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योगिनी हृदयम् (अमृतानन्दनाथ विमर्शिनी एवं पं. व्रजवल्लभ द्विवेदी सविस्तार सटीक)

Yogini Hridayam with Amritanandanatha Dipika by Vraj Vallabha Dwivedi

अमृतानन्दनाथ (भाष्यकार: पं. व्रजवल्लभ द्विवेदी) द्वारा

DevanagariHindipublished485 पृष्ठ

३०० योगिनीहृदयम् [ पूजासंकेतः इति क्रमोदयोक्तरीत्या 'मनसि स्थिरीभूते बाह्यचक्रार्चनं कुर्यादित्याह- स्वप्रथाप्रसराकारं श्रीचक्रं पूजयेत् सुधीः ॥१०८॥ सुधीः सीधुरसपानेनानन्यविषयासक्तः २स्वसंविन्मात्रस्थिरमनाः। मनसि स्थिरे सति धारणा स्थिरा, तस्यां स्थिरायां "तत्र प्रत्ययैकतानता ध्यानम्" (३।२) इति योगपातञ्जलशास्त्रोक्तरीत्या४ प्रत्ययैकतानतालक्षणं ध्यानं भवति। विना ध्यानं पूजा निष्फला भवति। अथादावमृतीकृतमासवं शिवादिभ्यो गुरुभ्यो५ निवेद्य स्वात्माग्नौ हुत्वा प्रज्वलत्परमानन्दस्थिरधीर्भूयादित्यर्थः। ६स्वप्रथाप्रसरा- कारः स्वप्रथा स्वसंवित् तस्या बहिरर्थेष्विन्द्रियद्वारा प्रसरो व्यापारः, ७तदात्मना स्फुरणम्। ततस्तदाकारं श्रीचक्रं पूजयेत्। श्रीचक्रं८ नाम नान्यत् किञ्चित्, अपि तु स्वसंविद्देवतायाः प्रसररूपाऽन्तःकरणचतुष्टयाव्यक्तमहदहङ्कृतितन्मात्रदशे- है" क्रमोदय के इस वचन के अनुसार मन के स्थिर हो जाने पर बाह्य चक्र की पूजा करे, इस विषय का अब यहाँ वर्णन किया जा रहा है— विद्वान् साधक मन के स्थिर हो जाने पर अपनी आन्तर संवित् के ही बाह्य आकार वाले श्रीचक्र की पूजा करे ॥१०८॥ सुधी शब्द का अर्थ यहाँ है—सीधु रस के पान से जिसका मन अन्य किसी बाहरी विषय में आसक्त नहीं है, अपने संवित्स्वरूप में जो प्रतिष्ठित हो गया है। मन के स्थिर होने से धारणा स्थिर हो जाती है और धारणा के स्थिर होने पर ध्यान भी स्थिर हो जाता है। पातंजल योगसूत्र में प्रत्यय की एकतानता का नाम ध्यान बताया गया है। बिना ध्यान के पूजा निष्फल होती है। इसी लिये पहले यहाँ अमृतीकृत आसव को शिव (भैरव), गुरु आदि को निवेदित कर अपनी कामाग्नि में भी उसकी आहुति दी जाती है। इससे परमानन्द की अभिव्यक्ति होती है और उसी में साधक का मन स्थिर हो जाता है। स्वप्रथा का अर्थ है अपनी संवित्, उसका इन्द्रिय मार्ग से जब बाहरी अर्थों में प्रसार होता है, व्यापार चलता है, तो विश्वाकार में यह संवित् बदल जाती है। श्रीचक्र इसी का परिणाम है। श्रीचक्र और कुछ नहीं है, किन्तु अपनी संविद् देवता ही बाहर फैलते समय अन्तःकरण-चतुष्टय, अव्यक्त, महत्, अहङ्कार, तन्मात्रा, ज्ञानेन्द्रिय, कर्मेन्द्रिय, इनकी वृत्तिय । १. मनःस्थैर्ये जायते चेच्चक्रा-ख. ने. ज. ड. । २. स्वप्रथा-क. ग. । ३. स्वयं चिन्मात्र-ख. ने. ज. ड. । ४. 'रीत्या' नास्ति-ख. ने. ज. झ. उ. । ५. भ्यः शिवाभ्यां च-क. ख. ग. । ६. स्वप्रत्रा-क. ग. । ७. तत आत्मनः-ख. ने. ज. झ. उ. । ८. 'श्रीचक्रं नाम' नास्ति-ख. ज. झ. उ. । Courtesy: Shri Tarun Dwivedi, Surviving Son of Late Vraj Vallabh Dvivediji (15 Jul 1926 - 17 Feb 2012)

तृतीयः ] दीपिकाभाषानुवादसहितम् ३०१ न्द्रिय१तद्वृत्तितद्विषयतत्पुर्यष्टकषोडशविकारधातुप्रपञ्च एव२ श्रीचक्रात्मना स्फुर३त्येतावत् ॥१०८॥ श्रीचक्रपूजामाह "गणेशम्" इत्यादिना "चक्रपूजां विधाय" (३।१६८) इत्यन्तेन— गणेशं दूतरौं चैव क्षेत्रेशं दूतिकां तथा। बाह्यद्वारे यजेद् देवि देवीश्च स्वस्तिकादिकाः ॥१०९॥ श्रीचक्रद्वारशाखयोर्गणेशं तच्छक्तिं दूतरों क्षेत्रेशं बटुकाख्यं तच्छक्तिं दूतिकां च यजेत्। तदुक्तं संकेतपद्धत्याम्— द्वैताद्वैतमहामोहशर्वरीक्षपणक्षमः। भास्वानिव जयत्येको गणेशो दूतरीयुतः॥ प्रतिभायाः परोल्लासो निशाकर इवापरः। दूतीयुक्तः स जयति बटुकस्ताण्डवान्वितः ॥ इति। बाह्यद्वारे श्रीचक्रद्वारबाह्यप्रदेशे, स्वस्तिकादिका४ देवीः सरस्वतीश्रीदुर्गाभद्र- काल्यश्चतस्रः। स्वस्तिका आदिर्यासामिति समासः। स्वाहाशुभङ्करीगौरोलोक- इनके विषय, पुर्यष्टक, सोलह विकार पर्यन्त इस समस्त विश्वप्रपंच का स्वरूप धारण कर कर लेती है और इसी का नाम श्रीचक्र है ॥१०८॥ अब यहाँ १०९ से १६८ पर्यन्त श्लोकों में श्रीचक्र की पूजाविधि बताई जा रही है— हे देवि ! श्रीचक्र के बाह्य द्वार पर गणेश, दूतरी, क्षेत्रेश तथा दूतिका और स्वस्तिका आदि देवियों की पूजा करें ॥१०९॥ श्रीचक्र के द्वार की दोनों तरफ गणेश और उसकी शक्ति दूतरी की तथा क्षेत्रेश (बटुक) और उसकी शक्ति दूतिका की पूजा करे। संकेतपद्धति में बताया गया है— द्वैत और अद्वैत की महामोह रूपी रात्रि के घने अन्धकार का, अज्ञान का नाश करने में एकमात्र गणेश ही अपनी शक्ति दूतरी के साथ सूर्य के समान समर्थ हैं। उनकी जय हो। प्रतिभा का जहाँ परम उत्कर्ष हुआ है, चन्द्रमा के समान जो आलोक से परि- पूर्ण हैं, ताण्डव नृत्य में रत, अपनी शक्ति दूती के साथ विराजमान बटुकभैरव की जय हो॥ श्रीचक्र के द्वार के बाहर स्वस्तिका, सरस्वती, श्री, दुर्गा और भद्रकाली तथा स्वाहा, शुभङ्करी, गौरी, लोकधात्री और वागीश्वरी इन पाँच पाँच देवियों की भगवती १. 'तद्वृत्ति' नास्ति-ख. ने. ज. झ. उ.। २. 'एव' नास्ति-ख. ज. उ.। ३. रतीत्येव-ख. ज. उ., रतीति-झ.। ४. काद्या देव्यः-ख. ने. ज. झ. उ.।

