योगिनी हृदयम् (अमृतानन्दनाथ विमर्शिनी एवं पं. व्रजवल्लभ द्विवेदी सविस्तार सटीक)
Yogini Hridayam with Amritanandanatha Dipika by Vraj Vallabha Dwivedi
अमृतानन्दनाथ (भाष्यकार: पं. व्रजवल्लभ द्विवेदी) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें३४४ योगिनीहृदयम् [ पूजासंकेतः इति स्वच्छन्दसंग्रहोक्तरीत्या सूक्ष्मपुर्यष्टकानां सूक्ष्मतया दुर्लक्ष्यत्वा¹च्छून्य[त्व]- मिति। “हृत्पुण्डरीकं पुरमध्यसंस्थम्” (म० ना० ८।१६) इति ²श्रुत्युक्तरीत्या पुरं शरीरं चिदष्टकरूपं शून्यशरीरं शून्यपुर्यष्टकम्, तदात्मना तद्रूपेण³, संस्थिता इत्यनुषङ्गः। “द्विधेयं मातृका देवी बीजयोन्यात्मना स्थिता” (श्लो० ४०) इति परापञ्चाशिको⁴क्तरीत्या बीजरूपाः ⁵“स्वरा अकारादिविसर्गान्ताः कलाः षोडश, ताभिः स्पृष्टा अवर्गेण युता वर्गाः कचटतपयशाः, तेषाम् अनुसारतः “अवर्गः प्रथमो देवि वशिनो तत्र संस्थिता” (१।७७-८०) इत्यादिचतुःशतीशास्त्रोक्ताः⁶, “उद्धरेत् प्रथमं रेफम्” (१।८१-८६) इत्यादिचतुःशतीशास्त्रोद्धृतस्वस्वबीजानुसारतः क्रमात् स्वस्ववर्गान्ते स्वस्वबीजमुच्चार्य पूजयेदित्यर्थः । चिति, चित्त, चैतन्य, ज्ञानेन्द्रिय, कर्मेन्द्रिय, जीव, कला और शरीर इन आठ तत्त्वों को सूक्ष्म पुर्यष्टक माना जाता है ॥ यह सूक्ष्म पुर्यष्टक अपनी सूक्ष्मता के कारण बहुत कठिनाई से दिखायी पड़ता है, इसीलिये इसको 'शून्य' नाम से जाना जाता है। “हृदय पुण्डरीक (पद्म) पुर (शरीर) के मध्य में स्थित है” इस श्रुतिवचन के अनुसार चिदष्टकरूप यह शून्य-शरीर सूक्ष्म पुर्यं- ष्टक के नाम से प्रथित है। इनकी अधिष्ठात्री वशिनी आदि देवियाँ यहीं निवास करती हैं। परापंचाशिका में बताया गया है- “यह मातृका देवी बीज और योनि के भेद से द्विधा विभक्त हो जाती है”। ¹बीजरूप हैं अकार से विसर्ग पर्यन्त सोलह स्वर । इस सोलह कलाओं वाले अवर्ग के साथ क च ट त प य श के वर्ग के क्रम से इनका उद्धार किया जाता है। “हे देवि! पहला अवर्ग है, इसमें वशिनी स्थित है” इत्यादि क्रम से चतुःशती शास्त्र (१।७७-८०) में इनका उद्धार बताया गया है। वहीं (१।८१-९६) “पहले रेफ का उद्धार करे” इत्यादि क्रम से इनके बीजों का भी उद्धार किया गया है। तदनुसार सूक्ष्म पुर्यष्टक की स्वामिनी वशिनी आदि आठ शक्तियों की अपने अपने वर्ग के अन्त में अपने अपने बीजों का उच्चारण करते हुए ²पूजा करे। १. सूक्ष्ममत्र शून्यमित्युच्यते-ख. ने. ज. झ. उ. । २. श्रत्युक्त्या-ख. ने. ज. झ. उ. । ३. णैताः-ख. ने. ज. झ. उ. । ४. कोक्त्या-ने. । ५. आदित्वरा अकारादिविसर्गान्ताः षोडशस्वराः कलाः, ताभिः-ख. ने. ज. उ. । ६. कत्वात्-ख. ने. ज. झ. उ. ।
- दीपिकाकार ने पहले (२।३७) ककार आदि व्यंजनों को बीज माना है और वहाँ चिद्गगनचन्द्रिका के अतिरिक्त परापञ्चाशिका के प्रस्तुत श्लोक को भी प्रमाण के रूप में उद्धृत किया है। पृ० १५४ की टिप्पणी देखिये ।
- शुभगोदय (पृ० २८६-२८७) में इसी क्रम से पूजाविधि बताई गई है।