम्यसंज्ञिताम् । एताः सर्वोपचारेण पूजयेद् देवताः क्रमात् ॥ १५१॥ मन्त्राः पुरुषवाच्याधिष्ठिताः, विद्याः स्त्रीरूपवाच्याधिष्ठिताः। अत एव नाम की व्युत्पत्ति के साथ चक्रेश्वरी का वर्णन करते हैं— माता, मान और प्रमेय लक्षण पुरत्रय की यह पोषिका है। इसीलिये यह सर्वमोहिनी चक्रेशी त्रिपुरामालिनी कहलाती है ॥ १५०॥ माता, मान और प्रमेय लक्षण पुरत्रय परा संवित् का ही स्पन्दन है। इन तीन पुरों को यह त्रिपुरामालिनी परिपुष्ट करती है, प्रधानतः इनका उपबृंहण करती है। इसीलिये यह इस नाम से प्रसिद्ध है। यह षष्ठ चक्र की स्वामिनी सबको मोह में डाले रहती है। यह चक्रेशी जिस मोह को पैदा करती है, उसी के कारण माता, मान और प्रमेय स्वरूप पुरत्रय की कल्पना सजीव हो उठती है। परापंचाशिका में बताया गया है—"यह सारा भाव जगत् शिव का अपना ही स्वरूप है। मायातत्त्व के ही कारण इनमें परस्पर भेदबुद्धि जग जाती है" ॥१५०॥ इस षष्ठ चक्र में त्रिपुराविद्या की शक्ति से प्राप्त हुई प्राकाम्य नामक सिद्धि के साथ चक्रेशी की और आवरण देवताओं की भी सभी उपचारों से पूजा करे ॥१५१॥ १पुरुष-देवता के वाचक मन्त्र और स्त्री-देवता की वाचक विद्या कहलाती है। इसी १. चक्रेश्वरो—क. ग.। २. 'पर''''बृंहिणी' इत्यस्य स्थाने 'सर्वेषां स्वप्रथाप्रदानेनोप- बृंहिणी' इति पाठः—ख. ने. ज. ब. उ.। ३. चक्रे षष्ठचक्रे—क. ग.। ४. अत एव तत्कृत—ख. ने. ज. उ.। ५. भेदप्रथा—झ.। ६. स्वांश—क. ग.। ७. भानेषु—क. ग., भागेषु—ख. ने. ज. झ. उ.। १. ऋजुविमर्शिनी (पृ० ४२-४३) मूल तथा टिप्पणी देखिये।
३४२ योगिनीहृदयम् [पूजासंकेतः विद्याशक्तेः सौभाग्यविद्यावर्णवाच्यायाः षट्त्रिंशत्तत्त्वमय्या विशुद्धिस्तदतीत- परचिल्लक्षणा, तद्रूपाम्। प्राकाम्यसंज्ञितां१ सिद्धिं कामना२नुरूपलक्षणाम्। तदुक्तं महाकविभिः- द्रवः संघातकठिनः स्थूलः सूक्ष्मो लघुर्गुरुः। व्यक्तो व्यक्तेतरश्चासि३ प्राकाम्यं ते विभूतिषु ॥ इति। (कु० स० २।११) एता देवताः४, क्रमात् प्रथमम् आवरणदेवताः, पश्चाच्चक्रेशीम्, ततः सिद्धि- मिति क्रमात्। सर्वोपचारेण। जाता५वेकवचनम्। ६सर्वोपचारैः पूजयेदि- त्यर्थः ॥१५१॥ सप्तमचक्रे पूजां सवासनामाह- निरुद्धवायुसंघट्टस्फुटितग्रन्थिमूलतः। हृदयान्तरसंवित्तिशून्यपुर्यष्टकात्मना ॥१५२॥ लिये विद्याशक्ति की, अर्थात् सौभाग्यविद्या नामक पंचदशाक्षरी विद्या की, जो कि छत्तीस तत्त्वों की समष्टिरूपिणी है, विशुद्धि तब होती है, जब कि तत्त्वातीत परचित्स्व- रूप में वह एकाकार हो जाय। इसी अवस्था में साधक अपनी कामनाओं के अनुरूप प्राकाम्य नामक सिद्धि को प्राप्त कर सकता है। इस सिद्धि के विषय में महाकवि कालि- दास ने कहा है- हे ब्रह्मन्! द्रव रसात्मक नदी, समुद्र आदि, संघातकठिन पर्वत आदि, स्थूल, सूक्ष्म लघु, गुरु, व्यक्त (कार्य) और अव्यक्त (कारण) इन सभी स्वरूपों में आप विद्यमान हैं। यह सब आपकी प्राकाम्य नामक सिद्धि का प्रसाद है। अर्थात् ये सब परस्पर विरोधी गुण प्राकाम्य नामक सिद्धि के प्रसाद से ही आप में विद्यमान हैं॥ इसका अभिप्राय यह है कि प्राकाम्य नामक सिद्धि के मिल जाने पर साधक उक्त सभी स्वरूपों को अपनी इच्छा के अनुसार प्राप्त कर सकता है। इस चक्र में उक्त देव- ताओं की क्रम से पूजा करनी चाहिये। १पहले आवरण देवताओं की, बाद में चक्रेशी की और तब सिद्धि की, इस क्रम से सभी उपचारों से इनकी पूजा करनी चाहिये ॥१५१॥ अब सातवें चक्र में वासना के साथ पूजाविधि बताते हैं- निरुद्ध वायु के संघट्ट से जिसको ग्रन्थियाँ खुल गई हैं, ऐसे मूलाधार चक्र से उठ कर हृदय पद्म में स्थित संवित्ति में जो सूक्ष्म पुर्यष्टक के रूप में स्थित हैं, १. संज्ञिकां-क. ग.। २. नारूप-क. ग. उ.। ३. श्चापि-क. ग.। ४. इतः परम्- 'सर्वज्ञाद्याश्चक्रेशीसिद्धियुताः' इत्यधिकं-ख. ने. ज. झ. उ.। ५. वेकत्वम्-ख. ज. झ.। ६. सर्वैरूप-ख. ने. झ.। १. इस पूरे प्रकरण में पूजा का यही क्रम जानना चाहिये।
तृतीयः ] दीपिकाभाषानुवादसहितम् ३४३ बीजरूपस्वरकलास्पृष्टवर्गानुसारतः । रहस्ययोगिनीर्देवीः¹ संसारदलनोज्ज्वले ॥१५३॥ सर्वरोगहरे चक्रे संस्थिता वीरवन्दिते । वशिन्याद्याः ²निरुद्धयोः परिहृतस्वैराचारयोः, वायोः प्राणापानयोः, संघट्टात् "गुद- माकुञ्च्य बहुशः प्राणापानौ निरुध्य च । संयोज्य ते" इत्यभियुक्तवचनोक्तरीत्या संयोगात्, स्फुटितो ग्रन्थिः सुषुम्नान्तर्गतमूलाधारकमलपर्यन्तं वसन्, तादृशं मूलं मूलाधारम् । ततो हृदयान्तरसंवित्तिशून्यपुर्यष्टकात्मना । "ध्यायन् भुजगाकृतिं हुङ्कारविह्वलज्योतिः पवनक्षेपमनोभिर्गमयेदूर्ध्वम्" इत्यभियुक्तवचनोक्तरीत्या मूला- दुत्थितायाः ³कुण्डलिनीरूपायाः "ततो हृदयपद्मान्तः स्फुरन्तीं सांविदीं⁴ कलाम्" (सु० ३४) इत्यभियुक्तवचनोक्तरीत्या हृदयान्तरे स्फुरन्त्याः संवित्तेश्चिदात्मनः, चितिश्चत्तं च चैतन्यं चेतना⁵द्वयकर्म च । जीवः कला ⁶शरीरं च सूक्ष्मं पुर्यष्टकं मतम् ॥ उन वशिनी आदि देवियों की बीजरूप स्वर-कलाओं से संस्पृष्ट वर्गों का उच्चा- रण करते हुए पूजा करे । हे वीरवन्दिते ! ये वशिनी आदि रहस्ययोगिनी देवियाँ संसार के दलन में समर्थ सर्वरोगहर चक्र में निवास करती हैं ॥१५२-१५४॥ जिनकी मनमानी गति को रोक दिया गया है, उन प्राण और अपान वायुओं के संघट्ट से ग्रन्थियों का भेदन हो जाता है, अर्थात् "गुदा का संकोच कर और बार-बार प्राणायाम के अभ्यास से प्राण और अपान की गति को नियन्त्रित कर इनको एक में मिला देना चाहिये" किसी प्रामाणिक व्यक्ति के द्वारा बताई गई इस विधि से प्राण और अपान का संयोजन करने पर सुषुम्ना नाडी के अन्तर्गत मूलाधार आदि चक्रों में विद्यमान ग्रन्थियाँ टूट जाती