योगिनी हृदयम् (अमृतानन्दनाथ विमर्शिनी एवं पं. व्रजवल्लभ द्विवेदी सविस्तार सटीक)
Yogini Hridayam with Amritanandanatha Dipika by Vraj Vallabha Dwivedi
अमृतानन्दनाथ (भाष्यकार: पं. व्रजवल्लभ द्विवेदी) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें३१६ योगिनीहृदयम् [ पूजासंकेतः इत्यभियुक्तवचनोक्तरीत्या कार्यस्य शुद्धिर्नाम कारणतावन्मात्रतया पर्यव- सानम् । "अणोरणीयान्" (क० उ० २।२०) इति श्रुत्युक्ताणीयसि कारणे विद्य- मानस्यात्मनोऽणिमा सिद्धयतीत्यणिमासिद्धिः । सा चात्र त्रैलोक्यमोहने चक्रे स्थितेति तात्पर्यम् ॥१२६॥ द्वितीयचक्रे पूजां सवासनामाह— षोडशस्पन्दसन्दोहे चमत्कृतिमयीः कलाः ॥१२६॥ प्राणादिषोडशानां तु वायूनां प्राणनात्मिकाः । बीजभूताः स्वरात्मत्वात् कलनाद् बीजरूपकाः ॥१२७॥ अन्तरङ्गतया गुप्ता योगिन्यः संव्यवस्थिताः । कामाकर्षणरूपाद्याः सृष्टेः प्राधान्यतः प्रिये ॥१२८॥ सर्वाशापूरणाख्ये तु चक्रे वामेन पूजयेत् । स्पन्दो नाम परायास्तत्त्वरूपेण प्रसारः । तदुक्तं परापञ्चाशिकायाम्— "सिसृक्षोः प्रथमस्पन्दः शिवतत्त्वं प्रभोः स्मृतम्" (श्लो० १८) इति । तेन षोडश शिवानन्द मुनि की इस उक्ति के अनुसार कार्य की शुद्धि यही है कि वह अपने कारण में केवल कारण रूप में ही पर्यवसित (परिणत) हो जाय । कारण ब्रह्म के लिये श्रुति में बताया गया है—"वह अणु से भी अणुतर है"। इस अत्यन्त सूक्ष्म कारण में अवस्थित हो जाने पर साधक को अणिमा सिद्धि प्राप्त हो जाती है। वह सिद्धि त्रैलोक्यमोहन नामक चक्र में स्थित है। इस प्रकरण का यही तात्पर्य है ॥१२६॥ द्वितीय चक्र की पूजा और वासना का अब वर्णन करते हैं— सोलह स्पन्दों के समूह रूप सर्वाशापरिपूरक चक्र में प्राण आदि सोलह पदार्थों में प्राण का संचार करने वाला चमत्कारमय कलाएँ रहती हैं। बीज (बिन्दु) से संयुक्त स्वर इनकी कलना करते हैं, अतः ये कलाएँ बीजस्वरूपिणी हैं। अन्तरङ्ग होने से ये गुप्त योगिनियाँ कहलाती हैं। इनके कामाकर्षिणी आदि नाम हैं। हे प्रिये ! सृष्टि की प्रधानता होने से सर्वाशापरिपूरक चक्र में इनकी पूजा वामावर्त क्रम से होनी चाहिये ॥१२६-१२९॥ परा शक्ति का तत्त्वों के रूप में जो प्रसार होता है, उसे स्पन्द कहते हैं। परा- पंचाशिका में बताया गया है—"सृष्टि करने के लिये उद्यत प्रभु का प्रथम स्पन्द शिव- १. तोति सिद्धिः-ख. ने. ज. झ. उ. । २. प्राणानां-ख. ने. च. छ. ज. झ. । ३. तत्त्व-ख. ने. च. झ. । ४. रूपगाः-ख. ने. च. छ. ज. । ५. प्तयो-ख. ने. च. छ. ज. झ. । ६. संस्थिता मताः-ख. ने. च. छ. ज. झ. । ७. ष्टिप्रा-ख. ने. च. छ. ज. झ. उ. । ८. 'तदुक्तं''''षोडश स्पन्दाः' नास्ति-ख. ने. ज. उ. ।