योगिनी हृदयम् (अमृतानन्दनाथ विमर्शिनी एवं पं. व्रजवल्लभ द्विवेदी सविस्तार सटीक)
Yogini Hridayam with Amritanandanatha Dipika by Vraj Vallabha Dwivedi
अमृतानन्दनाथ (भाष्यकार: पं. व्रजवल्लभ द्विवेदी) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें३१४ योगिनीहृदयम् [ पूजासंकेतः वेतालः पिशाचविशेषः । शूलडमरुखङ्गवेतालान् दक्षिणेः करैः, नागखेटक- ^१घण्टाकपालानि वामकरैर्दधानेत्यर्थः ॥१२२-१२३॥ महालक्ष्मीस्तु पीताभा पद्मौ^२ दर्पणमेव च । मातुलुङ्ग^३फलं चैव दधाना परमेश्वरी ॥१२४॥ स्पष्टम् । ननु मुद्रादशकं किमित्यन्तश्चतुरस्रे पूज्यत्वेन ^४नोक्तम् ? सत्यम्, चतुःशतीशास्त्रे^५ऽनुक्तत्वादत्रापि^६ प्राधान्येन^७ नाख्याताः, किन्तु श्रीचक्रन्यासे “मूलाधारे न्यसेन्मुद्रादशकं साधकोत्तमः” (३।७७) इति सूचिताः । अतोऽन्तश्चतु- रस्रे मुद्रादशकमपि पूजयेत् ॥१२४॥ एवं ध्यात्वा यजेदेताश्चक्रेशीं त्रिपुरां ततः । एवम् उक्तप्रकारेण । एताः प्रकटयोगिनीर्ध्यात्वा, चक्रेशीं त्रैलोक्यमोहन- चक्रेशीं त्रिपुरां यजेत् ॥१२५॥ वेताल एक प्रकार का पिशाच है। चामुण्डा के दाहिने हाथों में शूल, डमरु, खड्ग और वेताल तथा बाये हाथों में नाग, खेटक, घण्टा और कपाल सुशोभित हैं ॥१२२- १२३॥ महालक्ष्मी का वर्ण पीत है। इस परमेश्वरी के चार हाथों में से दो में पद्म और बाकी के दो हाथों में दर्पण और मातुलुंग फल (चकोतरा) सुशोभित हैं ॥१२४॥ इसका अर्थ स्पष्ट है । प्रश्न होता है कि चतुरस्र चक्र में दस मुद्राओं का भी पूजन होना चाहिये । उनका यहाँ उल्लेख क्यों नहीं किया गया ? आपका कहना सही है। चतुःशती शास्त्र में मुद्राओं का पूजन नहीं बताया गया है, इसीलिये यहाँ भी उनका उल्लेख नहीं किया गया है, किन्तु श्रीचक्र न्यास प्रकरण में यहाँ (३।७७) मूलाधार में दस मुद्राओं का न्यास बताया गया है। अतः इस चतुरस्र चक्र में ही दस मुद्राओं का भी पूजन करना चाहिये ॥१२४॥ इस तरह से इन प्रकट योगिनियों का ध्यान कर पूजा करे और तब चक्रेशी त्रिपुरा का भी पूजन करे ॥ इस तरह से ऊपर बताई गई विधि से इन प्रकट योगिनियों का ध्यान करके तब त्रैलोक्यमोहन चक्र की स्वामिनी त्रिपुरा की भी पूजा करे ॥१२५॥ १. मुण्डक-ख., घण्टास्थ्य-ने. झ. उ. । २. पद्म-क. ग., पद्मं-उ. । ३. लिङ्ग-क. छ. ज. । ४. नात्रोक्तं-झ. । ५. स्त्रेऽप्यनु-ख. झ. उ. । ६. दत्रैव-ख. झ. उ. । ७. न्येनाख्या तव्याः-ख. ने. ।