७२ योगिनीहृदयम् [ पूजासंकेतः धात्रीवागीश्वर्यश्च पञ्च। एतास्ताश्च देवीर्गायिका यजेत्। तत्प्रसिद्धं पद्धतिषु ॥१०९॥ ततश्चान्तस्त्रिकोणेऽपि गुरुपङ्क्तिं त्रिधा स्थिताम्। ततस्तस्य श्रीचक्रस्य अन्तस्त्रिकोणे त्रिधा स्थितां दिव्यसिद्धमानवौघत्रयवतीं गुरुपङ्क्तिं शिवादिस्वगुरुपर्यन्तानां गुरूणां पङ्क्तिः परम्परा ताम्। अपिशब्दाद् यजेदित्यनुषङ्गः। गुरुपरम्परा गुरुमुखादेव ज्ञातव्या, न लोकतः। न च पुस्तके१ लिखिता, अत्यन्तरहस्यत्वात् ॥ तदन्तश्च महादेवीं तामावाह्य यजेत् पुनः ॥११०॥ महापद्मवनान्तस्थां कारणानन्दविग्रहाम्। मदङ्कोपाश्रयां देवीमिच्छाकामफलप्रदाम् ॥१११॥ भवतीं तदन्तः श्रीचक्रस्य ३मध्ये बैन्दवाख्ये चक्रे। तां महापद्मवनान्तस्थाम् 'महा- पद्मवनान्तस्थे वाग्भवे गुरुपादुकाम्' (३।५) इत्यत्रोपपादितरूपाम्४। अकुला- त्रिपुरसुन्दरी की गायिकाओं के रूप में पूजा करे। यह सारा विषय पद्धति-ग्रन्थों में प्रसिद्ध है ॥१०९॥ तब श्रीचक्र के मध्यत्रिकोण में त्रिधा स्थित गुरुपंक्ति की पूजा करे ॥ इसके बाद श्रीचक्र के अन्दर बीच में विद्यमान त्रिकोण में दिव्य, सिद्ध और मान- वौघ के क्रम से तीन भागों में विभक्त गुरुपंक्ति की, शिव से लेकर अपने गुरु तक चली आई गुरुपरम्परा की भी पूजा करे। त्रिधा विभक्त इस गुरुपरम्परा का ज्ञान अपने गुरु के मुँह से ही प्राप्त करना चाहिये। लौकिक परम्परा से इसका ज्ञान नहीं हो सकता। यह परम्परा अत्यन्त गोपनीय होने से १पुस्तक में भी नहीं लिखी जाती ॥ उस त्रिकोण रूपी महापद्मवन में विराजमान, कारणानन्द शरीरवाली इच्छा- नुसार सभी कामनाओं को पूरा करने वाली, मेरे अंक में विराजमान महादेवी त्रिपुरसुन्दरी का आवाहन कर पूजन करे ॥११०-११२॥ 'महापद्मवनान्तस्थ' पद की व्याख्या पहले (३।५) की जा चुकी है। तदनुसार श्रीचक्र के मध्य में स्थित त्रिकोणान्तर्गत बैन्दव चक्र में विद्यमान अकुल नाम का अधोमुख १. केषु-झ.। २. श्रितां-क. ग.। ३. श्रीचक्रमध्यबैन्द-ख. ने. ज. झ. उ.। ४. रूपकुलाधोमुखसहस्रदलकमलमहापद्मवनमध्यस्थाम्-ख. ने. ज. झ उ.। १. हादि और कादि विद्या की दिव्यौघ, सिद्धौघ और मानवौघ गुरुपरम्परा ऋजु- विमर्शिनी (पृ० २१८-२२४), अर्थरत्नावली (पृ० २१८-२२५), ज्ञानदीपविमर्शिनी (दीक्षा प्रकरण) और सौभाग्यसुभगोदय (पृ० ३१८-३२०) में देखी जा सकती है।

तृतीयः ] दीपिकाभाषानुवादसहितम् ३०३ धोमुखसहस्रदलं कमलं महापद्मवनम् । मदङ्कोपाश्रयाम् अनाश्रितस्य^१ स्वप्रकाशा- त्मनो ममाऽङ्कस्थाम् । कारणानन्दविग्रहाम् । कारणं नाम^२ हेतुद्रव्यम् । अत्रैव वक्ष्यति—"क्षेत्राणां पतये मह्यं बलिं कुर्वीत हेतुना" (३।१९९) इति । द्रव्यपानेन तेन य आनन्दः, स एव विग्रह आकारो यस्यास्ताम् । कोऽर्थः ? शोधितामृतीभूत- द्रव्यपानपरिस्फुरत्परमानन्दमात्रशरीरामित्यर्थः । भवतीम् अनाश्रितां [मम^३ देवीं विमर्शात्मिकाम् । इच्छाकामफलप्रदाम् इच्छया यत् काम्यते फल^४ तस्य सर्वस्य दात्रीम् । महापद्मवनान्तस्थे कारणानन्दविग्रहे । सर्वभूतहिते मातरेह्येहि परमेश्वरि ॥ इति मन्त्रेण आवाह्य यजेत् । ननु महापद्मवनान्तस्थामित्यनेनैवानाश्रितो देवोऽनाश्रिता देवी चाऽत्र चक्रे समावाह्य कामेश्वरीकामेश्वररूपेण पूज्याविति कथमवसीयत इति चेदुच्यते— महापद्मवनान्तस्थः सकलागमशास्त्राणां वक्ता देवोऽप्यनाश्रित एव, तच्छक्ति- रनाश्रिताऽत एव । अन्यथा महापद्मवनान्तस्थां मदङ्कोपाश्रयां भवतीमिति वचनं सहस्रदल कमल महापद्मवन कहलाता है । यह देवी उसमें विराजमान है । यह देवी अना- श्रित स्वप्रकाशमय शिवस्वरूप की, अर्थात् मेरी, गोद में बैठी हुई है । कारण हेतु-द्रव्य को कहते हैं । यहीं आगे (३।१९९) क्षेत्रपाल को बलि देने के प्रसंग में इस अर्थ में हेतु शब्द का प्रयोग हुआ है । कारण द्रव्य के पान से जो आनन्द उच्छलित होता है, वही उस शक्ति का स्वरूप है । इसका अभिप्राय यह है कि शोधन के कारण अमृतस्वरूप हुए द्रव्य के पान से उच्छलित आनन्द मात्र ही उस देवी का शरीर है । वह देवी दूसरी कोई नहीं है, स्वयं इस शास्त्र का श्रवण करने वाली तुम ही हो । अनाश्रित स्वरूप मेरी विमर्शात्मिका अनाश्रिता शक्ति तुम ही हो । साधक अपनी इच्छानुसार जिस फल की कामना करता है, वह भगवती उसे सब कुछ देती है । उसका 'महापद्म' इत्यादि मन्त्र से आवाहन कर पूजन करे । इस मन्त्र का अर्थ है— महापद्मवन में स्थित, करणानन्द स्वरूपिणी, सब प्राणियों का कल्याण करने वाली हे परमेश्वरि माता ! आओ आओ ॥ यहाँ प्रश्न उठता है कि 'महापद्मवनान्तस्थाम्' इस पद से अनाश्रित देव और अना- श्रिता देवी का यहाँ आवाहन कर कामेश्वर और कामेश्वरी के रूप में पूजन किया जाता है, इसका निर्णय कैसे होगा ? इसका उत्तर यह है कि महापद्मवन में बैठकर समस्त शास्त्रों का उपदेश करने वाले भगवान् अनाश्रित ही हैं । इसीलिये उनकी शक्ति अना- १. तस्येश्वरस्य-ख. ने. ज. उ. । २. 'नाम' नास्ति-ख. ने. ज. झ. उ. । ३. 'मम' नास्ति-झ., 'मम''''सर्वावयवभूषणः' नास्ति-ख. ने. ज. उ. । ४. तत्फलं-क. ग., फलं स्वसेवकेन-झ. ।

