भारतकोश
योगिनी हृदयम् (अमृतानन्दनाथ विमर्शिनी एवं पं. व्रजवल्लभ द्विवेदी सविस्तार सटीक)

योगिनी हृदयम् (अमृतानन्दनाथ विमर्शिनी एवं पं. व्रजवल्लभ द्विवेदी सविस्तार सटीक)

Yogini Hridayam with Amritanandanatha Dipika by Vraj Vallabha Dwivedi

अमृतानन्दनाथ (भाष्यकार: पं. व्रजवल्लभ द्विवेदी) द्वारा

DevanagariHindipublished485 पृष्ठ

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तृतीयः ] दीपिकाभाषानुवादसहितम् ३४३ बीजरूपस्वरकलास्पृष्टवर्गानुसारतः । रहस्ययोगिनीर्देवीः¹ संसारदलनोज्ज्वले ॥१५३॥ सर्वरोगहरे चक्रे संस्थिता वीरवन्दिते । वशिन्याद्याः ²निरुद्धयोः परिहृतस्वैराचारयोः, वायोः प्राणापानयोः, संघट्टात् "गुद- माकुञ्च्य बहुशः प्राणापानौ निरुध्य च । संयोज्य ते" इत्यभियुक्तवचनोक्तरीत्या संयोगात्, स्फुटितो ग्रन्थिः सुषुम्नान्तर्गतमूलाधारकमलपर्यन्तं वसन्, तादृशं मूलं मूलाधारम् । ततो हृदयान्तरसंवित्तिशून्यपुर्यष्टकात्मना । "ध्यायन् भुजगाकृतिं हुङ्कारविह्वलज्योतिः पवनक्षेपमनोभिर्गमयेदूर्ध्वम्" इत्यभियुक्तवचनोक्तरीत्या मूला- दुत्थितायाः ³कुण्डलिनीरूपायाः "ततो हृदयपद्मान्तः स्फुरन्तीं सांविदीं⁴ कलाम्" (सु० ३४) इत्यभियुक्तवचनोक्तरीत्या हृदयान्तरे स्फुरन्त्याः संवित्तेश्चिदात्मनः, चितिश्चत्तं च चैतन्यं चेतना⁵द्वयकर्म च । जीवः कला ⁶शरीरं च सूक्ष्मं पुर्यष्टकं मतम् ॥ उन वशिनी आदि देवियों की बीजरूप स्वर-कलाओं से संस्पृष्ट वर्गों का उच्चा- रण करते हुए पूजा करे । हे वीरवन्दिते ! ये वशिनी आदि रहस्ययोगिनी देवियाँ संसार के दलन में समर्थ सर्वरोगहर चक्र में निवास करती हैं ॥१५२-१५४॥ जिनकी मनमानी गति को रोक दिया गया है, उन प्राण और अपान वायुओं के संघट्ट से ग्रन्थियों का भेदन हो जाता है, अर्थात् "गुदा का संकोच कर और बार-बार प्राणायाम के अभ्यास से प्राण और अपान की गति को नियन्त्रित कर इनको एक में मिला देना चाहिये" किसी प्रामाणिक व्यक्ति के द्वारा बताई गई इस विधि से प्राण और अपान का संयोजन करने पर सुषुम्ना नाडी के अन्तर्गत मूलाधार आदि चक्रों में विद्यमान ग्रन्थियाँ टूट जाती हैं । तब मूलाधार से उठकर कुण्डलिनी शक्ति, हृदय में स्थित संवित्ति ही शून्य (सूक्ष्म) पुर्यष्टक का स्वरूप धारण कर लेती है । इस प्रसंग में किसी अभियुक्त ने कहा है—"भुजग (सर्प) के समान आकृति वाली कुण्डलिनी शक्ति का ध्यान करते हुए, हुंकार से इस कुण्ड- लिनी रूप दीपशिखा को कंपाते हुए, पवन की गति के साथ मन का संयोजन कर इसको ऊपर उठाये" । इसी तरह से मूलाधार से उठी इस कुण्डलिनी शक्ति का शिवानन्द मुनि के शब्दों में हृदयपद्म में स्फुरित हो रही संवित्ति कला के रूप में ध्यान करे । हृदय में स्फुरित हो रही इस संवित्ति कला से ही स्वच्छन्दसंग्रह में वर्णित सूक्ष्म पुर्यष्टक का स्फुरण होता है, जैसे कि— १. देवि-ख. ने. च. छ. ज. झ. ड. । २. 'निरु''''दुर्लक्ष्यत्वात्' नास्ति-ख. ने. ज. ड. । ३. कुण्डलिन्याः-झ. । ४. संविदं-झ. । ५. नेन्द्रिय-झ. । ६. च देवेशि-क. ग. झ. ।