भारतकोश
योगिनी हृदयम् (अमृतानन्दनाथ विमर्शिनी एवं पं. व्रजवल्लभ द्विवेदी सविस्तार सटीक)

योगिनी हृदयम् (अमृतानन्दनाथ विमर्शिनी एवं पं. व्रजवल्लभ द्विवेदी सविस्तार सटीक)

Yogini Hridayam with Amritanandanatha Dipika by Vraj Vallabha Dwivedi

अमृतानन्दनाथ (भाष्यकार: पं. व्रजवल्लभ द्विवेदी) द्वारा

DevanagariHindipublished485 पृष्ठ

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तृतीयः ] दीपिकाभाषानुवादसहितम् ३२५ त्रैलोक्यमोहनादिचक्रत्रये वैखरीमयतावासनामुक्त्वा सर्वसौभाग्यदायकादि- चक्रत्रये भूतलिपिमध्यमामयवासनामाह— उन्मेषशक्तिप्रसरैरिरिच्छाशक्तिप्रधानकैः ॥१३६॥ तथैवा¹कुलसंघट्टरुपवर्णचतुष्टयैः । वेद्योष्मरूपसौ²द्यर्णमिश्रेच्छाभावितैरपि ॥१३७॥ कुलशक्तिसमावेशरूपवर्णद्वयान्वितैः । किया जाता है और उसके विशेषण के रूप में 'भाविवर्णोत्पत्ति' इस समस्त पद को जोड़ दिया जाता है ॥ १३५-१३६ ॥ त्रैलोक्यमोहन आदि तीन चक्रों में वैखरी वर्णों की वासना (भावना) बताई गई है, अब सर्वसौभाग्यदायक आदि तीन चक्रों में भूतलिपिमय मध्यमा वाणी के वर्णों की वासना बताते हैं— अकुलसंघट्टरूप, इच्छाशक्ति प्रधान और उन्मेष शक्ति रूप तीन वर्णों से और इनके प्रसार रूप चार वर्णों से, मिश्रेच्छाभावित दो वर्णों से, वेद्योष्म रूप हकार आदि वर्णों से और कुलशक्तिसमावेश रूप दो वर्णों से ¹भूतलिपि के चतुर्दश वर्णात्मक तीन वर्ग बनते हैं ॥ १३६-१३७ ॥ १. तदेवा-क. ग. । २. सावर्णै-ख. ग. ज. ।

  1. शारदातिलक (७।१-४) के आधार पर ९ वर्ग और ४२ वर्ण वाली भूतलिपि का क्रम इस प्रकार बनता है— अ इ उ ऋ ऌ प्रथम वर्ग ए ऐ ओ औ द्वितीय वर्ग ह य र ल व तृतीय वर्ग ङ क ख घ ग चतुर्थ वर्ग ञ च छ झ ज पंचम वर्ग ण ट ठ ढ ड षष्ठ वर्ग न त थ ध द सप्तम वर्ग म प फ भ ब अष्टम वर्ग श ष स नवम वर्ग कामकलाविलास की चिद्वल्ली टीका (पृ० ५०) में भूतलिपि पद का अर्थ मिलता है । योगिनीहृदय के प्रस्तुत प्रकरण में मनुकोण, दशारद्वय तथा वसुकोण चक्रों में इस भूतलिपि का विन्यास-क्रम बताया गया है । कामकलाविलास (श्लोक २७-३१) में भी यह विषय देखा जा सकता है¹।