३०४ योगिनीहृदयम् [ पूजासंकेतः कथं घटते ? सदाशिवादीनां तु यद्यप्यागमशास्त्रवक्तृत्वमस्ति, तथापि महा- पद्मवनान्तस्थत्वं नास्ति। तदुक्तं स्वच्छन्दसंग्रहे— अनाश्रितस्य मध्यस्थं व्योमपद्मं सुविस्तरम्। असंख्ययोजनायामं तत्र सिंहासनस्थितः १॥ सूर्यकोट्यर्बुदप्रख्यः शशाङ्ककृतशेखरः। पञ्चवक्त्रो दशभुजस्त्रिपञ्चनयनः प्रभुः॥ सर्वावयवसम्पूर्णो ब्रह्ममूर्तिः २ सनातनः। सर्वज्ञः सर्वकर्ता च सर्वानुग्रहणे रतः॥ सर्वरत्नसमाकीर्णः सर्वा ३वयवभूषणः।] अनाश्रितकला देवो ४तस्योत्सङ्गे सदा स्थिता॥ पञ्चवक्त्रा त्रिनेत्रा च दशबाहीन्दुशेखरा। व्यापिन्यादिचतुष्कं च तादृशं परिकीर्तितम्॥ पूर्वा ५द्युत्तरपर्यन्तं ६दिग्गतैः सेवकैः शिवः। रुद्रकोट्यर्बुदानीकैः ७स्वसारूप्यैःस्वशक्तिभिः॥ श्रिता कहलाती है। अन्यथा 'महापद्मवनान्तस्था मदङ्गोपाश्रया भवती' इन विशेषणों की संगति नहीं बैठेगी। सदाशिव आदि को भी यद्यपि शास्त्र का प्रवक्ता माना गया है, तथापि इनका निवास महापद्मवन में नहीं है। स्वच्छन्दसंग्रह में इस विषय का विशद वर्णन किया गया है— अनाश्रित लोक के बीच में असंख्य योजन विस्तार वाला विशाल व्योमपद्म है। वहाँ सिंहासन पर विराजमान, अरबों-करोड़ों सूर्यों के समान कान्ति वाले, शशांकशेखर, पाँच मुंह, दस भुजा और पन्द्रह नेत्रों वाले भगवान् अनाश्रित शिव विराजमान हैं। यह देव सभी अवयवों से परिपूर्ण सनातन ब्रह्मा हैं, सर्वज्ञ और सर्वकर्ता हैं, सदा सब पर अनु- ग्रह करते रहते हैं। इनका शरीर नाना प्रकार के रत्नों और आभूषणों से सुशोभित है। इनकी गोद में सदा अनाश्रित कला विराजमान रहती है। यह भी पाँच मुख, तीन नेत्र और दस बाहु वाली है। इनके भी ललाट में चन्द्रमा शोभित है। ऐसे ही स्वरूप वाली व्यापिनी १ आदि चार शक्तियाँ पूर्व आदि दिशाओं में विद्यमान हैं। इन्हीं दिशाओं में विद्यमान समान रूपवाले लोकनाथों, सेवकों, करोड़ों-अरबों की संख्या वाली सेनाओं और १. इतः परम्-'अनाश्रितस्येश्वरस्य मध्यस्थः परमेश्वरः' इत्यधिकः पाठः-झ.। २. बृहन्मूर्तिः-झ.। ३. भरणभूषितः-झ.। ४. तदुत्सङ्गे-ख. ने. ज. उ.। ५. दुत्तर- क. ग.। ६. निर्याता सेविका शिवा-ख. ने. ज. उ.। ७. स्वस्वरूपस्व-झ.। १. पहले (पृ० ४७-४८) व्यापिनी की मध्य में तथा सूक्ष्मा आदि चार शक्तियों की चार दिशाओं में स्थिति बताई गई है। व्यापिनी के साथ उन्हीं चार शक्तियों का उल्लेख यहाँ भी किया गया है।

तृतीयः ] दीपिकाभाषानुवादसहितम् ३०५ सेवितो१ लोकनाथैस्तैः२ सृष्ट्यादीनि करोति सः३। अनाश्रितोऽयं भगवान् पञ्चवक्त्रस्त्रिदृक् तथा॥ दशबाहुश्चतुर्बाहुर्द्विबाहुश्चैकवक्त्रकः४। "कौलागमादिवक्ताऽसौ देवदेवः सदाशिवः॥ परापरविभागेन प्रोवाचासंख्यमागमम्। इति। उत्तरपदेऽप्युक्तम्— व्योमाम्बुजे सहस्रारे सितकेसरसंकुले। तत्रासीनं महादेवमपृच्छत् कुलनायिका॥ (१११) इति ॥११०-११२॥ तन्मयैरेव नैवेद्यादिभिरर्चयेत्। भवतीम् इत्यत्राप्यन्वेति। भवतीं स्वसंविल्लक्षणाम्। त्वन्मयैरेव पञ्चभूतमयं विश्वं तन्मयी सा सदाऽनघे। तन्मयी मूलविद्या च तत्तथा कथयामि ते॥ (२।२८) अपनी शक्तियों से सेवित यह अनाश्रित भगवान् शिव सृष्टि आदि कार्यों को सम्पन्न करते हैं। इनके पाँच मुँह, तीन नेत्र हैं। यह स्वरूप दस हाथ वाला, चार हाथ वाला, दो हाथ वाला और एक मुँह वाला भी है। यही देवदेव सदाशिव का स्वरूप धारण कर कौल आदि आगमों के तथा पर और अपर विभाग वाले अन्य असंख्य आगमों के प्रवक्ता हैं॥ १उत्तरपद में भी कहा गया है— श्वेत केसर से संकुल सहस्रार व्योमाम्बुज (अकुल पद्म) में विराजमान महादेव से कुलनायिका भगवती ने पूछा ॥११०-११२॥ यह पूजा संविच्छक्तिस्वरूपिणी आप भगवती के विस्फार से निष्पन्न नैवेद्य आदि से की जानी चाहिये॥ ऊपर के सन्दर्भ में आया 'भवतीम्' शब्द भी यहाँ गृहीत होता है। स्वसंवित्- स्वरूपिणी आप भगवती की पूजा आपकी इच्छा से निर्मित नैवेद्य आदि से की जानी चाहिये। पहले (२।२८) बताया गया है— १. सेविता-ख. ने. ज. उ. । २. पालैश्च-झ. । ३. सा-ख. ज. झ. । ४. बाहुकः— क. विहाय सार्वत्रिकः पाठः । ५ लोका-क. ग. । १. यहाँ उत्तरपद के नाम से उद्धृत वचन उत्तरषट्क नामक ग्रन्थ का प्रथम श्लोक है। शिवानन्द और विद्यानन्द (पृ० १०,७०, २३१, २७०) ने उत्तरषट्क के नाम से ही इस ग्रन्थ को उद्धृत किया है। लघुस्तव के जैन टीकाकार सोमतिलक सूरि भी इस ग्रन्थ को इसी नाम से स्मरण करते हैं। मद्रास और त्रिवेन्द्रम् में कुलदीपिका टीका के साथ प्रकाशित 'षडन्वय महारत्न' नाम से यह उपलब्ध है। २०

३०६ योगिनीहृदयम् [ पूजासंकेतः इति पूर्वोक्तरीत्या $^१$पञ्चभूतानि भवदिच्छाविजृम्भितानि त्वद्रूपाणि, $^२$पञ्चरूपिणमात्मानं दिव्यैः पञ्चोपचारकैः । $^३$अर्चयेत् सह गन्धेन पृथिवीं कुसुमेन खम् ॥ धूपेन वायुं दीपेन तेजोऽन्नेन रसं पुनः । इति प्रामाणिकवचनोक्तरीत्या $^४$तैरेव नैवेद्यादिभिरर्चयेत्। नैवेद्यादिभिरित्यादि- पदेन गन्धपुष्पधूपदीपनैवेद्यानि गृह्यन्ते । सुगन्धवत्पदार्थानुभवेन प्रत्यङ्मुखतया प्रमातरि विश्रान्तिर्गन्धसमर्पणम् । $^५$सुशब्दवत्पदार्थानुभवेन प्रत्यङ्मुखतया प्रमा- तरि विश्रान्तिः पुष्पसमर्पणम् । $^६$सुस्पर्शवत्पदार्थानुभवेन प्रत्यङ्मुखतया प्रमातरि विश्रान्तिर्धूपसमर्पणम् । सुरूपवत्पदार्थानुभवेन प्रत्यङ्मुखतया प्रमातरि विश्रान्ति- यह विश्व पंचभूतमय है । हे अनघे ! यह परा देवता भी पंचभूतमयी है और यह मूलविद्या परादेवता और पंचभूत दोनों का बोध जिस तरह से कराती है, अब मैं उसका वर्णन कर रहा हूँ ॥ इस तरह पंचभूत की उत्पत्ति भगवती की इच्छा से ही होती है, अतः ये सब भग- वती के स्वरूप हैं। किसी प्रामाणिक व्यक्ति ने कहा है— पंचमहाभूत से उत्पन्न इस देह में विराजमान स्वात्मस्वरूप की दिव्य पंचोपचार से पूजा करे। गन्ध के साथ पृथिवी को, पुष्प के साथ आकाश को, धूप के साथ वायु को, दीप के साथ तेज को और अन्न (नैवेद्य) के साथ रस को समर्पित किया जाता है ॥ इसके अनुसार भगवतीस्वरूप इन पाँच महाभूतों को ही यहाँ नैवेद्य आदि के रूप में समर्पित करे । आदि पद से नैवेद्य के साथ गन्ध, पुष्प धूप, दीप का ग्रहण होता है । सुगन्धित पदार्थों का अनुभव करके उनको अपने भीतर के प्रमाता को समर्पित कर देना गन्धसमर्पण है । सुन्दर शब्द से परिपूर्ण गान आदि का अनुभव कर उसको अपने भीतर के प्रमाता को समर्पित कर देना पुष्पसमर्पण है । सुन्दर सुकोमल स्पर्श से परिपूर्ण पदार्थों का अनुभव कर उसको अपने भीतर के प्रमाता को समर्पित कर देना धूपसमर्पण है । सुन्दर स्वरूप वाले पदार्थों का अनुभव कर उनको अपने भीतर के प्रमाता को समर्पित कर देना दीपसमर्पण है । स्वादु रस से परिपूर्ण पदार्थों का अनुभव कर उनको अपने भीतर के प्रमाता को समर्पित कर देना नैवेद्यसमर्पण है । इसका अभिप्राय यह है कि जो इन्द्रियाँ प्रायः पराङ्मुख (बाहर की तरफ) दौड़ती हैं, उनको प्रत्यङ्मुख (भीतर १. 'पञ्च....त्वद्रूपाणि' इत्यस्य स्थाने 'पञ्चोपचारैरर्चयेत्' इति पाठः-ख. ने. ज. उ. । २. नास्त्येषा पङ्क्तिः-ख. ने. ज. उ. । ३. अर्चं-ने. ज. झ. । ४. 'तैरेव....गृह्यन्ते' इत्यस्य स्थाने 'नैवेद्यायागं चरेत् । कोऽर्थः' इति पाठः-ख. ने. ज. झ. उ. । ५. तन्त्र्यात्म- शब्दानु-ख. ने. ज. झ. उ. । ६. 'सु' नास्ति-ख. ने. ज. झ. उ. ।

