योगिनी हृदयम् (अमृतानन्दनाथ विमर्शिनी एवं पं. व्रजवल्लभ द्विवेदी सविस्तार सटीक)
Yogini Hridayam with Amritanandanatha Dipika by Vraj Vallabha Dwivedi
अमृतानन्दनाथ (भाष्यकार: पं. व्रजवल्लभ द्विवेदी) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें३२६ योगिनीहृदयम् [ पूजासंकेतः अकुलसंघट्टरूपैः । अकुलं ब्रह्मारन्ध्राधोमुखसितसहस्रदलकमलम्, तत्र- स्थोऽकारः “अकारः सर्ववर्णाग्र्यः प्रकाशः परमः शिवः” इति¹ संकेतपद्धत्युक्तोऽकारः परमशिवात्मकोऽकुलशब्देन लक्ष्यते । तेन संघट्टः संबन्धः, ²तद्रूपैः । इच्छाशक्ति- प्रधानकैः । इच्छाशक्तिरिकारः । उन्मेषशक्तिप्रसरैः । उन्मेषशक्तिरुकारः । तदुक्तं परापञ्चाशिकायाम्— अनुत्तरेच्छे³ उन्मेष आनन्देशनमूनता । क्रियेच्छाज्ञानशक्तीनां सत्ता चोच्छूनता च षट् ।। (श्लो० ३२) इति । कोऽर्थः ? मूलोत्थिताया इच्छाशक्तेः ⁴कुलकुण्डलिन्या अकुलस्थेन अकारेण संघट्टे सत्येकारो जायते । ⁵तस्यैवोन्मेषशक्तिसंघट्टे सत्योकारो जायते । तयोरेवाऽकुल- ब्रह्मारन्ध्र स्थित अधोमुख श्वेत सहस्रदल कमल को अकुल कहा जाता है । इस कमल में विद्यमान अकार भी अकुल कहलाता है । संकेतपद्धति के अनुसार यह अकार प्रकाशा- त्मक परम शिव है और सभी वर्णों का आदि कारण है, अतः यह भी अकुल शब्द से लक्षित होता है । आगे बताये गये सभी वर्ण इससे संबद्ध है । अकार के बाद इन वर्णों में इच्छा शक्ति स्वरूप इकार की प्रधानता रहती है और इसके बाद उन्मेष शक्ति स्वरूप उकार का प्रसार होता है । परापंचाशिका में बताया गया है— क्रिया, इच्छा और ज्ञान शक्ति की की ¹सत्ता से अनुत्तर (अकार), इच्छा (इकार) और उन्मेष (उकार) की तथा उच्छूनता (अंकुरण) से आनन्द (आकार), ईशन (ईकार) और ऊनता (ऊकार) इन छः वर्णों की सृष्टि होती है ॥ ऊपर बताये गये छः वर्णों के बाद चार सन्ध्यक्षरों की उत्पत्ति का क्रम इस प्रकार है— मूलाधार से उठी कुलकुण्डलिनी रूप इच्छाशक्ति (इकार) का जब अकुल स्थित अकार से संघट्ट होता है, तो इससे एकार की उत्पत्ति होती है । उसी अकार का उन्मेष शक्ति (उकार) से संघट्ट होता है, तो ओकार की उत्पत्ति होती है । बाद में इन एकार और ओकार का अकुल (अकार) से संघट्ट होने पर ऐकार और औकार इन दो स्वरों की १. त्युक्तरीत्या-क. ग. उ. । २. 'तद्रूपैः''''शक्तिरुकारः' नास्ति-ख. ने. ब. उ. । ३. च्छा उन्मेषाः-क. । ४. कुलाकुल-ने. उ. । ५. उन्मेषशक्तिरूपायास्तस्या एवाकुल- संघट्टे-ख. ने. ज. झ. उ. ।
- सौभाग्यसुधोदय (१।१८-१९) में सत्ता को शिव का तथा उद्रेक को शक्ति का प्रतीक माना गया है । वामा, ज्येष्ठा और रौद्री शक्तियाँ सत्ता के अंश है । इनसे क्रमशः अकार, इकार, उकार की अभिव्यक्ति होती है । इच्छा, ज्ञान और क्रिया शक्तियाँ उद्रेक के अंश हैं । इनसे क्रमशः आकार, ईकार, ऊकार की अभिव्यक्ति होती है । तदनुसार परापंचाशिका में भी इच्छा, ज्ञान और क्रिया शब्द से उपलक्षण के रूप में वामा, ज्येष्ठा और रौद्री का भी ग्रहण कर लेना चाहिये ।