भारतकोश
योगिनी हृदयम् (अमृतानन्दनाथ विमर्शिनी एवं पं. व्रजवल्लभ द्विवेदी सविस्तार सटीक)

योगिनी हृदयम् (अमृतानन्दनाथ विमर्शिनी एवं पं. व्रजवल्लभ द्विवेदी सविस्तार सटीक)

Yogini Hridayam with Amritanandanatha Dipika by Vraj Vallabha Dwivedi

अमृतानन्दनाथ (भाष्यकार: पं. व्रजवल्लभ द्विवेदी) द्वारा

DevanagariHindipublished485 पृष्ठ

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तृतीयः ] दीपिकाभाषानुवादसहितम् ३२७ संघट्टे सत्येकारैकौकारौ जायेते इत्यर्थः । तदुक्तं परापञ्चाशिकायाम्— अनुत्तरानन्दशवती इच्छाशक्तौ नियोजिते । त्रिकोणमय षट्कोणमिच्छायां रूढिमा गते ॥ (श्लो० २४) इति, ते एवोन्मेषयोगेन क्रियाशवितस्फुटं वपुः । उक्तं शक्तित्रिसंघट्टत्रिशूलं द्वैतघस्मरम् ॥ (श्लो० ३५-३६) इति च । मिश्रेच्छाभावितैरपि इच्छेशनान्तरारूढाः स्फुटास्फुटजगन्मयाः । चत्वारः २परतो वर्णाः षण्ढात्मानः प्रचोदिताः ॥ (श्लो० ३३) निष्पत्ति होती है । संघट्ट (सन्धि) से उत्पन्न होने के कारण ये चार स्वर १सन्ध्यक्षर कहलाते हैं । परापंचाशिका में यह विषय इस तरह से वर्णित है— अनुत्तर (अकार) और आनन्द (आकार) शक्ति जब इच्छा शक्ति (इकार) से नियो- जित होती हैं, तो क्रमशः त्रिकोण (एकार) और षट्कोण (ऐकार) का स्वरूप स्पष्ट हो उठता है । उन्हीं अनुत्तर (अकार) और आनन्द (आकार) शक्तियों का उन्मेष शक्ति (उकार) से योग होने पर क्रमशः ओकार और तीन शक्तियों के संघट्ट स्वरूप औकार की निष्पत्ति होती है । यह त्रिशूल (औकार) सारे द्वैतप्रपंच को भस्म कर देने वाला है ॥ मिश्रेच्छाभावित शब्द का अर्थ भी परापंचाशिका की सहायता से जाना जा सकता है । वहाँ बताया गया है— २इच्छा और ईशन के मध्य में आरूढ, स्फुट और अस्फुट (मिश्रित) स्वरूप वाले आगे के चार वर्ण षण्ढ कहे जाते हैं ॥ १. शक्ती-ख. ने. ज. झ., शक्तेः-मु. । २. पुरतो-ख. ने. ज. झ. उ. । १. चार सन्ध्यक्षरों के उत्पत्तिक्रम की तुलना सौभाग्यसुधोदय (१।२२-२३) तथा तन्त्रालोक (३।९३-९७) से कीजिये । ओकार की त्रिशूलता की उपपत्ति तन्त्रालोक (३।१०४-१०५) में बताई गई है । २. सौभाग्यसुधोदय (१।२०-२१) में चार षण्ढ स्वरों की उत्पत्ति की प्रक्रिया स्पष्ट की गई है । तदनुसार प्रकाशात्मक अकार का स्वरूप धारण करने वाला परप्रमाता आदि- शिव अपनी विमर्श शक्ति को जगा कर जब इच्छाशक्ति के सहारे सारे जगत् की सृष्टि करना चाहता है, तो उस समय उसमें ईशन शक्ति का उदय होने लगता है । इच्छा- शक्ति के उन्मेष के बाद और ईशन शक्ति के उन्मेष से पहले, अर्थात् दोनों की अन्तराल अवस्था में मिश्रित स्वरूप वाले चार स्वरों की निष्पत्ति होती है । इनमें ह्रस्व स्वरों क अभिव्यक्ति में इच्छा (इकार) का और दीर्घ स्वरों की अभिव्यक्ति में ईशन (ईकार) का योगदान रहता है । शिक्षा ग्रन्थों और व्याकरण शास्त्र में वर्णों के उच्चारण के स्थानों का वर्णन मिलता है । वहाँ भी इकार और उकार के उच्चारण स्थान के बीच में ऋकार और ऌकार का स्थान माना गया है ।