तृतीयः ] दीपिकाभाषानुवादसहितम् ३०७ दीपसमर्पणम् । स्वादु¹रसवत्पदार्थानुभवेन प्रत्यङ्मुखतया प्रमातरि विश्रान्तिर्नैवेद्य- समर्पणमित्यर्थः । तदुक्तं मुख्याम्नायरहस्ये— इन्द्रियद्वार²संग्राह्यैर्गन्धाद्यैः स्वात्मदेवता । ³स्वभावेन समाराध्या ज्ञातुः सोऽयं महामखः ॥ इति । बहिरपि गन्धपुष्पधूपदीपनैवेद्यानि ⁴पृथिव्याकाशवायुतेजःसलिलभावनया देव्यै समर्पयेदि⁵त्युपचारोपनिषत् ॥११२॥ त्रिकोणे तत्स्फुरत्तायाः प्रतिबिम्बाकृतीः पुनः ।।११२।। तत्तत्तिथिमयोर्नित्याः काम्यकर्मानुरूपिणीः⁶ । त्रिकोणे श्रीचक्रस्य त्रिकोणे⁷ रेखात्रये, तत्स्फुरत्तायाः प्रतिबिम्बाकृतीः, "गुणाः पञ्चदश प्रोक्ता भूतानां तन्मयी शिवा" (२।३०) इत्यत्रैव पूर्वोक्तरीत्या भूतगुणात्मिकायाः पञ्चदशाक्षरशरीरिण्याः⁸ श्रीविद्यायास्तत्र⁹ स्फुरणात् पञ्च- दशप्रतिबिम्बरूपाः, तत्तत्तिथिमयीः तत्संख्याकप्रतिपदादितिथ्यात्मिकाः, काम्य- की तरफ) बना देना ही आन्तर पंचोपचार पूजा है । मुख्याम्नायरहस्य² नामक ग्रन्थ में बताया गया है— इन्द्रियों के द्वारा जिनका संग्रह किया जाता है, उन गन्ध आदि से स्वात्मदेवता की स्वाभाविक पूजा करनी चाहिये । यही योगी साधक का महान् यज्ञ है ॥ बाह्य पूजा में भी गन्ध, पुष्प, धूप, दीप और नैवेद्य का देवी को समर्पण पृथिवी, आकाश, वायु, तेज और जल की भावना के साथ ही करना चाहिये । पंचोपचार पूजा का यही रहस्य है ॥११२॥ त्रिकोण में श्रीविद्या के पन्द्रह अक्षरों की प्रतिबिम्ब-स्वरूपिणी पन्द्रह तिथि- नित्याओं का पूजन कामना के अनुसार करे ॥११२-११३॥ श्रीचक्र के मध्यत्रिकोण की तीन रेखाओं में पन्द्रह तिथिनित्याओं का पूजन करे । पहले (२।३०) बताया गया है—"पाँच भूतों के पन्द्रह गुण होते हैं । अतः पंचभूतमयी यह विद्या भी पन्द्रह अक्षरों वाली है" । तदनुसार भूतगुणात्मिका पंचदशाक्षरी विद्या इस त्रिकोण में प्रतिबिम्बित होकर पन्द्रह तिथिनित्याओं का स्वरूप धारण कर लेती है । १. स्वादूषदंशवत्-ख. ने. ज. झ. उ. । २. ग्राम-क. ख. ग. । ३. स्वाभेदेन- क. ग. । ४. पृथिवीवाय्वाकाशतेजः-ख. ने. ज. झ. । ५. दित्युपनि-ख. ने. ज. झ. उ. । ६. सारिणीः-क. ख. ग. ने. । ७. णरे-झ. उ. । ८. शालिन्याः-ख. ने. ज. झ. उ. । ९. 'तत्र' नास्ति-ख. ने. ज. उ. । १. पृ० २३० की टिप्पणी देखिये ।

३०८ योगिनीहृदयम् [ पूजासंकेतः कर्मानुरूपिणोः१ "नवचक्रक्रमो२ योऽसौ महावश्यादिसिद्धिदः" इति संकेत- पद्धत्युक्तरीत्या बाह्यचक्रार्चनं काम्यं कर्म, तदनुरूपकरचरणादिमद्रूपधारिणीः३ । उत्पत्तिविनाशरहितत्वान्नित्याः, ततः कामेश्वरी नित्या नित्या च भगमालिनी । नित्यक्लिन्नाऽपि४ च तथा भेरुण्डा वह्निवासिनी ॥ महाविद्येश्वरी दूती त्वरिता कुलसुन्दरी । नित्या नीलपताका च विजया सर्वमङ्गला ॥ ज्वालामालिनी५ चित्रा चेत्येवं नित्यास्तु षोडश । (१।२६-२८) इति चतुःशतीशास्त्रोक्ताः । पुनः शब्दादर्चयेदित्यनुषङ्गः ॥११२-११३॥ तत्र प्रकटयोगिन्यश्चक्रे त्रैलोक्यमोहने ॥११३॥ तत्र श्रीचक्रे। त्रैलोक्यमोहने चक्रे पूर्वोक्त(१।८२)निर्वचने चतुरस्रत्रय- इसका भाव यह है कि इस त्रिकोण में श्रीविद्या के पन्द्रह अक्षर प्रतिबिम्बित होते हैं और वे ही प्रतिपत् आदि पन्द्रह तिथिनित्याओं का स्वरूप धारण कर लेते हैं। इनकी पूजा विभिन्न कामनाओं की पूर्ति के लिये की जाती है। संकेतपद्धति में बताया गया है— “यह जो नवचक्र का क्रम बताया गया है, वह महावश्यादि सिद्धियों का देने वाला है”। बाह्य चक्र की पूजा एक प्रकार का काम्य कर्म है। यह भगवती उस काम्य कर्म की सिद्धि के लिये तदनुरूप कर-चरण आदि से संयुक्त स्वरूप धारण कर लेती है। ये सब स्वरूप 'नित्या' के नाम से इस लिये कहे जाते हैं कि ये सब उत्पत्ति और विनाश से रहित हैं। चतुःशती शास्त्र में इन पन्द्रह नित्याओं के नाम गिनाये गये हैं— कामेश्वरी नित्या, भगमालिनी नित्या, नित्यक्लिन्ना, भेरुण्डा, वह्निवासिनी, महा- विद्येश्वरी, दूती, त्वरिता, कुलसुन्दरी, नित्या, नीलपताका, विजया, सर्वमङ्गला, ज्वाला- मालिनी और चित्रा। महात्रिपुरसुन्दरी को मिलाने से इनकी संख्या सोलह होती है ॥ श्लोक में पुनः शब्द आया है। इससे 'अर्चयेत्' क्रिया का अध्याहार किया जाता है। इसका अभिप्राय यह होगा कि त्रिकोण में पन्द्रह तिथिनित्याओं का पूजन अपनी कामना की पूर्ति के लिये करे ॥११२-११३॥ उस श्रीचक्र में स्थित त्रैलोक्यमोहन नामक चक्र में प्रकट योगिनियों का पूजन करे ॥११३॥ उस श्रीचक्र में स्थित त्रैलोक्यमाहन चक्र में, जिसका कि निर्वचन पहले (१।८२) बताया जा चुका है, तीन चतुरस्र के लेखन से सम्पन्न होने वाले उस चक्र में प्रकट १. सारिणीः-क. ख. ग. ने. । २. मयो-ख. झ. । ३. धारिण्यः-ख. ने. ज. झ. उ. । ४. भिधा नित्या-म. । ५. लिनिका चित्रेत्येवं-ख. ने. ज. झ. । Courtesy: Shri Tarun Dwivedi, Surviving Son of Late Vraj Vallabh Dvivediji (15 Jul 1926 - 17 Feb 2012)

