योगिनी हृदयम् (अमृतानन्दनाथ विमर्शिनी एवं पं. व्रजवल्लभ द्विवेदी सविस्तार सटीक)
Yogini Hridayam with Amritanandanatha Dipika by Vraj Vallabha Dwivedi
अमृतानन्दनाथ (भाष्यकार: पं. व्रजवल्लभ द्विवेदी) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें३४८ योगिनीहृदयम् [ पूजासंकेतः सर्वसिद्धिमयाख्ये तु चक्रे त्वायुधभूषिते¹। स्थिताः कामेश्वरीपूर्वश्चतस्रः पीठदेवताः ॥१५८॥ शक्तित्रयात्मिका इच्छाज्ञानक्रियात्मिकाः। चिद्धामप्रसराः चितः संविदोऽ- म्बिका२ख्याया धाम्नां किरणानां वामाज्येष्ठारौद्र्यात्मकानाम् ओड्डीशषष्ठीश- मित्रेशाख्यानां प्रसराः स्पन्दभूताः, ३सर्वावरणप्रधानभूतत्वात्। संवर्ताग्निकला- रूपाः संवर्ताग्निविश्वघस्मरः परमशिवोऽस्वरः४, तस्य कला हकारः, तद्रूपा- स्तदात्मिकाः, शान्ताशक्त्यवयवभूतत्वात्। परमातिरहस्यकाः परमाः सर्वावरण- देव५ताभ्योऽतिरहस्यका मनोबुद्ध्यहङ्काररूपोपाधित्रयपरिस्फुरत्परचिदाधाररूपत्वा- दत्यन्तगोपनीयाः। पूर्णापूर्णस्वरूपायाः पूर्णा परशिवसमावेशरूपत्वात्, ६[अ]- पूर्णस्वरूपा विश्वविषयत्वात्, तादृशायाः सिद्धेर् उभयात्मिकायाः। सर्वस्य क्षित्यादिशिवान्तस्थ परशिवविश्रान्तिलक्षणायाः सिद्धेर्जीवन्मुक्तेर्हेतुतया, सर्व- वाली हैं। हे सुरेश्वरि ! सर्वसिद्धिमय चक्र में आयुधों से भूषित कामेश्वरी प्रभृति चार पीठदेवियाँ निवास करती हैं ॥१५६-१५८॥ इच्छा, ज्ञान और क्रिया ये तीन शक्तियाँ हैं। चिद्धामप्रसर का अर्थ है चिति शक्ति, संविदात्मक अम्बिका शक्ति की किरणों का प्रसार। वामा, ज्येष्ठा और रौद्री शक्तियों का तथा ओड्डीश, षष्ठीश और मित्रेश नामक नाथों का स्पन्दन (प्रसार) कामेश्वरी आदि शक्तियों से ही होता है, जो कि अन्य सभी आवरण देवताओं की अपेक्षा प्रधान हैं। ये देवियाँ संवर्ताग्निकलारूप भी हैं। संवर्ताग्नि यहाँ सारे विश्व को भस्म कर देने वाला परमशिव है। उसकी कला हकार है। ये शक्तियाँ हकारात्मक हैं, क्योंकि शान्ता शक्ति की ये अवयवभूत हैं, उससे उत्पन्न हुई हैं। इसीलिये इनको परम अति- रहस्य योगिनियों के नाम से जाना जाता है। सभी आवरण देवताओं में इनका स्वरूप अत्यन्त रहस्यमय है। मन, बुद्धि और अहंकार रूप तीन उपाधियों के माध्यम से इनमें परा चितिशक्ति का स्वरूप स्फुरित होता है। इसलिये इनका स्वरूप अत्यन्त गोपनीय है। परमशिव का समावेश जहाँ सिद्ध होता है, वह सिद्धि पूर्णस्वरूपा है। जहाँ विषयाकार समावेश सिद्ध होता है, वह सिद्धि अपूर्णस्वरूपा है। इन उभयविध सिद्धियों को प्रदान करने वाली ये देवियाँ सर्वसिद्धिमय चक्र में निवास करती हैं। इसको सर्व- सिद्धिमय इसलिये कहते हैं कि पृथिवी से शिवपर्यन्त समस्त विश्व को यह परमशिव में १. षिताः-क. ग.। २. कादेव्याः-ने. झ.। ३. 'सर्वा****त्वात्' नास्ति-ख. ज. उ.। ४. 'अस्वरः' नास्ति-क. ग.। ५. ताभ्यः सर्वावरणप्रधानरूपत्वादतिगो-ख. ज. झ. उ.। ६. पूर्णस्वरूपायाः पूर्णतत्त्वमनु विश्वविषया सिद्धिस्तादृश्याः सिद्धेर्हेतुस्तदात्मिकायाः-ख. ने. ज. उ.।