भारतकोश
योगिनी हृदयम् (अमृतानन्दनाथ विमर्शिनी एवं पं. व्रजवल्लभ द्विवेदी सविस्तार सटीक)

योगिनी हृदयम् (अमृतानन्दनाथ विमर्शिनी एवं पं. व्रजवल्लभ द्विवेदी सविस्तार सटीक)

Yogini Hridayam with Amritanandanatha Dipika by Vraj Vallabha Dwivedi

अमृतानन्दनाथ (भाष्यकार: पं. व्रजवल्लभ द्विवेदी) द्वारा

DevanagariHindipublished485 पृष्ठ

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३४२ योगिनीहृदयम् [पूजासंकेतः विद्याशक्तेः सौभाग्यविद्यावर्णवाच्यायाः षट्त्रिंशत्तत्त्वमय्या विशुद्धिस्तदतीत- परचिल्लक्षणा, तद्रूपाम्। प्राकाम्यसंज्ञितां१ सिद्धिं कामना२नुरूपलक्षणाम्। तदुक्तं महाकविभिः- द्रवः संघातकठिनः स्थूलः सूक्ष्मो लघुर्गुरुः। व्यक्तो व्यक्तेतरश्चासि३ प्राकाम्यं ते विभूतिषु ॥ इति। (कु० स० २।११) एता देवताः४, क्रमात् प्रथमम् आवरणदेवताः, पश्चाच्चक्रेशीम्, ततः सिद्धि- मिति क्रमात्। सर्वोपचारेण। जाता५वेकवचनम्। ६सर्वोपचारैः पूजयेदि- त्यर्थः ॥१५१॥ सप्तमचक्रे पूजां सवासनामाह- निरुद्धवायुसंघट्टस्फुटितग्रन्थिमूलतः। हृदयान्तरसंवित्तिशून्यपुर्यष्टकात्मना ॥१५२॥ लिये विद्याशक्ति की, अर्थात् सौभाग्यविद्या नामक पंचदशाक्षरी विद्या की, जो कि छत्तीस तत्त्वों की समष्टिरूपिणी है, विशुद्धि तब होती है, जब कि तत्त्वातीत परचित्स्व- रूप में वह एकाकार हो जाय। इसी अवस्था में साधक अपनी कामनाओं के अनुरूप प्राकाम्य नामक सिद्धि को प्राप्त कर सकता है। इस सिद्धि के विषय में महाकवि कालि- दास ने कहा है- हे ब्रह्मन्! द्रव रसात्मक नदी, समुद्र आदि, संघातकठिन पर्वत आदि, स्थूल, सूक्ष्म लघु, गुरु, व्यक्त (कार्य) और अव्यक्त (कारण) इन सभी स्वरूपों में आप विद्यमान हैं। यह सब आपकी प्राकाम्य नामक सिद्धि का प्रसाद है। अर्थात् ये सब परस्पर विरोधी गुण प्राकाम्य नामक सिद्धि के प्रसाद से ही आप में विद्यमान हैं॥ इसका अभिप्राय यह है कि प्राकाम्य नामक सिद्धि के मिल जाने पर साधक उक्त सभी स्वरूपों को अपनी इच्छा के अनुसार प्राप्त कर सकता है। इस चक्र में उक्त देव- ताओं की क्रम से पूजा करनी चाहिये। १पहले आवरण देवताओं की, बाद में चक्रेशी की और तब सिद्धि की, इस क्रम से सभी उपचारों से इनकी पूजा करनी चाहिये ॥१५१॥ अब सातवें चक्र में वासना के साथ पूजाविधि बताते हैं- निरुद्ध वायु के संघट्ट से जिसको ग्रन्थियाँ खुल गई हैं, ऐसे मूलाधार चक्र से उठ कर हृदय पद्म में स्थित संवित्ति में जो सूक्ष्म पुर्यष्टक के रूप में स्थित हैं, १. संज्ञिकां-क. ग.। २. नारूप-क. ग. उ.। ३. श्चापि-क. ग.। ४. इतः परम्- 'सर्वज्ञाद्याश्चक्रेशीसिद्धियुताः' इत्यधिकं-ख. ने. ज. झ. उ.। ५. वेकत्वम्-ख. ज. झ.। ६. सर्वैरूप-ख. ने. झ.। १. इस पूरे प्रकरण में पूजा का यही क्रम जानना चाहिये।