तृतीयः ] दीपिकाभाषानुवादसहितम् ३०९ लक्षणे। प्रकटयोगिन्यः, यष्टव्या इत्युत्तरत्र¹ (१।११६) स्थितेनान्वयः ॥११३॥ प्रकटशब्दनिर्वचनमाह— मातृकास्थूलरूपत्वात् त्वगादिव्यापकत्वतः । योगिन्यः प्रकटा ज्ञेयाः स्थूलविश्वप्रधौत्मनि ॥११४॥ मातृकाः³ परापश्यन्तीमध्यमावैखर्यः, तासु स्थूलमकारादिक्षकारान्तं पञ्चा- शद्वर्णमयं वैखरीरूपम्। तदुक्तं स्वच्छन्दसंग्रहे—"स्थूलं पञ्चाशदाकारम्"⁴ इति। तद्रूपत्वात् मातृका⁵स्थूलरूपवैखरीवर्णवर्गाष्टकमयत्वात् सिद्धीनां ब्राह्म्या- दीनां च। तदुक्तं चतुःशत्याम्— वर्गानुक्रमयोगेन ⁶यस्यां मात्रष्टकं स्थितम्। वन्दे तामष्टवर्गोत्थमहासिद्ध्यष्टकेश्वरीम् ।। (१।११) इति । योगिनियों का पूजन करना चाहिये। ११६ व श्लोक में स्थित 'यष्टव्याः' पद का यहाँ भी अन्वय किया जाता है ॥११३॥ प्रकट शब्द का निर्वचन बताते हैं— मातृका का स्थूल स्वरूप इनका आधार है, त्वक् आदि धातुओं में ये व्याप्त हैं, अतः स्थूल विश्व को धारण करने वाले भूपुरयात्मक चक्र में स्थित ये योगिनियाँ प्रकट कहलाती हैं ॥११४॥ परा, पश्यन्ती, मध्यमा और वैखरी ये चार मातृकाएँ हैं। इनमें अकार से क्षकार पर्यन्त पचास वर्णों वाला वैखरी वाणी का आधार स्थूल माना जाता है। स्वच्छन्दसंग्रह में स्पष्ट बताया गया है—"पचास अक्षरों वाला यह आकार स्थूल है"। मातृका का यह स्थूल स्वरूप वैखरी वाणी के आठ वर्गों में विभक्त है और ब्राह्मी आदि सिद्धियां इन्हीं स्थूल वर्णों की अधिष्ठात्री देवियाँ हैं, अतः ये प्रकट योगिनियाँ कही जाती हैं। ¹चतुः- शती शास्त्र में कहा गया है— पूर्णाहन्ता स्वरूपिणी जिस देवी में वर्ग के क्रम से आठ ब्राह्मी प्रभृति मातृकाएँ स्थित हैं, आठ मातृका-वर्णों से उत्पन्न होने वाला आठ सिद्धियों की स्वामिनी उस महा- सिद्धिस्वरूपा भगवती की मैं वन्दना करता हूँ ॥ १. तरस्थि—ख. ने. ज. झ. उ. । २. प्रथा—ख. ने. ज. झ. उ. । ३. कायाः**** र्मात्मिकायाः स्थूल—ख. ने. ज. झ. उ. । ४. दक्षरम्—क. ग. । ५. 'स्थूलरूप' नास्ति— ख. ने. ज. उ. । ६. महासिद्धचष्टकं—क. ग. ।

  1. पृ० ९४ की टिप्पणी देखिये।

३१० योगिनीहृदयम् [ पूजासंकेतः त्वगादिव्यापकत्वतः त्वगसृङ्मांसमेदोऽस्थिमज्जाशुक्रौजस ¹आदिशब्देन गृह्यन्ते। तद्व्यापकत्वात् त्वगाधारभ्रूमध्य-रक्तनितम्ब-मांसनाभि-मेदोहृदय- अस्थिकण्ठ-मज्जास्य-शुक्रनासापुट-(क्रोध ? ओजो)ललाटचक्रेषु स्थितत्वाद् ब्राह्मया- दीनाम्। स्थूलविश्व²प्रधात्मनि (इति) स्थूलत्वकथनम्³। अत एव विश्वं प्रकर्षेण धत्त इति विश्वप्रधा⁴ विश्वम्भरा, तदात्मनि भूगृह⁵त्रयात्मके त्रैलोक्य- मोहने चक्रे स्थितत्वात्। मातृकास्थूलरूपत्वाद् ⁶वैखर्यवयवत्वाच्च त्वगादि- ये योगिनियाँ त्वक् आदि ¹आठ स्थूल धातुओं की भी स्वामिनियाँ हैं। आदि शब्द से असृग् (रक्त), मांस, मेदा, अस्थि, मज्जा, शुक्र और ओज का ग्रहण किया जाता है। त्वचा के आधार भ्रूमध्य में, रक्त के आधार नितम्ब में, मांस के आधार नाभि में, मेदा के आधार हृदय में, अस्थि के आधार कण्ठ में, मज्जा के आधार आस्य (मुँह) में, शुक्र के आधार नासापुट में और क्रोध (ओज) के आधार ललाट चक्र में क्रमशः ब्राह्मी आदि योगिनियाँ स्थित हैं। इस कारण से भी ये योगिनियाँ प्रकट कही जाती हैं। स्थूल विश्व का प्रथन करने वाली इन योगिनियों को स्थूल मानना इसलिये भी उचित है कि ये देवियाँ स्थूल विश्व को भलीभाँति ²धारण करने वाली विश्वम्भरा (पृथिवी) स्वरूप भूगृहत्रयात्मक त्रैलोक्यमोहन चक्र में स्थित हैं। इस तरह से मातृकाओं की स्थूलरूपता के कारण, वैखरी मातृका के स्थूल अवयवों के कारण, त्वग् आदि धातुओं के स्थूलशरीर की अवयवता को लेकर इन सबमें व्यापक रूप से रहने के कारण और त्रैलोक्यमोहन १. आदिना गृ-ख. ने. ज. झ. उ. । २. प्रथा-ख. ने. ज. झ. उ. । ३. नात्-क. ग. घ. । ४. प्रथा-ख. ने. ज. झ. उ. । ५. हात्मके-ख. ने. ज. उ. । ६. 'वैखर्य- वयवत्वाच्च' नास्ति-ख. ने. ज. झ. उ. ।

  1. यहाँ आठ धातुओं की चर्चा है और इनका संबन्ध आठ वर्गों की अधिष्ठात्री ब्राह्मी आदि आठ देवियों से बताया गया है, जो अणिमा आदि आठ सिद्धियों की अधिष्ठात्री हैं। अष्टम धातु के रूप में यहाँ क्रोध (ओज) की चर्चा है। सात्त्विक क्रोध को ही ओज कहा जा सकता है। तेजस्वी पुरुष का ओज कभी कभी क्रोध के रूप में भी प्रकट होता देखा गया है। प्रसंगवश यह अवधेय है कि आयुर्वेद के ग्रन्थों में प्रथम धातु के रूप में रस वर्णित है, त्वक् नहीं। पहले (२।६०-६१) छः धातुओं की जो चर्चा आई है, उनका संबन्ध छः डाकिनियों से है।
  2. यहाँ दीपिकाकार ने "विश्वं प्रकर्षेण धत्त इति विश्वप्रधा" इस तरह से प्रधा शब्द की व्युत्पत्ति दी है। तदनुसार दीपिका में सर्वत्र प्रथा शब्द के स्थान पर प्रधा शब्द होना चाहिये, किन्तु प्रस्तुत स्थल को छोड़ कर यह पाठ किसी भी मातृका में कहीं भी नहीं मिलता। यहाँ भी मूल ग्रन्थ की अनेक मातृकाओं में 'प्रथा' पाठ ही मिलता है।