हैं । तब मूलाधार से उठकर कुण्डलिनी शक्ति, हृदय में स्थित संवित्ति ही शून्य (सूक्ष्म) पुर्यष्टक का स्वरूप धारण कर लेती है । इस प्रसंग में किसी अभियुक्त ने कहा है—"भुजग (सर्प) के समान आकृति वाली कुण्डलिनी शक्ति का ध्यान करते हुए, हुंकार से इस कुण्ड- लिनी रूप दीपशिखा को कंपाते हुए, पवन की गति के साथ मन का संयोजन कर इसको ऊपर उठाये" । इसी तरह से मूलाधार से उठी इस कुण्डलिनी शक्ति का शिवानन्द मुनि के शब्दों में हृदयपद्म में स्फुरित हो रही संवित्ति कला के रूप में ध्यान करे । हृदय में स्फुरित हो रही इस संवित्ति कला से ही स्वच्छन्दसंग्रह में वर्णित सूक्ष्म पुर्यष्टक का स्फुरण होता है, जैसे कि— १. देवि-ख. ने. च. छ. ज. झ. ड. । २. 'निरु''''दुर्लक्ष्यत्वात्' नास्ति-ख. ने. ज. ड. । ३. कुण्डलिन्याः-झ. । ४. संविदं-झ. । ५. नेन्द्रिय-झ. । ६. च देवेशि-क. ग. झ. ।
३४४ योगिनीहृदयम् [ पूजासंकेतः इति स्वच्छन्दसंग्रहोक्तरीत्या सूक्ष्मपुर्यष्टकानां सूक्ष्मतया दुर्लक्ष्यत्वा¹च्छून्य[त्व]- मिति। “हृत्पुण्डरीकं पुरमध्यसंस्थम्” (म० ना० ८।१६) इति ²श्रुत्युक्तरीत्या पुरं शरीरं चिदष्टकरूपं शून्यशरीरं शून्यपुर्यष्टकम्, तदात्मना तद्रूपेण³, संस्थिता इत्यनुषङ्गः। “द्विधेयं मातृका देवी बीजयोन्यात्मना स्थिता” (श्लो० ४०) इति परापञ्चाशिको⁴क्तरीत्या बीजरूपाः ⁵“स्वरा अकारादिविसर्गान्ताः कलाः षोडश, ताभिः स्पृष्टा अवर्गेण युता वर्गाः कचटतपयशाः, तेषाम् अनुसारतः “अवर्गः प्रथमो देवि वशिनो तत्र संस्थिता” (१।७७-८०) इत्यादिचतुःशतीशास्त्रोक्ताः⁶, “उद्धरेत् प्रथमं रेफम्” (१।८१-८६) इत्यादिचतुःशतीशास्त्रोद्धृतस्वस्वबीजानुसारतः क्रमात् स्वस्ववर्गान्ते स्वस्वबीजमुच्चार्य पूजयेदित्यर्थः । चिति, चित्त, चैतन्य, ज्ञानेन्द्रिय, कर्मेन्द्रिय, जीव, कला और शरीर इन आठ तत्त्वों को सूक्ष्म पुर्यष्टक माना जाता है ॥ यह सूक्ष्म पुर्यष्टक अपनी सूक्ष्मता के कारण बहुत कठिनाई से दिखायी पड़ता है, इसीलिये इसको 'शून्य' नाम से जाना जाता है। “हृदय पुण्डरीक (पद्म) पुर (शरीर) के मध्य में स्थित है” इस श्रुतिवचन के अनुसार चिदष्टकरूप यह शून्य-शरीर सूक्ष्म पुर्यं- ष्टक के नाम से प्रथित है। इनकी अधिष्ठात्री वशिनी आदि देवियाँ यहीं निवास करती हैं। परापंचाशिका में बताया गया है- “यह मातृका देवी बीज और योनि के भेद से द्विधा विभक्त हो जाती है”। ¹बीजरूप हैं अकार से विसर्ग पर्यन्त सोलह स्वर । इस सोलह कलाओं वाले अवर्ग के साथ क च ट त प य श के वर्ग के क्रम से इनका उद्धार किया जाता है। “हे देवि! पहला अवर्ग है, इसमें वशिनी स्थित है” इत्यादि क्रम से चतुःशती शास्त्र (१।७७-८०) में इनका उद्धार बताया गया है। वहीं (१।