योगिनी हृदयम् (अमृतानन्दनाथ विमर्शिनी एवं पं. व्रजवल्लभ द्विवेदी सविस्तार सटीक)
Yogini Hridayam with Amritanandanatha Dipika by Vraj Vallabha Dwivedi
अमृतानन्दनाथ (भाष्यकार: पं. व्रजवल्लभ द्विवेदी) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंतृतीयः ] दीपिकाभाषानुवादसहितम् ३१५ विद्यादेवतयोरभेदविवक्षया च त्रैलोक्यमोहनचक्रेशीविद्यानिर्वचनमाह— कर्मेन्द्रियाणां वैमल्यात् करशुद्धिकरी स्मृता ॥१२५॥ आत्मतत्त्वगतयोरशुद्धयोरत्र कर्मकरणात्मनोर्द्वयोः । शुद्धतत्त्व¹लयभावनामयी शुद्धिरात्मकयोः परा मता ॥ (चि० स्त० ११) इत्यस्मदुक्तरीत्याऽऽत्मतत्त्वस्याशुद्धत्वात् कर्मेन्द्रियाणामप्यात्मतत्त्वान्तःपाति- त्वात् ²करयोश्च कर्मेन्द्रियत्वादशुद्धयोः ³कार्यकरणात्मनोः करयोः कार्ययोः, स्वकारणे शुद्धतत्त्वे शिवाद्वैतलयभावना करशुद्धिः, तत्करीयम् । स्मृता निरुक्ता ॥१२५॥ ⁴कार्यशुद्धिभवा सिद्धिरणिमा चात्र संस्थिता । कारणात्मपरामृष्टकार्य⁵रूपाऽङ्गुलिस्थिताम् । करोमि चिन्मयीं शुद्धिं करयोः ⁶स्पर्शशोधिनीम् ॥ (सु० वा० २४) अब भगवान् यह कहना चाहते हैं कि विद्या और देवता में कोई भेद नहीं है । इसी अभिप्राय से त्रैलोक्यमोहन चक्र की स्वामिनी त्रिपुरा की करशुद्धिकरी विद्या से अभिन्नता बताते हुए उसका निर्वचन करते हैं— कर्मेन्द्रियों को विमल करने वाली यह विद्या करशुद्धिकरी कहलाती है ॥१२५॥ साधक के दोनों हाथों की गिनती कर्मेन्द्रियों में होती है, जो कि अशुद्ध आत्मतत्त्व के अन्तर्गत आते हैं । इनकी शुद्ध शिवस्वरूप में लीन होने की भावना ही उत्कृष्ट शुद्धि मानी जाती है ॥ व्याख्याकार के चिद्विलास स्तव के इस वचन के अनुसार आत्मतत्त्व अशुद्ध है, कर्मेन्द्रियों की गिनती आत्मतत्त्व में ही होती है और हाथ कर्मेन्द्रिय होने से अशुद्ध हैं । इन कार्यकरणात्मक हाथों की शुद्धि यही है कि अपने कारण शुद्ध तत्त्व में, शिवाद्वय- भावना में उनको लीन कर दिया जाय । करशुद्धिकरी विद्या यही कार्य करती है ॥१२५॥ कार्य की शुद्धि से उत्पन्न अणिमा नाम की सिद्धि भी यहीं रहती है ॥ पाञ्चभौतिक देह में कार्यरूप से प्रकट हुई दाहिने और बायें हाथ की अंगुलियाँ वास्तव में अपने कारणभूत प्रकाश और विमर्श से अभिन्न हैं । प्रकाश और विमर्श स्वरूप कारण के रूप में भावना कर मैं इन कार्य रूप में परिणत अंगुलियों में चित्स्वरू- पिणी शुद्धि का आधान कर रहा हूँ, जिससे कि मेरे दोनों हाथ शुद्ध हो जाँय और इनसे मैं जिन पदार्थों का स्पर्श करूँ, वे भी शुद्ध हो जाँय, उनमें किसी प्रकार का स्पर्श दोष न आवे ॥ १. गत-ख. ने. उ. । २. 'करयोश्च' नास्ति-ख. झ. उ. । ३. 'कार्यकरणात्मनोः' नास्ति-ख. झ. उ. । ४. कर-ख. च. ज. । ५. भूता-मु. । ६. परि-मु. ।