योगिनी हृदयम् (अमृतानन्दनाथ विमर्शिनी एवं पं. व्रजवल्लभ द्विवेदी सविस्तार सटीक)
Yogini Hridayam with Amritanandanatha Dipika by Vraj Vallabha Dwivedi
अमृतानन्दनाथ (भाष्यकार: पं. व्रजवल्लभ द्विवेदी) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें३२० योगिनीहृदयम् [ पूजासंकेतः यादृशैरुपचारैः सर्वैर्गन्धादिभिर्मूलदेवी पूजिता, तादृशैरेवोपचारैः सर्वाशा- परि¹पूरणचक्रे चक्रेशी त्रिपुरेशी ²पूजनीयेत्यर्थः ॥१३०॥ तृतीयचक्रे पूजां सवासनामाह— कौलिकानुभवाविष्टभोगपुर्यष्टकाश्रिताः । वाग्भवाष्टकसंबद्धाः सूक्ष्मा वर्गस्वरूपतः ॥१३१॥ तास्तु गुप्ततराः सर्वाः सर्वसंक्षोभणात्मके । अनङ्गकुसुमाद्यास्तु ³कुलं षट्त्रिंशत्तत्त्वात्मकं शरीरम्, तद्विषयानुभवः कृशोऽहं स्थूलोऽहमित्यादि, तेनाविष्टो जीवस्तदाश्रिततया, तस्य भोगपुर्यष्टकम् चितिश्चित्तं च चैतन्यं चेतना⁴द्वयकर्म च । जीवः कला⁵ शरीरं च सूक्ष्मं पुर्यष्टकं मतम् ॥ इति स्वच्छन्दसंग्रहोक्तरीत्या सूक्ष्मपुर्यष्टकम्, तदाश्रिताः । तन्मयतया वाग्भवाना- मैकाराणामष्टकेन संबद्धाः । सूक्ष्मवर्गं वैखरीवर्णाष्टकवर्गम् । तदुक्तं स्वच्छन्द- जिन जिन गन्ध आदि द्रव्यों से मूलदेवी का पूजन किया गया, उन सभी उपचारों से सर्वाशापरिपूरक चक्र में चक्रेश्वरी त्रिपुरेशी की पूजा करनी चाहिये ॥१३०॥ अब तृतीय चक्र में पूजा और वासना का वर्णन करते हैं— कौलिक अनुभव से सम्पन्न साधक के भोगपुर्यष्टक में निवास करने वाली, सूक्ष्म वर्ग के रूप में वाग्भवाष्टक से संबद्ध शक्तियाँ गुप्ततर कहलाती हैं। अनङ्गकुसुमा आदि इन गुप्ततर योगिनियों की पूजा सर्वसंक्षोभण नामक चक्र में करनी चाहिये ॥१३१-१३२॥ ३६ तत्त्वात्मक शरीर को कुल कहते हैं। तद्विषयक अनुभव है—"मैं कृश हूँ, मैं स्थूल हूँ" इत्यादि। जीव इस तरह के अनुभवों से आविष्ट रहता है। इस जीव के भोगपुर्यष्टक, अर्थात् सूक्ष्म पुर्यष्टक का स्वच्छन्दसंग्रह में इस तरह से वर्णन किया गया है— चिति, चित्त, चैतन्य, ज्ञानेन्द्रिय, कर्मेन्द्रिय, जीव, कला और शरीर—इन आठ तत्त्वों को सूक्ष्म पुर्यष्टक माना जाता है ॥ जीव के इस सूक्ष्म पुर्यष्टक में ये गुप्ततर योगिनियाँ छिपी रहती हैं। सूक्ष्म पुर्यष्टक में विद्यमान, अत एव सूक्ष्म पुर्यष्टक स्वरूप ये योगिनियाँ आठ वाग्भव (ऐकार) अक्षरों से १. 'परि' नास्ति-ख. ने. ज. झ. उ. । २. पूज्येति-ख. ने. ज. झ. उ. । ३. 'कुलं....शुभाः । स्पष्टम्' नास्ति-ख. ने. ज. ब. उ. । ४. ह्वय-झ. । ५. कला च देहञ्च-ख. ने. ज. ब. उ. ।