८१-९६) “पहले रेफ का उद्धार करे” इत्यादि क्रम से इनके बीजों का भी उद्धार किया गया है। तदनुसार सूक्ष्म पुर्यष्टक की स्वामिनी वशिनी आदि आठ शक्तियों की अपने अपने वर्ग के अन्त में अपने अपने बीजों का उच्चारण करते हुए ²पूजा करे। १. सूक्ष्ममत्र शून्यमित्युच्यते-ख. ने. ज. झ. उ. । २. श्रत्युक्त्या-ख. ने. ज. झ. उ. । ३. णैताः-ख. ने. ज. झ. उ. । ४. कोक्त्या-ने. । ५. आदित्वरा अकारादिविसर्गान्ताः षोडशस्वराः कलाः, ताभिः-ख. ने. ज. उ. । ६. कत्वात्-ख. ने. ज. झ. उ. ।
- दीपिकाकार ने पहले (२।३७) ककार आदि व्यंजनों को बीज माना है और वहाँ चिद्गगनचन्द्रिका के अतिरिक्त परापञ्चाशिका के प्रस्तुत श्लोक को भी प्रमाण के रूप में उद्धृत किया है। पृ० १५४ की टिप्पणी देखिये ।
- शुभगोदय (पृ० २८६-२८७) में इसी क्रम से पूजाविधि बताई गई है।
तृतीयः ] दीपिकाभाषानुवादसहितम् ३४५ ननु चतुर्दशकोणादिषु १पूर्वंचक्रेषु देवतानां भूतलिपिमातृका२वर्णस्वरनवक- हादिपञ्चकटकतकचवर्गमयत्वमुक्तम्, अष्टकोणादिदेवतानां किमिति शिष्टपवर्ग- शषसमत्वं नोक्तमिति चेत्, ३सत्यम्, अष्टकोणदेवताबीजमनुक्तमप्यवगन्तव्यम् । बीजरूपस्वरकलास्पृष्टवर्गानुसारत इति तु वशिन्यादिदेवतापूजामन्त्रकथनम् । रहस्ययोगिनीः । सूक्ष्ममन्त्ररहस्यं पुर्यष्टकम्, तेन सह योगः संबन्धः कार्यकारण- लक्षणो यासां ता वशिन्याद्या योगिन्यः ४सूक्ष्मतया दुर्लक्ष्यपुर्यष्टकमयत्वाद गोपनीयाः। संसारदलनोज्ज्वले । अनित्याशुचिक्लेशरूपः५ संसारः, तस्य दलने हरणे, उज्ज्वले परप्रकाशतावन्मात्रे । अत एव ६सर्वरोगहरे चक्रे, सर्वं एवानित्या- शुचिक्लेशरूपसंसारो रोगः, तस्य हरणे पटुप्रभावशालिनि सप्तमचक्रे संस्थिता वशिन्याद्याः “अवर्गः प्रथमो देवि वशिनी तत्र संस्थिता” (१।७७) इति चतुःशती- शास्त्रोक्ताः, पूजयेदित्यनुषङ्गः ॥१५३-१५४॥ यहाँ शंका उठती है कि चतुर्दशकोण, बहिर्दशार और अन्तर्दशार चक्र में देवता का स्वरूप भूतलिपि मातृका के अनुसार वर्णित है। जैसे कि चतुर्दशकोण में नौ स्वर और हकार आदि पांच वर्ण हैं। बाह्य दशार में टवर्ग-तवर्ग तथा अन्तर्दशार में कवर्ग-चवर्ग हैं। इसी क्रम से अष्टकोण के देवताओं की अवशिष्ट पवर्ग और श ष स वर्णात्मकता का वर्णन यहाँ होना चाहिये, ऐसा क्यों नहीं किया गया ? समाधान यह है कि आपका कहना ठीक है। अष्टकोण के देवताओं के बीज यद्यपि यहाँ नहीं बताये गये हैं, तो भी बिना बताये ही उनके ये ही आठ बीज हैं, ऐसा जान लेना चाहिये । नववर्गात्मिका भूतलिपि के ४२ वर्ण तभी पूरे होते हैं। बीजरूपस्वरकला इत्यादि पंक्ति में वशिनी आदि देवताओं के पूजा-मन्त्रों का विधान किया गया है। इसकी व्याख्या ऊपर कर दी गई है। इनको रहस्ययोगिनी इसलिये कहा जाता है कि सूक्ष्म मन्त्र का रहस्य पुर्यष्टक में छिपा हुआ है। उस रहस्य के साथ वशिनी आदि का कार्यकारणरूप सम्बन्ध, संयोग बना हुआ है, अतः ये रहस्ययोगिनियाँ कहलाती हैं। अपनी सूक्ष्मता के कारण ये दुर्लक्ष्य हैं, अतः सूक्ष्मपुर्यष्टक की अधिष्ठात्री इन देवियों की उपासना अत्यन्त गोपनीय है। ये देवियाँ अनित्य, अशुचि, क्लेश आदि से भरे हुए इस संसार का नाश करने में समर्थ अपने पूर्ण प्रकाशमय स्वरूप वाले सर्वरोगहर चक्र में निवास करती हैं। अनित्यता, अपवित्रता आदि क्लेशों से भरा हुआ यह सारा संसार ही रोग है। इस रोग को दूर करने में १. 'पूर्वं' नास्ति-ख. ने. ज. उ. । २. 'वर्ण' नास्ति-ख. ने. ज. उ. । ३. उच्यते- चतुर्दशकोणादिचक्रेषु देवतानामकारादिभूतलिपिवर्णमयताकथनेनैव शिष्टवर्गशषसमयत्व- मष्टकोणदेवता-झ. । ४. 'सूक्ष्म....तावन्मात्रे' नास्ति-ख. ने. ज. झ. उ. । ५. रूपभेद इति क.विहाय सार्वत्रिकः पाठः । ६. 'सर्वरोगहरे चक्रे' नास्ति-ख. ने. ज. झ. उ. ।
३४६ योगिनीहृदयम् [ पूजासंकेतः तासां ध्यानमाह— रक्तवर्णा वरदाभयमुद्रिताः ॥१५४॥ पुस्तकं जपमालां१ च दधानाः सिद्धयोगिनीः । सिद्धः परमशिवः, तेन २योगः संबन्धः पुर्यष्टका३त्मकतया तस्य ४जीव- त्वापादनलक्षणः, तद्वतीः । शिष्टं स्पष्टम् ॥१५४-१५५॥ शुद्धविद्याविशुद्धिं च भुक्तिसिद्धिं महेश्वरि ॥१५५॥ ईश्वरीं त्रिपुरा५सिद्धिं पूजयेद् बिन्दुतर्पणैः । “अहन्तेदन्तयोरैक्यमतिर्विद्या निगद्यते” (श्लो० २१) इति परापञ्चाशिकोक्त- रीत्या शिवाद्वैतप्रथालक्षणायाः शुद्धविद्याया विशुद्धिः “ज्ञानेन ज्ञेयमालोक्य पश्चाज्ज्ञानं परित्यजेत्” (त० धा० ३।४१) इति ६प्रतिपादितरीत्या ज्ञातृज्ञानज्ञेय- विभागशून्यनिर्विकल्पबोधलक्षणपरशिवसमावेशः, तद्रूपिणीम्, अत एव भुक्तिसिद्धिम् इस चक्र का स्पष्ट प्रभाव सबको विदित है। इसी चक्र में चतुःशती शास्त्र (१।७७- ७९) में वर्णित वशिनी आदि आठ शक्तियों की पूजा करे ॥१५३-१५४॥ अब इनका ध्यान बताते हैं— इन शक्तियों का वर्ण लाल है। इन सिद्धयोगिनियों के चार हाथ वर और अभय मुद्रा से तथा पुस्तक और जपमाला से अलंकृत हैं ॥१५४-१५५॥ परमशिव रूपी सिद्ध को ये योगिनियाँ अपने पुर्यष्टकमय शरीर से संयुक्त कर अज्ञ जीव बना देती हैं, इसीलिये इनको यहाँ सिद्धयोगिनियाँ कहा गया है। बाकी का अर्थ स्पष्ट है ॥१५४-१५५॥ हे महेश्वरि ! शुद्धविद्या को विशुद्ध करने वाली भुक्ति सिद्धि की और चक्रेश्वरी त्रिपुरासिद्धि को यहाँ बिन्दुतर्पण द्वारा पूजा करे ॥१५५-१५६॥ परापंचाशिका में बताया गया है—"अहन्ता और इदन्ता में एकता को देखने वाली मति ही विद्या कहलाती है"। इस तरह से अद्वय शिवतत्त्व का ही सर्वत्र विस्तार देखने वाली मति शुद्धविद्या कहलाती है। "ज्ञान से ज्ञेय को जान लेने के बाद ज्ञान का भी परित्याग कर दे" इस उक्ति के अनुसार इस शुद्धविद्या का भी परित्याग कर उसकी विशुद्धि की जाती है। ऐसा करने से साधक ज्ञाता, ज्ञान और ज्ञेय नामक विभागों से रहित निर्विकल्प बोधस्वरूप परमशिव में समाविष्ट हो जाता है। शुद्धविद्या की विशुद्धि के द्वारा परमशिव स्वरूप में समावेश दिलाने वाली यह चक्रेश्वरी विद्या भुक्तिसिद्धि की १. लाञ्च-ख. छ. झ. उ. । २. संयोगः-क. ग. । ३. कात्मतया-ख. ने. ज. झ. उ. । ४. जीवतापा-ख. ने. ज. झ. उ. । ५. रां सिद्धां-क. ग. । ६. वचनप्रति-ख. ने. ज. झ. उ. ।
