योगिनी हृदयम् (अमृतानन्दनाथ विमर्शिनी एवं पं. व्रजवल्लभ द्विवेदी सविस्तार सटीक)
Yogini Hridayam with Amritanandanatha Dipika by Vraj Vallabha Dwivedi
अमृतानन्दनाथ (भाष्यकार: पं. व्रजवल्लभ द्विवेदी) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें३२२ योगिनीहृदयम् [ पूजासंकेतः इन्द्रियद्वारा बहिर्निर्गत्य तत्तदाकारा तत्तदिन्द्रियार्थाकाराकारिता१ बुद्धिरन्तः- करणपरिणतिः, तदात्मानो भोग्याः शब्दस्पर्शरूपरसगन्धाः, तेषां भोक्ता प्रमाता, स एव महीशिता भूपतिः, क्षेत्रज्ञ इति यावत्, तस्य । पिण्डादीनां पिण्डपदरूपरूपा- तीतानां स्थानानां विश्रान्तिः२ रूपातीते तुरीयपदे मुक्तिः । अत्र ३प्रामाणिक- वचनम्— पिण्डे मुक्ताः पदे मुक्ता रूपे मुक्ताः षडानन । रूपातीते तु ये मुक्तास्ते मुक्ता नात्र संशयः ॥ (ज्ञा० का० १।४-५) इति । सैव सौन्दर्यम्४ अनित्याशुचिसंसारलक्षणपरमदौर्भाग्यविदारण५नित्यशुद्धपरम- प्रेमास्पदसर्वस्पृहणीयपरमशिवस्वरूपप्रकाशनमेव सौन्दर्यम्, तदेव गुणः, तेन संयुता । तदेकरसतया चक्रेश्वरी सर्वसंक्षोभणाख्यतृतीयचक्रेश्वरी । कोऽर्थः ? इन्द्रियों के मार्ग से बाहर निकल कर उन उन विषयों के आकार को ग्रहण करने वाली बुद्धि एक प्रकार की अन्तःकरण की वृत्ति है । बाहर निकल कर अन्तःकरण की वृत्ति ने जिन आकारों का स्वरूप ग्रहण किया, वे हैं शब्द, स्पर्श, रूप, रस और गन्धात्मक भोग्य विषय । इनका भोक्ता प्रमाता है, वही इन सबका अधिपति है । इसी को क्षेत्रज्ञ कहा जाता है । इस प्रमाता को पिण्ड, पद, रूप और रूपातीत नामक स्थानों में शान्ति का अनुभव होता है । इसी को मुक्ति भी कहते हैं। रूपातीत नामक तुरीय (चतुर्थ) पद में इसकी अनुभूति होती है। किसी प्रामाणिक व्यक्ति ने कहा है— हे १षडानन ! पिण्ड में, पद में और रूप में भी मुक्तावस्था की अनुभूति अवश्य होती है, किन्तु जो साधक रूपातीत में मुक्त हो गये हैं, उनकी मुक्ति में किसी प्रकार का सन्देह नहीं रह जाता ॥ साधक को मुक्ति की तरफ बढ़ाना ही इस भगवती त्रिपुरसुन्दरी का सौन्दर्य है । यह देवी अनित्य और अपवित्र संसार लक्षण परम दुर्भाग्य को दूर कर नित्य, शुद्ध, परम प्रेमा- स्पद, सर्वस्पृहणीय, परम शिव स्वरूप को प्रकाशित करती है। यही इसका सौन्दर्य है, यही इसका गुण (स्वभाव) है । इस सौन्दर्य गुण से यह सदा संयुक्त है । इस सौन्दर्य गुण से समरस हुई यह चक्रेश्वरी त्रिपुरसुन्दरी सर्वसंक्षोभण नामक तृतीय चक्र की स्वामिनी है । १. 'कारिता' नास्ति-ख. ने. ज. उ. । २. न्ती रूपातीतं तुरीयपदं मुक्तिः-ख. ने. ज. । ३. प्रमाणव-ख. ने. ज. झ. । ४. यं सुन्दरत्वम्-ख. ने. ज. । ५. रणरूप-झ. ।
- प्रस्तुत उद्धरण को दीपिकाकार प्रामाणिक व्यक्ति का वचन मानते हैं, किन्तु इसमें आया 'षडानन' संबोधन इसकी आगमिकता को उजागर करता है । क्या इसका अर्थ यहाँ प्रामाणिक व्यक्ति के द्वारा उद्धृत वचन किया जाय ?