तृतीयः ] दीपिकाभाषानुवादसहितम् ३११ धातूनां स्थूलशरीरावयवतया तद्व्यापकत्वात् त्रैलोक्यमोहनचक्रस्य स्थूलविश्वम्भरा- त्मकत्वाच्च १ तदन्तर्गताः सिद्धयो ब्राह्म्याद्याश्च प्रकटा ज्ञेया इत्यर्थः ॥११४॥ अन्त्यभूगृहनिवासिनीनां नामग्रहणपूर्वकं ध्यानमाह— अणिमाद्या महादेवि सिद्धयोऽष्टौ व्यवस्थिताः । तास्तु २ रक्ततरा वर्णैर्वराभयकरास्तथा ॥११५॥ धृतचिन्तामहारत्ना मनीषितफलप्रदाः । अणिमाद्याः "अणिमां पश्चिमद्वारे" (१।१५३) इत्यादि चतुःशती- शास्त्रोक्ताः । लघिमामहिमेशितावशिताप्राकाम्यभुक्तीच्छाप्राप्तिसर्वकामाख्याः ३ सिद्धयस्तत्रादिशब्देन गृह्यन्ते । अष्टौ व्यवस्थिता ४अष्टसिद्धयो निघण्टुप्रसिद्धाः । अत्र तु दशेति तात्पर्यम्— वामजङ्घां समारभ्य वामादिक्रमतोऽपि च । सिद्धयष्टकं न्यसेत् तेषु द्वयं पादतले न्यसेत् ॥ (३।७९-८०) चक्र की स्थूल विश्वम्भरात्मकता (पार्थिवता) के कारण भी इनमें रहने वाली सिद्धियाँ और ब्राह्मी प्रभृति देवियाँ प्रकट योगिनियाँ कही जाती हैं ॥११४॥ अन्तिम भूगृह में रहने वाली शक्तियों के नाम और ध्यान इस प्रकार हैं— हे महादेवि ! अणिमा आदि १आठ सिद्धियाँ यहाँ स्थित हैं। इनका वर्ण चटक लाल है। वर और अभय मुद्रा में ये स्थित हैं। चिन्तामणि नामक महारत्न इनके पास है, जिससे कि ये साधक को अभीष्ट फल प्रदान करती हैं ॥११५-११६॥ चतुःशती शास्त्र (१।१५३-१५५) में अणिमा, लघिमा, महिमा, ईशिता, वशिता, प्राकाम्य, भुक्ति, इच्छा, प्राप्ति और सर्वकामा नाम की दस सिद्धियाँ वर्णित हैं। आदि शब्द से अणिमा तथा अन्य सिद्धियों का ग्रहण किया जाता है। इनमें से आठ सिद्धियाँ निघण्टु (कोश) ग्रन्थों में भी प्रसिद्ध हैं, यहाँ दस सिद्धियाँ वर्णित हैं। न्यास प्रकरण में यहाँ (३।७९-८०) वाम जंघा के वाम भाग से और वाम अन्तराल क्रम से आठ सिद्धियों १. 'च' नास्ति-ख. ने. ज. झ. उ. । २. तासु-क. ख. ग. ने. । ३. ख्यसिद्धयो दशादि-ख. ने. झ. उ. । ४. अष्टौ-ख. ने. ज. झ. उ. । १. दीपिका और सेतुबन्ध दोनों टीकाओं में आठ शब्द को दस का उपलक्षण माना है। यहाँ दस सिद्धियाँ मानी गई हैं, अतः ध्यान भी दसों सिद्धियों का होना चाहिये । आठ वर्गों की अधिष्ठात्री सिद्धियाँ अणिमा आदि आठ ही हैं, अतः उनकी ओर इंगित करने के लिये मूल में आठ शब्द दे दिया गया है।

३१२ योगिनीहृदयम् [ पूजासंकेतः इत्यत्रैवोक्तत्वात्¹। महारत्नं चिन्तामणिः। शेषं² स्पष्टम् ॥११५-११६॥ ब्राह्मयाद्या अपि तत्रैव यष्टव्याः ³क्रमशः प्रिये ॥११६॥ ब्राह्मयाद्याः “ब्रह्माणी पश्चिमद्वारे” (१।१५६) इति चतुःशतीशास्त्रोक्ताः। तत्रैव मध्यचतुरस्रे यष्टव्याः। क्रमशः क्रमेण ॥११६॥ तासां प्रत्येकं⁴ ध्यानमाह— ब्रह्माणी पीतवर्णा च चतुर्भिः शोभिता मुखैः । वरदाऽभयहस्ता च कुण्डिकाक्षस्रगुज्ज्वला⁵ ॥११७॥ करैरिति शेषः। शिष्टं स्पष्टम् ॥११७॥ माहेश्वरी श्वेतवर्णा त्रिनेत्रा शूलधारिणी । कपालमेणं परशुं दधाना पाणिभिः प्रिये ॥११८॥ एकेन पाणिना शूलधारिणी, त्रिभिः कपालमेणं परशुं दधाना ॥११८॥ का तथा बची दो सिद्धियों का पाद तल में न्यास बताया गया है। चिन्तामणि को महा- रत्न माना जाता है। शेष शब्दों का अर्थ स्पष्ट है ॥११५-११६॥ हे प्रिये ! ब्राह्मी प्रभृति देवियों की भी यहीं क्रमशः पूजा करनी चाहिये ॥११६॥ चतुःशती शास्त्र (१।१५६-१५७) में वर्णित ब्रह्माणी आदि देवियों की भी पूजा क्रमशः यहीं मध्य चतुरस्र में करनी चाहिये ॥११६॥ इनमें से प्रत्येक का ध्यान बताते हैं— ब्रह्माणी का वर्ण पीत है। चार मुंह इसकी शोभा बढ़ाते हैं। वर और अभय मुद्रा, कुण्डिका और अक्षमाला से इसके चार हाथ शोभायमान है ॥११७॥ वर, अभय, कुण्डिका और अक्षमाला का संबन्ध 'करैः' शब्द का अध्याहार कर किया जाता है। बाकी का अर्थ स्पष्ट है ॥११७॥ माहेश्वरी का वर्ण श्वेत है। यह तीन नेत्रों वाली है। हे प्रिये ! यह अपने चार हाथों में शूल, कपाल, एण (हिरन) और परशु धारण किये हुए है ॥११८॥ एक हाथ से यह शूल को धारण करती है और बाकी तीन हाथों में कपाल, एण और परशु धारण किये हुए है ॥११८॥ १. वोक्तम्-ख. ने. ज. उ. । २. शिष्टं-ख. ज. झ. उ. । ३. क्रमतः-क. ग. । ४. 'प्रत्येकं' नास्ति-ख. ने. ज. झ. उ. । ५. लसत्करा-ख. ग. ने. ज. झ. ।

तृतीयः ] दीपिकाभाषानुवादसहितम् ३१३ कौमारी पीतवर्णा च शक्तितोमरधारिणी । वरदाभयहस्ता च ध्यातव्या ^१परमेश्वरी ॥११९॥ स्पष्टम् ॥११९॥ वैष्णवी श्यामवर्णा च शङ्खचक्रगदाब्जकान्^२ । हस्तपद्मैश्च बिभ्राणा भूषिता दिव्यभूषणैः ॥१२०॥ वाराही श्यामलच्छाया ^३पोत्रिवक्त्रसमुज्ज्वला । हलं च मुसलं खड्गं खेटकं दधती भुजैः ॥१२१॥ स्पष्टम् ॥१२०-१२१॥ ऐन्द्री श्यामलवर्णा च वज्रोत्पललसत्करा । स्पष्टम् ॥१२२॥ चामुण्डा कृष्णवर्णा च शूलं डमरुकं तथा ॥१२२॥ खड्गं वेतालकं चैव दधाना दक्षिणेर्भुजैः^४ । नागखेटकघण्टाख्यान्^५ दधानान्त्यैः कपालकम् ॥१२३॥ कौमारी का वर्ण पीत है। इस परमेश्वरी का ध्यान शक्ति और तोमर धारिणी देवी के रूप में करना चाहिये। इसके अन्य दो हाथ वर और अभय मुद्रा से सुशोभित हैं ॥११९॥ इसका अर्थ स्पष्ट है ॥११९॥ वैष्णवी श्याम वर्ण की है। यह अपने हाथों में शंख, चक्र, गदा और पद्म धारण किये हुए है और दिव्य भूषणों से भूषित है। वाराही श्यामल वर्ण की है, इसका मुह सूकर का है और यह अपनो भुजाओं में हल, मुसल, खड्ग (तलवार) और खेटक (दण्ड) लिये हुए है ॥१२०-१२१॥ अर्थ स्पष्ट है ॥१२०-१-१॥ ऐन्द्री श्यामल वर्ण की है। इसके दोनों हाथों में वज्र और कमल शोभित है ॥ अर्थ स्पष्ट है ॥१२२॥ चामुण्डा कृष्ण वर्ण की है। यह अपने दाहिने चार हाथों में शूल, डमरु, खड्ग और वेताल धारण किये हुए है और बायें चार हाथों में नाग, खेटक, घण्टा और कपाल लिये हुए है ॥१२२-१२३॥ १. च सुरेश्वरि-ख. ने. छ. ज. झ. । २. वराभयान्-क. ग. उ. । ३. पोत्र-क. । ४. णैः करैः-क. ग. । ५. मुण्डाख्यं-ख., घण्टाख्यं-ने. च. छ. । Courtesy: Shri Tarun Dwivedi, Surviving Son of Late Vraj Vallabh Dwivediji (15 Jul 1926 - 17 Feb 2012)