तृतीयः ] दीपिकाभाषानुवादसहितम् ३४७ विश्वं शिवादिभूम्यन्तं चमत्काररसाश्रयम् । ¹महीयसे महाभोक्त्रे महेशाय निवेदये ॥ (ग० स्तो०) इत्यभियुक्त२वचनोक्तरीत्या ३महाभुक्तिं विश्वविषयिणीं स्वसाधकस्य साधयति, तां चक्रेश्वरीं सप्तमचक्रेश्वरीम्, त्रिपुरासिद्धिं४ मातृमानमेयरूपाणां त्रिपुराणाम् ५उत्तीर्णपरमशिवलयलक्षणां सिद्धिम्, बिन्दुंतर्पणैरनामाङ्गुष्ठ६योगशिवशक्तिमेलन- मुद्रया द्रव्यबिन्दुतर्पणैः साक्षतकुसुमैः पूजयेदिति ॥१५५-१५७॥ अष्टमचक्रपूजां सवासनामाह— शक्तित्रयात्मिका देवि चिद्धामप्रसराः शिवाः७ ॥१५६॥ संवर्ताग्निकलारूपाः परमातिरहत्यकाः । पूर्णपूर्णस्वरूपायाः सिद्धेर्हेतुः सुरेश्वरि ॥१५७॥ भी अधिष्ठात्री है ।¹ भट्ट गंगाधर मिश्र के स्तोत्र में बताया गया है— अनेक आश्चर्य जनक पदार्थों से भरे हुए, अद्भुत रस की सृष्टि करने वाले, शिव से भूमि पर्यन्त विस्तार वाले इस विश्व को मैं महान् ऐश्वर्यशाली महाभोक्ता भगवान् महेश को समर्पित करता हूँ ।। इसके अनुसार यह सप्तम चक्रेश्वरी विद्या अपने साधक के लिये विश्वविषयिणी महाभुक्ति को उपस्थित कर देती है। इसीलिये भुक्तिसिद्धि की अधिष्ठात्री है । इसका नाम त्रिपुरासिद्धि इसलिये है कि यह माता, मान और मेय लक्षण त्रिपुरों से ऊपर उठाकर परम शिवतत्त्व में विलय रूप सिद्धि को प्रदान करने वाली है । अनामिका और अंगुष्ठ को मिलाने से शिवशक्तिमेलन मुद्रा बनती है। इस मुद्रा से अक्षत, पुष्प के साथ साधित अर्घ्य के बिन्दुओं से तर्पण कर इस देवी का पूजन करना चाहिये ॥१५५-१५६॥ अष्टम चक्र की पूजा वासना के साथ बताते हैं— हे देवि ! शक्तित्रयात्मक, चिद्धामप्रसरात्मक, कल्याणकारिणी, संवर्ताग्नि- कलारूप परम अतिरहस्य योगिनियाँ पूर्णपूर्ण स्वरूप सिद्धि को प्रदान कर १. नास्त्येषा पङ्क्तिः-क. । २. क्तोक्त्या-ख. ने. झ. । ३. महाभुक्तिविश्वविषयिणी स्वसाधकस्य सिद्धयति-ख. विहाय सार्वत्रिकः पाठः । ४. सिद्धां-क. ग. ने. ज. । ५. सिद्धिमृत्तीर्ण-ख. ज. । ६. योगलक्षणया-ख. ज. झ. उ. । ७. पराः-क. ग. । ८. तुतयेश्वरि-क. उ. । १. भट्ट गंगाधर मिश्र के दो वचन पहले (पृ० ८५, २४३) उद्धृत हो चुके हैं। पृ० ८५ की पहली टिप्पणी देखिये । ऋजुविमर्शिनी (पृ० ६९) में वे दोनों वचन उपलब्ध हैं। प्रस्तुत तीसरा वचन भी वहीं (पृ० १३४) भट्ट गंगाधर स्तोत्र के नाम से उद्धृत है। इस श्लोक का उत्तरार्ध क. मातृका के अतिरिक्त प्रायः सभी में उपलब्ध है ।
