योगिनी हृदयम् (अमृतानन्दनाथ विमर्शिनी एवं पं. व्रजवल्लभ द्विवेदी सविस्तार सटीक)
Yogini Hridayam with Amritanandanatha Dipika by Vraj Vallabha Dwivedi
अमृतानन्दनाथ (भाष्यकार: पं. व्रजवल्लभ द्विवेदी) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंतृतीयः ] दीपिकाभाषानुवादसहितम् ३४७ विश्वं शिवादिभूम्यन्तं चमत्काररसाश्रयम् । ¹महीयसे महाभोक्त्रे महेशाय निवेदये ॥ (ग० स्तो०) इत्यभियुक्त२वचनोक्तरीत्या ३महाभुक्तिं विश्वविषयिणीं स्वसाधकस्य साधयति, तां चक्रेश्वरीं सप्तमचक्रेश्वरीम्, त्रिपुरासिद्धिं४ मातृमानमेयरूपाणां त्रिपुराणाम् ५उत्तीर्णपरमशिवलयलक्षणां सिद्धिम्, बिन्दुंतर्पणैरनामाङ्गुष्ठ६योगशिवशक्तिमेलन- मुद्रया द्रव्यबिन्दुतर्पणैः साक्षतकुसुमैः पूजयेदिति ॥१५५-१५७॥ अष्टमचक्रपूजां सवासनामाह— शक्तित्रयात्मिका देवि चिद्धामप्रसराः शिवाः७ ॥१५६॥ संवर्ताग्निकलारूपाः परमातिरहत्यकाः । पूर्णपूर्णस्वरूपायाः सिद्धेर्हेतुः सुरेश्वरि ॥१५७॥ भी अधिष्ठात्री है ।¹ भट्ट गंगाधर मिश्र के स्तोत्र में बताया गया है— अनेक आश्चर्य जनक पदार्थों से भरे हुए, अद्भुत रस की सृष्टि करने वाले, शिव से भूमि पर्यन्त विस्तार वाले इस विश्व को मैं महान् ऐश्वर्यशाली महाभोक्ता भगवान् महेश को समर्पित करता हूँ ।। इसके अनुसार यह सप्तम चक्रेश्वरी विद्या अपने साधक के लिये विश्वविषयिणी महाभुक्ति को उपस्थित कर देती है। इसीलिये भुक्तिसिद्धि की अधिष्ठात्री है । इसका नाम त्रिपुरासिद्धि इसलिये है कि यह माता, मान और मेय लक्षण त्रिपुरों से ऊपर उठाकर परम शिवतत्त्व में विलय रूप सिद्धि को प्रदान करने वाली है । अनामिका और अंगुष्ठ को मिलाने से शिवशक्तिमेलन मुद्रा बनती है। इस मुद्रा से अक्षत, पुष्प के साथ साधित अर्घ्य के बिन्दुओं से तर्पण कर इस देवी का पूजन करना चाहिये ॥१५५-१५६॥ अष्टम चक्र की पूजा वासना के साथ बताते हैं— हे देवि ! शक्तित्रयात्मक, चिद्धामप्रसरात्मक, कल्याणकारिणी, संवर्ताग्नि- कलारूप परम अतिरहस्य योगिनियाँ पूर्णपूर्ण स्वरूप सिद्धि को प्रदान कर १. नास्त्येषा पङ्क्तिः-क. । २. क्तोक्त्या-ख. ने. झ. । ३. महाभुक्तिविश्वविषयिणी स्वसाधकस्य सिद्धयति-ख. विहाय सार्वत्रिकः पाठः । ४. सिद्धां-क. ग. ने. ज. । ५. सिद्धिमृत्तीर्ण-ख. ज. । ६. योगलक्षणया-ख. ज. झ. उ. । ७. पराः-क. ग. । ८. तुतयेश्वरि-क. उ. । १. भट्ट गंगाधर मिश्र के दो वचन पहले (पृ० ८५, २४३) उद्धृत हो चुके हैं। पृ० ८५ की पहली टिप्पणी देखिये । ऋजुविमर्शिनी (पृ० ६९) में वे दोनों वचन उपलब्ध हैं। प्रस्तुत तीसरा वचन भी वहीं (पृ० १३४) भट्ट गंगाधर स्तोत्र के नाम से उद्धृत है। इस श्लोक का उत्तरार्ध क. मातृका के अतिरिक्त प्रायः सभी में उपलब्ध है ।