३१४ योगिनीहृदयम् [ पूजासंकेतः वेतालः पिशाचविशेषः । शूलडमरुखङ्गवेतालान् दक्षिणेः करैः, नागखेटक- ^१घण्टाकपालानि वामकरैर्दधानेत्यर्थः ॥१२२-१२३॥ महालक्ष्मीस्तु पीताभा पद्मौ^२ दर्पणमेव च । मातुलुङ्ग^३फलं चैव दधाना परमेश्वरी ॥१२४॥ स्पष्टम् । ननु मुद्रादशकं किमित्यन्तश्चतुरस्रे पूज्यत्वेन ^४नोक्तम् ? सत्यम्, चतुःशतीशास्त्रे^५ऽनुक्तत्वादत्रापि^६ प्राधान्येन^७ नाख्याताः, किन्तु श्रीचक्रन्यासे “मूलाधारे न्यसेन्मुद्रादशकं साधकोत्तमः” (३।७७) इति सूचिताः । अतोऽन्तश्चतु- रस्रे मुद्रादशकमपि पूजयेत् ॥१२४॥ एवं ध्यात्वा यजेदेताश्चक्रेशीं त्रिपुरां ततः । एवम् उक्तप्रकारेण । एताः प्रकटयोगिनीर्ध्यात्वा, चक्रेशीं त्रैलोक्यमोहन- चक्रेशीं त्रिपुरां यजेत् ॥१२५॥ वेताल एक प्रकार का पिशाच है। चामुण्डा के दाहिने हाथों में शूल, डमरु, खड्ग और वेताल तथा बाये हाथों में नाग, खेटक, घण्टा और कपाल सुशोभित हैं ॥१२२- १२३॥ महालक्ष्मी का वर्ण पीत है। इस परमेश्वरी के चार हाथों में से दो में पद्म और बाकी के दो हाथों में दर्पण और मातुलुंग फल (चकोतरा) सुशोभित हैं ॥१२४॥ इसका अर्थ स्पष्ट है । प्रश्न होता है कि चतुरस्र चक्र में दस मुद्राओं का भी पूजन होना चाहिये । उनका यहाँ उल्लेख क्यों नहीं किया गया ? आपका कहना सही है। चतुःशती शास्त्र में मुद्राओं का पूजन नहीं बताया गया है, इसीलिये यहाँ भी उनका उल्लेख नहीं किया गया है, किन्तु श्रीचक्र न्यास प्रकरण में यहाँ (३।७७) मूलाधार में दस मुद्राओं का न्यास बताया गया है। अतः इस चतुरस्र चक्र में ही दस मुद्राओं का भी पूजन करना चाहिये ॥१२४॥ इस तरह से इन प्रकट योगिनियों का ध्यान कर पूजा करे और तब चक्रेशी त्रिपुरा का भी पूजन करे ॥ इस तरह से ऊपर बताई गई विधि से इन प्रकट योगिनियों का ध्यान करके तब त्रैलोक्यमोहन चक्र की स्वामिनी त्रिपुरा की भी पूजा करे ॥१२५॥ १. मुण्डक-ख., घण्टास्थ्य-ने. झ. उ. । २. पद्म-क. ग., पद्मं-उ. । ३. लिङ्ग-क. छ. ज. । ४. नात्रोक्तं-झ. । ५. स्त्रेऽप्यनु-ख. झ. उ. । ६. दत्रैव-ख. झ. उ. । ७. न्येनाख्या तव्याः-ख. ने. ।

तृतीयः ] दीपिकाभाषानुवादसहितम् ३१५ विद्यादेवतयोरभेदविवक्षया च त्रैलोक्यमोहनचक्रेशीविद्यानिर्वचनमाह— कर्मेन्द्रियाणां वैमल्यात् करशुद्धिकरी स्मृता ॥१२५॥ आत्मतत्त्वगतयोरशुद्धयोरत्र कर्मकरणात्मनोर्द्वयोः । शुद्धतत्त्व¹लयभावनामयी शुद्धिरात्मकयोः परा मता ॥ (चि० स्त० ११) इत्यस्मदुक्तरीत्याऽऽत्मतत्त्वस्याशुद्धत्वात् कर्मेन्द्रियाणामप्यात्मतत्त्वान्तःपाति- त्वात् ²करयोश्च कर्मेन्द्रियत्वादशुद्धयोः ³कार्यकरणात्मनोः करयोः कार्ययोः, स्वकारणे शुद्धतत्त्वे शिवाद्वैतलयभावना करशुद्धिः, तत्करीयम् । स्मृता निरुक्ता ॥१२५॥ ⁴कार्यशुद्धिभवा सिद्धिरणिमा चात्र संस्थिता । कारणात्मपरामृष्टकार्य⁵रूपाऽङ्गुलिस्थिताम् । करोमि चिन्मयीं शुद्धिं करयोः ⁶स्पर्शशोधिनीम् ॥ (सु० वा० २४) अब भगवान् यह कहना चाहते हैं कि विद्या और देवता में कोई भेद नहीं है । इसी अभिप्राय से त्रैलोक्यमोहन चक्र की स्वामिनी त्रिपुरा की करशुद्धिकरी विद्या से अभिन्नता बताते हुए उसका निर्वचन करते हैं— कर्मेन्द्रियों को विमल करने वाली यह विद्या करशुद्धिकरी कहलाती है ॥१२५॥ साधक के दोनों हाथों की गिनती कर्मेन्द्रियों में होती है, जो कि अशुद्ध आत्मतत्त्व के अन्तर्गत आते हैं । इनकी शुद्ध शिवस्वरूप में लीन होने की भावना ही उत्कृष्ट शुद्धि मानी जाती है ॥ व्याख्याकार के चिद्विलास स्तव के इस वचन के अनुसार आत्मतत्त्व अशुद्ध है, कर्मेन्द्रियों की गिनती आत्मतत्त्व में ही होती है और हाथ कर्मेन्द्रिय होने से अशुद्ध हैं । इन कार्यकरणात्मक हाथों की शुद्धि यही है कि अपने कारण शुद्ध तत्त्व में, शिवाद्वय- भावना में उनको लीन कर दिया जाय । करशुद्धिकरी विद्या यही कार्य करती है ॥१२५॥ कार्य की शुद्धि से उत्पन्न अणिमा नाम की सिद्धि भी यहीं रहती है ॥ पाञ्चभौतिक देह में कार्यरूप से प्रकट हुई दाहिने और बायें हाथ की अंगुलियाँ वास्तव में अपने कारणभूत प्रकाश और विमर्श से अभिन्न हैं । प्रकाश और विमर्श स्वरूप कारण के रूप में भावना कर मैं इन कार्य रूप में परिणत अंगुलियों में चित्स्वरू- पिणी शुद्धि का आधान कर रहा हूँ, जिससे कि मेरे दोनों हाथ शुद्ध हो जाँय और इनसे मैं जिन पदार्थों का स्पर्श करूँ, वे भी शुद्ध हो जाँय, उनमें किसी प्रकार का स्पर्श दोष न आवे ॥ १. गत-ख. ने. उ. । २. 'करयोश्च' नास्ति-ख. झ. उ. । ३. 'कार्यकरणात्मनोः' नास्ति-ख. झ. उ. । ४. कर-ख. च. ज. । ५. भूता-मु. । ६. परि-मु. ।