३४८ योगिनीहृदयम् [ पूजासंकेतः सर्वसिद्धिमयाख्ये तु चक्रे त्वायुधभूषिते¹। स्थिताः कामेश्वरीपूर्वश्चतस्रः पीठदेवताः ॥१५८॥ शक्तित्रयात्मिका इच्छाज्ञानक्रियात्मिकाः। चिद्धामप्रसराः चितः संविदोऽ- म्बिका२ख्याया धाम्नां किरणानां वामाज्येष्ठारौद्र्यात्मकानाम् ओड्डीशषष्ठीश- मित्रेशाख्यानां प्रसराः स्पन्दभूताः, ३सर्वावरणप्रधानभूतत्वात्। संवर्ताग्निकला- रूपाः संवर्ताग्निविश्वघस्मरः परमशिवोऽस्वरः४, तस्य कला हकारः, तद्रूपा- स्तदात्मिकाः, शान्ताशक्त्यवयवभूतत्वात्। परमातिरहस्यकाः परमाः सर्वावरण- देव५ताभ्योऽतिरहस्यका मनोबुद्ध्यहङ्काररूपोपाधित्रयपरिस्फुरत्परचिदाधाररूपत्वा- दत्यन्तगोपनीयाः। पूर्णापूर्णस्वरूपायाः पूर्णा परशिवसमावेशरूपत्वात्, ६[अ]- पूर्णस्वरूपा विश्वविषयत्वात्, तादृशायाः सिद्धेर् उभयात्मिकायाः। सर्वस्य क्षित्यादिशिवान्तस्थ परशिवविश्रान्तिलक्षणायाः सिद्धेर्जीवन्मुक्तेर्हेतुतया, सर्व- वाली हैं। हे सुरेश्वरि ! सर्वसिद्धिमय चक्र में आयुधों से भूषित कामेश्वरी प्रभृति चार पीठदेवियाँ निवास करती हैं ॥१५६-१५८॥ इच्छा, ज्ञान और क्रिया ये तीन शक्तियाँ हैं। चिद्धामप्रसर का अर्थ है चिति शक्ति, संविदात्मक अम्बिका शक्ति की किरणों का प्रसार। वामा, ज्येष्ठा और रौद्री शक्तियों का तथा ओड्डीश, षष्ठीश और मित्रेश नामक नाथों का स्पन्दन (प्रसार) कामेश्वरी आदि शक्तियों से ही होता है, जो कि अन्य सभी आवरण देवताओं की अपेक्षा प्रधान हैं। ये देवियाँ संवर्ताग्निकलारूप भी हैं। संवर्ताग्नि यहाँ सारे विश्व को भस्म कर देने वाला परमशिव है। उसकी कला हकार है। ये शक्तियाँ हकारात्मक हैं, क्योंकि शान्ता शक्ति की ये अवयवभूत हैं, उससे उत्पन्न हुई हैं। इसीलिये इनको परम अति- रहस्य योगिनियों के नाम से जाना जाता है। सभी आवरण देवताओं में इनका स्वरूप अत्यन्त रहस्यमय है। मन, बुद्धि और अहंकार रूप तीन उपाधियों के माध्यम से इनमें परा चितिशक्ति का स्वरूप स्फुरित होता है। इसलिये इनका स्वरूप अत्यन्त गोपनीय है। परमशिव का समावेश जहाँ सिद्ध होता है, वह सिद्धि पूर्णस्वरूपा है। जहाँ विषयाकार समावेश सिद्ध होता है, वह सिद्धि अपूर्णस्वरूपा है। इन उभयविध सिद्धियों को प्रदान करने वाली ये देवियाँ सर्वसिद्धिमय चक्र में निवास करती हैं। इसको सर्व- सिद्धिमय इसलिये कहते हैं कि पृथिवी से शिवपर्यन्त समस्त विश्व को यह परमशिव में १. षिताः-क. ग.। २. कादेव्याः-ने. झ.। ३. 'सर्वा****त्वात्' नास्ति-ख. ज. उ.। ४. 'अस्वरः' नास्ति-क. ग.। ५. ताभ्यः सर्वावरणप्रधानरूपत्वादतिगो-ख. ज. झ. उ.। ६. पूर्णस्वरूपायाः पूर्णतत्त्वमनु विश्वविषया सिद्धिस्तादृश्याः सिद्धेर्हेतुस्तदात्मिकायाः-ख. ने. ज. उ.।
