योगिनी हृदयम् (अमृतानन्दनाथ विमर्शिनी एवं पं. व्रजवल्लभ द्विवेदी सविस्तार सटीक)
Yogini Hridayam with Amritanandanatha Dipika by Vraj Vallabha Dwivedi
अमृतानन्दनाथ (भाष्यकार: पं. व्रजवल्लभ द्विवेदी) द्वारा
पृष्ठ 369, कुल 485 में से
संदर्भ में पढ़ेंतृतीयः ] दीपिकाभाषानुवादसहितम् ३२१ संग्रहे—"स्थूलं पञ्चाशदाकारं सूक्ष्ममष्टाष्टकं १स्मृतम्" इति। तत्स्वरूपत्वात् तदात्मकत्वात्। गुप्ततराः सूक्ष्मवैखरीवर्णवर्गाष्टकमयत्वादेता अपि सूक्ष्माः, अतो२ऽत्यन्तरङ्गतया गुप्ततरा इत्यर्थः। ताः सर्वा अनङ्गकुसुमाद्याः "अनङ्गकुसुमां पूर्वे" (१।१६३) इत्यादिश्चतुःशतीशास्त्रोक्ताः सर्वसंक्षोभणाख्ये तृतीये चक्रेऽष्ट- दलकमले, पूज्या इति योज्यम् ॥१३१-१३२॥ तासां ध्यानमाह— रक्तकञ्चुकशोभिताः ॥१३२॥ वेणीकृतलसत्केशाश्चापबाणधराः शुभाः। स्पष्टम् ॥१३२-१३३॥ तत्तदाकारबुद्ध्यात्मभोग्यभोक्तुर्महेशितुः ३ ॥१३३॥ पिण्डादिपदविश्रान्तिसौन्दर्यगुणसंयुता। चक्रेश्वरी बुद्धिशुद्धिरूपा च परमेश्वरी ॥१३४॥ महिमासिद्धिरूपा च पूज्या सर्वोपचारकैः। संबद्ध हैं। वैखरी वर्णों के आठ वर्ग सूक्ष्म वर्ग कहलाते हैं। स्वच्छन्दसंग्रह में बताया गया है—"स्थूल वर्ण पचास आकार वाले और सूक्ष्म अष्टाष्टक वर्ग वाले हैं"। ये गुप्ततर योगिनियाँ अष्टवर्गस्वरूपिणी भी हैं। वैखरी वर्णों के सूक्ष्म वर्गाष्टक से सम्बद्ध होने से ये योगिनियाँ भी गुप्ततर हैं, सूक्ष्म हैं। इस तरह से अति अन्तरंग होने से गुप्ततर हैं। चतुःशती शास्त्र (१।१६३-१६४) में वर्णित इन सब अनङ्गकुसुमा आदि योगिनियों की सर्वसंक्षोभण नामक तृतीय चक्र में, अष्टदल कमल में पूजा करनी चाहिये ॥१३१-१३२॥ इनका ध्यान इस तरह से किया जाय— रक्त कंचुक पहने हुए और केशों का जूड़ा बाँधे हुए ये शुभ शक्तियाँ धनुष और बाण धारण किये हुए हैं ॥१३२-१३३॥ अर्थ स्पष्ट है ॥१३२-१३३॥ उन उन विषयों का आकार ग्रहण करने वाली बुद्धि के द्वारा विषयाकार भोग्य पदार्थों का भोक्ता प्रमाता (क्षेत्रज्ञ) यहाँ भूपति माना गया है। उस भूपति को पिण्ड आदि पदों में विश्राम दिलाने वाली यह देवी अपने सौन्दर्य गुण के कारण तृतीय चक्र की स्वामिनी त्रिपुरसुन्दरी के नाम से प्रसिद्ध है। साधक की बुद्धि को शुद्ध करने वाली यह परमेश्वरी महिमा सिद्धि को देने वाली है। तृतीय चक्र में सर्वविध उपचारों से इसकी पूजा करनी चाहिये ॥१३३-१३५॥ १. मतम्-झ.। २. त्यन्तान्त-झ.। ३. महेशितुः-क. ग. छ.। ४. श्वरि-ख. ने. घ. ङ. झ. उ.। २१