योगिनी हृदयम् (अमृतानन्दनाथ विमर्शिनी एवं पं. व्रजवल्लभ द्विवेदी सविस्तार सटीक)
Yogini Hridayam with Amritanandanatha Dipika by Vraj Vallabha Dwivedi
अमृतानन्दनाथ (भाष्यकार: पं. व्रजवल्लभ द्विवेदी) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंतृतीयः ] दीपिकाभाषानुवादसहितम् ३४५ ननु चतुर्दशकोणादिषु १पूर्वंचक्रेषु देवतानां भूतलिपिमातृका२वर्णस्वरनवक- हादिपञ्चकटकतकचवर्गमयत्वमुक्तम्, अष्टकोणादिदेवतानां किमिति शिष्टपवर्ग- शषसमत्वं नोक्तमिति चेत्, ३सत्यम्, अष्टकोणदेवताबीजमनुक्तमप्यवगन्तव्यम् । बीजरूपस्वरकलास्पृष्टवर्गानुसारत इति तु वशिन्यादिदेवतापूजामन्त्रकथनम् । रहस्ययोगिनीः । सूक्ष्ममन्त्ररहस्यं पुर्यष्टकम्, तेन सह योगः संबन्धः कार्यकारण- लक्षणो यासां ता वशिन्याद्या योगिन्यः ४सूक्ष्मतया दुर्लक्ष्यपुर्यष्टकमयत्वाद गोपनीयाः। संसारदलनोज्ज्वले । अनित्याशुचिक्लेशरूपः५ संसारः, तस्य दलने हरणे, उज्ज्वले परप्रकाशतावन्मात्रे । अत एव ६सर्वरोगहरे चक्रे, सर्वं एवानित्या- शुचिक्लेशरूपसंसारो रोगः, तस्य हरणे पटुप्रभावशालिनि सप्तमचक्रे संस्थिता वशिन्याद्याः “अवर्गः प्रथमो देवि वशिनी तत्र संस्थिता” (१।७७) इति चतुःशती- शास्त्रोक्ताः, पूजयेदित्यनुषङ्गः ॥१५३-१५४॥ यहाँ शंका उठती है कि चतुर्दशकोण, बहिर्दशार और अन्तर्दशार चक्र में देवता का स्वरूप भूतलिपि मातृका के अनुसार वर्णित है। जैसे कि चतुर्दशकोण में नौ स्वर और हकार आदि पांच वर्ण हैं। बाह्य दशार में टवर्ग-तवर्ग तथा अन्तर्दशार में कवर्ग-चवर्ग हैं। इसी क्रम से अष्टकोण के देवताओं की अवशिष्ट पवर्ग और श ष स वर्णात्मकता का वर्णन यहाँ होना चाहिये, ऐसा क्यों नहीं किया गया ? समाधान यह है कि आपका कहना ठीक है। अष्टकोण के देवताओं के बीज यद्यपि यहाँ नहीं बताये गये हैं, तो भी बिना बताये ही उनके ये ही आठ बीज हैं, ऐसा जान लेना चाहिये । नववर्गात्मिका भूतलिपि के ४२ वर्ण तभी पूरे होते हैं। बीजरूपस्वरकला इत्यादि पंक्ति में वशिनी आदि देवताओं के पूजा-मन्त्रों का विधान किया गया है। इसकी व्याख्या ऊपर कर दी गई है। इनको रहस्ययोगिनी इसलिये कहा जाता है कि सूक्ष्म मन्त्र का रहस्य पुर्यष्टक में छिपा हुआ है। उस रहस्य के साथ वशिनी आदि का कार्यकारणरूप सम्बन्ध, संयोग बना हुआ है, अतः ये रहस्ययोगिनियाँ कहलाती हैं। अपनी सूक्ष्मता के कारण ये दुर्लक्ष्य हैं, अतः सूक्ष्मपुर्यष्टक की अधिष्ठात्री इन देवियों की उपासना अत्यन्त गोपनीय है। ये देवियाँ अनित्य, अशुचि, क्लेश आदि से भरे हुए इस संसार का नाश करने में समर्थ अपने पूर्ण प्रकाशमय स्वरूप वाले सर्वरोगहर चक्र में निवास करती हैं। अनित्यता, अपवित्रता आदि क्लेशों से भरा हुआ यह सारा संसार ही रोग है। इस रोग को दूर करने में १. 'पूर्वं' नास्ति-ख. ने. ज. उ. । २. 'वर्ण' नास्ति-ख. ने. ज. उ. । ३. उच्यते- चतुर्दशकोणादिचक्रेषु देवतानामकारादिभूतलिपिवर्णमयताकथनेनैव शिष्टवर्गशषसमयत्व- मष्टकोणदेवता-झ. । ४. 'सूक्ष्म....तावन्मात्रे' नास्ति-ख. ने. ज. झ. उ. । ५. रूपभेद इति क.विहाय सार्वत्रिकः पाठः । ६. 'सर्वरोगहरे चक्रे' नास्ति-ख. ने. ज. झ. उ. ।