तृतीयः ] दीपिकाभाषानुवादसहितम् ३४९ सिद्धिमयाख्ये निरुक्त(१।८४)सर्वसिद्धिमय^१नाम्नि, आयुधभूषिते^२ कामेश्वरी- कामेश्वरयोरायुधैः^३ शरचापपाशाङ्कुशैरष्टभिर्मिथुनीकृतैः “पश्चिमोत्तरपौरस्त्य- दक्षिणाशाक्रमेण तु” (१।१७९) इत्यादिवचतुःशतीशास्त्रोक्तरीत्याऽलङ्कृते^४ । तेन^५ आयुधानां ^६कामेश्वर्यावरणान्तःपातित्वं सिद्धम् ; चक्रेऽष्टमे स्थिताः कामेश्वरी- पूर्वाः “कामेश्वरीमग्रकोणे” (१।१८२) इति चतुःशतोशास्त्रो^७क्तरीत्या, चतस्रः पीठ- देवताः, पीठानि “का पू जा ओ इति क्रमात्” (१।४१) इति पूर्वोक्तानि मनोबुद्ध्य- हङ्कारचित्तलक्षणानि, तेषु संक्रान्ता देवताः परप्रकाशावयव^८भूतवामाज्येष्ठारौ- द्र्यम्बिकामयमित्रेशषष्ठीशओड्डीशचर्यानाथशिवाङ्कस्थास्तद्विमर्शशक्त्यंशभूतेच्छा- ज्ञानक्रियाशान्तामयकामेश्वरीवज्रेश्वरीभगमालिनीमहात्रिपुरसुन्दर्यश्चतस्र इति नवमचक्रदेवतया सह संकलनात् । अष्टमचक्रे तु तिस्र एव कामेश्वर्याद्याः सायुधाः ॥१५६-१५८॥ विश्राम रूप सिद्धि को, जीवन्मुक्तावस्था को दिलाने वाला है। सर्वसिद्धि पद की निर्वक्ति पहले (१।८४) बताई जा चुकी है। यह चक्र कामेश्वर और कामेश्वरी के आयुधों से अलंकृत है। शर, चाप, बाण और अंकुश को मिथुनीकृत करने पर, अर्थात् कामेश्वर और कामेश्वरी के आयुधों के रूप में मिलाकर गिनने पर इनकी संख्या आठ हो जाती है। इनका विन्यास चतुःशती शास्त्र (१।१७९) के अनुसार-“पश्चिम, उत्तर, पूर्व और दक्षिण दिशा के क्रम से” करना चाहिये। इस तरह से यह चक्र कामेश्वर और कामेश्वरी के आठ आयुधों से अलंकृत है। इससे यह सिद्ध होता है कि इन आयुधों की कामेश्वरी आदि आवरण देवताओं के साथ पूजा करनी चाहिये। अष्टम चक्र में स्थित कामेश्वरी आदि देवियाँ चतुःशती शास्त्र (१।१८२) में वर्णित हैं। ये चार पीठदेवता हैं। का पू जा ओ नामक पीठों का वर्णन पहले (१।४१) आ चुका है। ये पीठ ^१मन, बुद्धि, अहंकार और चित्त का प्रतिनिधित्व करते हैं। परप्रकाश के अवयवभूत वामा, ज्येष्ठा, रौद्री और अम्बिका शक्तिमय मित्रेश, षष्ठीश, ओड्डीश और चर्यानाथ के अंक (गोद) में स्थित विमर्श शक्ति की अवयवभूत इच्छा, ज्ञान, क्रिया और शान्ता शक्तिमय कामेश्वरी, वज्रेश्वरी, भगमालिनी और महात्रिपुरसुन्दरी नामक चार देवियाँ इनमें संक्रान्त होती हैं। यहाँ यह समझ लेना चाहिये कि नवम चक्र की स्वामिनी का भी संकलन करने पर ही इनकी संख्या चार होती है। अष्टम चक्र में तो केवल कामेश्वरो आदि तीन देवियों और आयुधों का ही पूजा होती है ॥१५६-१५८॥ १. मयानन्दे-ख. ने. ज. उ. । २. षिताः-क. ग. । ३. 'आयुधैः' नास्ति-ख. ने. ज. उ. । ४. ताश्च-क. ग. । ५. तेन-इति केवलं झमातृकायां दृश्यते । ६. कामेश्वर- कामेश्वर्योश्चरणा-क. ग. । ७. शास्त्रोक्ताश्च-ख. ने. ज. झ. उ. । ८. भूता-ज. झ. । १. पृ० ६१ पर उद्धृत सौभाग्यसुधोदय के चार श्लोकों में इस विषय की चर्चा पहले आ चुका है।