भारतकोश
योगिनी हृदयम् (अमृतानन्दनाथ विमर्शिनी एवं पं. व्रजवल्लभ द्विवेदी सविस्तार सटीक)

योगिनी हृदयम् (अमृतानन्दनाथ विमर्शिनी एवं पं. व्रजवल्लभ द्विवेदी सविस्तार सटीक)

Yogini Hridayam with Amritanandanatha Dipika by Vraj Vallabha Dwivedi

अमृतानन्दनाथ (भाष्यकार: पं. व्रजवल्लभ द्विवेदी) द्वारा

DevanagariHindipublished485 पृष्ठ

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३२४ | योगिनीहृदयम् | [ पूजासंकेतः

वक्ष्यति- "द्वादशग्रन्थिभेदेन वर्णान् नाड्यन्तरे प्रिये" (३।१८४) इति । $^१$"यदोल्ल- सति शृङ्गाटपीठात् कुटिलरूपिणी" (४।१२) इति चतुःशतीशास्त्रोक्तरीत्या समुल्लसिताया $^२$उद्गच्छन्त्याः संविदः कुण्डलिन्या द्वादशग्रन्थिभेदेन विसर्गान्त- दशावेशात् । विसर्गः षोडशः स्वरः । तेन विसर्गशब्देन षोडशसंख्या गृह्यते । अतो विसर्गान्तं षोडशान्तम् यत् षोडशकलाकारं भूतान्तं व्योमगं च यत्$^३$ । षोडशान्तमिति ख्यातं व्योमस्थानेन्दुमण्डलम् ॥ इति स्वच्छन्दसंग्रहोक्तरीत्या, तदेव $^४$दशावेशश्चिद्दीपाकारत्वात् तदावेशः, तत्रा- सक्तिः । तदुक्तमत्रैव— "व्योमेन्दुमण्डलासक्ता सुधास्रोतःख्यरूपिणी" (२।७१) इति । शाक्तानुभवपूर्वकम् । मूलोत्थितायाः कुण्डलिन्याः षट्चक्रग्रन्थिसंचयभेद$^५$- क्रमेण व्योमेन्दुमण्डला$^६$सक्तिपरि$^७$कलनमेव शाक्तानुभवः, तत्पूर्वकम् । भावि- वर्णोत्पत्तिरिति क्रियाविशेषणम् ॥१३५-१३६॥

हैं। यहाँ आगे (३।१८४) द्वादश ग्रन्थियों को भेद कर सुषुम्ना नाडी में वर्णों की भावना का उपदेश किया गया है। चतुःशती शास्त्र (४।१२) में बताया गया है— "यह कुटिल आकार वाली कुण्डलिनी जब शृंगाट पीठ से उठती है"। तदनुसार उल्लसित होकर ऊपर उठती हुई यह संवित्स्वरूपा कुण्डलिनी बारह ग्रन्थियों का भेदन कर विसर्गान्त पद में प्रतिष्ठित हो जाती है। विसर्ग सोलहवां स्वर है। तदनुसार विसर्ग शब्द यहाँ सोल- हवीं संख्या का संग्राहक है। अतः विसर्गान्त का अर्थ षोडशान्त होगा। स्वच्छन्दसंग्रह का यह वचन इसमें प्रमाण है— जो सोलह कलाओं के आकार वाला है, सभी भूतों की जिस व्योम में समाप्ति हो गई है, उस परम व्योम में स्थित वह इन्दुमण्डल षोडशान्त के नाम से प्रख्यात है ॥ कुण्डलिनी शक्ति के विसर्गान्त पद में प्रतिष्ठित होने पर साधक का हृदय भी उस दशा से, चिद्रूप दीपक के प्रकाश से, आविष्ट हो जाता है, प्रकाशित हो उठता है। तब वह उसी में लीन हो जाता है। चतुःशती शास्त्र में भी बताया गया है— "परम व्योमगत इन्दुमण्डल में आसक्त यह कुण्डलिनी शक्ति अमृत की वर्षा करने लगती है"। यहाँ साधक का अपना शाक्तानुभव जग जाता है। मूलाधार से उठी कुण्डलिनी शक्ति का षट् चक्र, द्वादश ग्रन्थि भेदन पूर्वक परम व्योमगत इन्दुमण्डल में आसक्ति का अनुभव ही शाक्तानुभव कहलाता है। इस शाक्तावेश की अनुभूति के बाद ही आगे बताये जा रहे वर्णों की उत्पत्ति होती है। 'शाक्तानुभवपूर्वकम्' यहाँ कोई क्रिया नहीं है, अतः क्रिया का यहाँ अध्याहार


१. यदुल्लसति-ख. ने. ज. झ. उ. । २. ऊर्ध्वं ग-ने. । ३. तत्-क. ग. । ४. 'दशा'.... तत्रासक्तिः' इत्यस्य स्थाने 'दशारचिदाधारत्वात् तदावेशस्तदापत्तिः' इति पाठः-ख. ने. ज. झ. उ. । ५. गमने-ने. । ६. सक्त-ख. ने. झ. । ७. कलनात्-क. ख. ग.

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