भारतकोश
योगिनी हृदयम् (अमृतानन्दनाथ विमर्शिनी एवं पं. व्रजवल्लभ द्विवेदी सविस्तार सटीक)

योगिनी हृदयम् (अमृतानन्दनाथ विमर्शिनी एवं पं. व्रजवल्लभ द्विवेदी सविस्तार सटीक)

Yogini Hridayam with Amritanandanatha Dipika by Vraj Vallabha Dwivedi

अमृतानन्दनाथ (भाष्यकार: पं. व्रजवल्लभ द्विवेदी) द्वारा

DevanagariHindipublished485 पृष्ठ

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३४६ योगिनीहृदयम् [ पूजासंकेतः तासां ध्यानमाह— रक्तवर्णा वरदाभयमुद्रिताः ॥१५४॥ पुस्तकं जपमालां१ च दधानाः सिद्धयोगिनीः । सिद्धः परमशिवः, तेन २योगः संबन्धः पुर्यष्टका३त्मकतया तस्य ४जीव- त्वापादनलक्षणः, तद्वतीः । शिष्टं स्पष्टम् ॥१५४-१५५॥ शुद्धविद्याविशुद्धिं च भुक्तिसिद्धिं महेश्वरि ॥१५५॥ ईश्वरीं त्रिपुरा५सिद्धिं पूजयेद् बिन्दुतर्पणैः । “अहन्तेदन्तयोरैक्यमतिर्विद्या निगद्यते” (श्लो० २१) इति परापञ्चाशिकोक्त- रीत्या शिवाद्वैतप्रथालक्षणायाः शुद्धविद्याया विशुद्धिः “ज्ञानेन ज्ञेयमालोक्य पश्चाज्ज्ञानं परित्यजेत्” (त० धा० ३।४१) इति ६प्रतिपादितरीत्या ज्ञातृज्ञानज्ञेय- विभागशून्यनिर्विकल्पबोधलक्षणपरशिवसमावेशः, तद्रूपिणीम्, अत एव भुक्तिसिद्धिम् इस चक्र का स्पष्ट प्रभाव सबको विदित है। इसी चक्र में चतुःशती शास्त्र (१।७७- ७९) में वर्णित वशिनी आदि आठ शक्तियों की पूजा करे ॥१५३-१५४॥ अब इनका ध्यान बताते हैं— इन शक्तियों का वर्ण लाल है। इन सिद्धयोगिनियों के चार हाथ वर और अभय मुद्रा से तथा पुस्तक और जपमाला से अलंकृत हैं ॥१५४-१५५॥ परमशिव रूपी सिद्ध को ये योगिनियाँ अपने पुर्यष्टकमय शरीर से संयुक्त कर अज्ञ जीव बना देती हैं, इसीलिये इनको यहाँ सिद्धयोगिनियाँ कहा गया है। बाकी का अर्थ स्पष्ट है ॥१५४-१५५॥ हे महेश्वरि ! शुद्धविद्या को विशुद्ध करने वाली भुक्ति सिद्धि की और चक्रेश्वरी त्रिपुरासिद्धि को यहाँ बिन्दुतर्पण द्वारा पूजा करे ॥१५५-१५६॥ परापंचाशिका में बताया गया है—"अहन्ता और इदन्ता में एकता को देखने वाली मति ही विद्या कहलाती है"। इस तरह से अद्वय शिवतत्त्व का ही सर्वत्र विस्तार देखने वाली मति शुद्धविद्या कहलाती है। "ज्ञान से ज्ञेय को जान लेने के बाद ज्ञान का भी परित्याग कर दे" इस उक्ति के अनुसार इस शुद्धविद्या का भी परित्याग कर उसकी विशुद्धि की जाती है। ऐसा करने से साधक ज्ञाता, ज्ञान और ज्ञेय नामक विभागों से रहित निर्विकल्प बोधस्वरूप परमशिव में समाविष्ट हो जाता है। शुद्धविद्या की विशुद्धि के द्वारा परमशिव स्वरूप में समावेश दिलाने वाली यह चक्रेश्वरी विद्या भुक्तिसिद्धि की १. लाञ्च-ख. छ. झ. उ. । २. संयोगः-क. ग. । ३. कात्मतया-ख. ने. ज. झ. उ. । ४. जीवतापा-ख. ने. ज. झ. उ. । ५. रां सिद्धां-क. ग. । ६. वचनप्रति-ख. ने. ज. झ. उ. ।