योगिनी हृदयम् (अमृतानन्दनाथ विमर्शिनी एवं पं. व्रजवल्लभ द्विवेदी सविस्तार सटीक)
Yogini Hridayam with Amritanandanatha Dipika by Vraj Vallabha Dwivedi
अमृतानन्दनाथ (भाष्यकार: पं. व्रजवल्लभ द्विवेदी) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंतृतीयः ] दीपिकार्याभाषानुवादसहितम् ३२३ १चिन्मयशब्दादिविषयप्रमातुः क्षेत्रज्ञस्य पिण्डपदरूपरूपातीतविश्रान्तिरूपलक्षणा तत्त्रितयपुरातनी तदैकरस्यसौन्दर्यशालिनी त्रिपुरसुन्दरी तृतीयचक्रेश्वरीत्यर्थः । बुद्धिशुद्धिरूपा बुद्धिशुद्धिर्नाम विषयसंसर्गं विहाय निर्विकल्पचिदात्मलयः, तद्रूपा । अत एव महिमासिद्धिरूपा । बुद्धेरविषयोपरागात् चिदात्मनो महिमा २महिमत्वं सिद्ध्यति । तत्सिद्धिरूपा चक्रेश्वरी सर्वोपचारकैः३ पूर्वोक्तैर्गन्धादिभिः४ पूज्या ॥१३३-१३५॥ चतुर्थचक्रे ५सवासनां पूजामाह— द्वादशग्रन्थिभेदेन समुल्लसितसंविदः ॥१३५॥ विसर्गान्तदशावेशाच्छाक्तानभवपूर्वकम् । ग्रन्थिः षट्चक्राणां प्रत्येकमूर्ध्वाधो ग्रन्थिद्वयमिति द्वादश ग्रन्थयः । अत्रैव इसका भाव यह है कि चिन्मय शब्द आदि विषयों के भोक्ता क्षेत्रज्ञ को पिण्ड, पद, रूप और रूपातीत पदों में विश्रान्ति दिलाने वाली, प्रमाता, प्रमाण और प्रमेय की इस त्रिपुटी से परे रहने वाली, इन सब से पुरानी, इन सबकी एकरसता रूपी सौन्दर्य से सम्पन्न यह त्रिपुरसुन्दरी तृतीय चक्र की स्वामिनी है । यह देवी बुद्धि की शुद्धि करने वाली है । बुद्धि की शुद्धि तब होती है, जब कि वह विषयों के सम्पर्क से अलग होकर निर्विकल्प चिदात्मस्वरूप में प्रतिष्ठित हो जाय । यह देवी जीवात्मा की बुद्धि को निर्वि- कल्प स्वरूप में प्रतिष्ठित कर देती है । इसीलिये यह महिमा सिद्धि स्वरूपिणी है । बुद्धि जब बाह्य विषयों के सम्पर्क में नहीं रहती, तब उसके सामने चिदात्मस्वरूप की महिमा आलोकित हो उठती है । महिमा सिद्धि को देने वाली इस तृतीय चक्रेश्वरी की पूर्वोक्त समस्त गन्ध आदि उपचारों से पूजा करनी चाहिये ॥१३३-१३५॥ चतुर्थ चक्र में वासना और पूजा का विधान बताते हैं— ऊपर की ओर उठती हुई कुण्डलिनी शक्ति बारह ग्रन्थियों का भेदन कर जब विसर्गान्त स्थान में प्रविष्ट होती है, तो उस समय जगी शाक्त अनुभूति से आगे बताये वर्णों की उत्पत्ति होती है ॥१३५-१३६॥ छः चक्रों में से प्रत्येक के ऊपर और नीचे दो दो१ ग्रन्थियां हैं । ये सब मिलकर बारह १. विनायक-झ. । २. महत्त्वं-ख. ने. ज. झ. । ३. पचारैः-क. ग. । ४. दिभि- रम्यर्च्या-ख. ने. ज. झ. उ. । ५. पूजां सवासनामाह-ख. ने. ज. झ. उ. । १. माया आदि बारह ग्रन्थियों की चर्चा नेत्रतन्त्र (७।२२-२५) में मिलती है, किन्तु वहाँ छः चक्रों के साथ इनके सम्बन्ध का उल्लेख नहीं मिलता । अर्थरत्नावलीकार (पृ० ६७) भी बारह ग्रन्थियों के भेदन की बात कहते हैं । सौन्दर्यलहरी के टीकाकार लक्ष्मी- धर (श्लो० १४) तीन ही ग्रन्थियां मानते हैं । देखिये—तन्त्रयात्रा, पृ० ४२