३१६ योगिनीहृदयम् [ पूजासंकेतः इत्यभियुक्तवचनोक्तरीत्या कार्यस्य शुद्धिर्नाम कारणतावन्मात्रतया पर्यव- सानम् । "अणोरणीयान्" (क० उ० २।२०) इति श्रुत्युक्ताणीयसि कारणे विद्य- मानस्यात्मनोऽणिमा सिद्धयतीत्यणिमासिद्धिः । सा चात्र त्रैलोक्यमोहने चक्रे स्थितेति तात्पर्यम् ॥१२६॥ द्वितीयचक्रे पूजां सवासनामाह— षोडशस्पन्दसन्दोहे चमत्कृतिमयीः कलाः ॥१२६॥ प्राणादिषोडशानां तु वायूनां प्राणनात्मिकाः । बीजभूताः स्वरात्मत्वात् कलनाद् बीजरूपकाः ॥१२७॥ अन्तरङ्गतया गुप्ता योगिन्यः संव्यवस्थिताः । कामाकर्षणरूपाद्याः सृष्टेः प्राधान्यतः प्रिये ॥१२८॥ सर्वाशापूरणाख्ये तु चक्रे वामेन पूजयेत् । स्पन्दो नाम परायास्तत्त्वरूपेण प्रसारः । तदुक्तं परापञ्चाशिकायाम्— "सिसृक्षोः प्रथमस्पन्दः शिवतत्त्वं प्रभोः स्मृतम्" (श्लो० १८) इति । तेन षोडश शिवानन्द मुनि की इस उक्ति के अनुसार कार्य की शुद्धि यही है कि वह अपने कारण में केवल कारण रूप में ही पर्यवसित (परिणत) हो जाय । कारण ब्रह्म के लिये श्रुति में बताया गया है—"वह अणु से भी अणुतर है"। इस अत्यन्त सूक्ष्म कारण में अवस्थित हो जाने पर साधक को अणिमा सिद्धि प्राप्त हो जाती है। वह सिद्धि त्रैलोक्यमोहन नामक चक्र में स्थित है। इस प्रकरण का यही तात्पर्य है ॥१२६॥ द्वितीय चक्र की पूजा और वासना का अब वर्णन करते हैं— सोलह स्पन्दों के समूह रूप सर्वाशापरिपूरक चक्र में प्राण आदि सोलह पदार्थों में प्राण का संचार करने वाला चमत्कारमय कलाएँ रहती हैं। बीज (बिन्दु) से संयुक्त स्वर इनकी कलना करते हैं, अतः ये कलाएँ बीजस्वरूपिणी हैं। अन्तरङ्ग होने से ये गुप्त योगिनियाँ कहलाती हैं। इनके कामाकर्षिणी आदि नाम हैं। हे प्रिये ! सृष्टि की प्रधानता होने से सर्वाशापरिपूरक चक्र में इनकी पूजा वामावर्त क्रम से होनी चाहिये ॥१२६-१२९॥ परा शक्ति का तत्त्वों के रूप में जो प्रसार होता है, उसे स्पन्द कहते हैं। परा- पंचाशिका में बताया गया है—"सृष्टि करने के लिये उद्यत प्रभु का प्रथम स्पन्द शिव- १. तोति सिद्धिः-ख. ने. ज. झ. उ. । २. प्राणानां-ख. ने. च. छ. ज. झ. । ३. तत्त्व-ख. ने. च. झ. । ४. रूपगाः-ख. ने. च. छ. ज. । ५. प्तयो-ख. ने. च. छ. ज. झ. । ६. संस्थिता मताः-ख. ने. च. छ. ज. झ. । ७. ष्टिप्रा-ख. ने. च. छ. ज. झ. उ. । ८. 'तदुक्तं''''षोडश स्पन्दाः' नास्ति-ख. ने. ज. उ. ।

तृतीयः ] दीपिकाभाषानुवादसहितम् ३१७ स्पन्दाः षोडशविकारा भूतेन्द्रियमनांसि, तेषां सन्दोहः १। चमत्कारो नाम२ तस्मिन् चिदतिशयोदयः । तदुक्तं क्रमोदये—“स्थैर्यमेति३ चमत्कारो विना विषय- संगतिम्” इति । तन्मय्यो भूतेन्द्रियमनःसु चिदनुप्रविष्टाः कलाः षोडश४ स्फुरन्ति, तदात्मिका इत्यर्थः । कलाः षोडशसंख्याकाः कलाभिधानाश्च । प्राण आदिर्येषां तेऽपानोदानसमानव्याननागकूर्मकृकरदेवदत्तधनञ्जया दश प्रसिद्धा वायवः । ५अन्ये षडागमान्तरेषु मृग्याः, तेषां प्राणनात्मिकाः, ६सर्वेषां प्राणना(त्मिकाः?त्मकाः) तत्त्व माना गया है”। तदनुसार षोडश स्पन्द शब्द से यहाँ सोलह विकारों (पाँच महा- भूत और एकादश इन्द्रिय) का ग्रहण किया जाता है। इनका संदोह (समूह) ही सर्वाशा- परिपूरक चक्र के रूप में परिणत होता है। चमत्कार कोई अनोखी वस्तु होती है। क्रमोदय में वर्णित है—"विषयों का सम्पर्क हुए बिना ही चमत्कार, अर्थात् अद्भुत सहजानन्द स्फुरित हो उठता है"। इस चमत्कार से परिपूर्ण चिच्छक्ति सम्पन्न सोलह कलाएँ पाँच महाभूतों और एकादश इन्द्रियों में स्फुरित होकर तदात्मक बन जाती हैं। कला शब्द सोलह संख्या और कला दोनों का वाचक है। प्राण के साथ जुड़ा आदि शब्द अपान, उदान, समान, व्यान, नाग, कूर्म, कृकर, देवदत्त, धनंजय—इन सभी दस वायुओं का द्योतक है। अन्य१ छः वायुओं के नाम अन्य आगमों में खोजने चाहिये । इन प्राणों में भी ये १. सन्दोहः समूहः-ख. ने. ज. झ. उ. । २. नाम कश्चिद-क. । ३. मेव-ख. ने. ज. झ. उ. । ४. षोडशधा-ख. ने. ज. झ. उ. । ५. अन्येष्वग्राग-सार्वत्रिकः पाठः, सेतु- बन्धानुसारी पाठोऽत्र स्थापितः । ६. 'सर्वेषां प्राणनात्मिकाः' नास्ति-ख. ज. झ. उ. ।

  1. सभी मातृकाओं में मिले पाठ के अनुसार यहाँ अर्थ होगा कि इन दस वायुओं के नाम आगमान्तर से जानने चाहिये, किन्तु इनके नाम तो योगिनीहृदय (२।६२) में भी मिलते हैं। इनके लिये कालोत्तर (१०।५-६) आदि अन्य आगमों को देखने की आवश्यकता नहीं है। भास्करराय ने अपनी व्याख्या में दीपिका के इस प्रसंग को उठाया है और वहाँ स्पष्ट लिखा है कि इन दस वायुओं के अतिरिक्त अन्य छः वायुओं के नाम आगमान्तर से जानने चाहिये । तदनुसार हमने दीपिका का संशोधित पाठ मूल में रखा है। किन्तु अन्य किसी भी आगम में उक्त दस वायुओं के अतिरिक्त अन्य छः वायुओं के नाम नहीं मिलते । प्राण की पाँच वृत्तियों की आहंकारिकता की चर्चा हम पहले (२।५९) कर चुके हैं। यह अहंकार की समष्ट्यात्मक वृत्ति है। अहंकार की व्यष्ट्यात्मक वृत्तियाँ सोलह मानी गई हैं, जो कि इनके सात्त्विक, राजस और तामस भेद से प्रकट होती है। दीपिकाकार ने सोलह स्पन्दों के रूप में इन्हीं का ग्रहण किया है, किन्तु भास्करराय पाँच प्राण और एकादश इन्द्रियों की गणना षोडश स्पन्दों में

३१८ योगिनीहृदयम् [ पूजासंकेतः

प्राणादयो हि, (एते तु ? एतास्तु) तेषां प्राणादीनामपि प्राणनात्मिका इत्यर्थः । बीजभूता बिन्दुयुक्तत्वात् । स्वराः षोडश अकारादिविसर्गान्ताः, तदात्मकत्वात् । कलनात् प्रक्रमात् । सबिन्दुकस्वरप्राप्तत्वात् १कलनाद् बीजरूपकाः२ [३स्वस्व- बीजस्वरूपाः । अन्तरङ्गतया षोडशविकाराणां त्वगादिधातुवत् तत्राप्रकटत्वात् तन्मय्यः ।] तन्मया योगिन्यो गुप्ताः ४संव्यवस्थिताः । अन्तरङ्गतया अन्तरङ्गम् अन्तरिन्द्रियं बुद्धिः, तच्चमत्कारमयत्वादेता अप्यन्तरङ्गाः, अत एव गुप्ताः, सर्वाशापूरणाख्ये तु चक्रे, योगिन्य इत्यत्र छान्दसत्वाद् द्वितीयार्थे प्रथमा । कामाकर्षणरूपाद्या “कामाकर्षणरूपां च” (१।१५८) इत्यादि चतुःशतीशास्त्रोक्ताः । सृष्टेः५ प्राधान्यतः सृष्टौ वामचक्रस्यैव प्रधानत्वात्, अस्यैव६ चक्रस्य सृष्टिरूपत्वात् । ७अतस्ता योगिनीर्वमिन पूजयेद् वामावर्तक्रमेण८ पूजयेत् । विकाराः षोडश विलासभूताः । प्राणादि९षोडशवायूनां जगत्प्राणनादिशक्त्यात्मिकाः सबिन्दुषोडशस्वरैराकलिताः प्रत्येकं तन्मयीरन्तरङ्गचिदनुप्रविष्टषोडशविकारतया गुप्ताः कामाकर्षिण्याद्याः कलाः सर्वाशापरिपूरके चक्रे वाममार्गेण पूजयेदित्यर्थः ॥१२६-१२९॥ ही कलाएँ प्राण का संचार करती हैं। बिन्दु से संयुक्त होने से ये बीजात्मक हैं। अकार से विसर्ग पर्यन्त स्वर सोलह हैं। ये सोलह कलाएँ इन स्वरों का ही प्रतिनिधित्व करती हैं। बिन्दु से संयुक्त इन सोलह स्वरों से इनकी पहचान होती है, अतः ये कलारूप योगिनियाँ बीजस्वरूपिणी मानी जाती हैं। ये योगिनियाँ गुप्त रूप से रहती हैं, क्योंकि ये अन्तरङ्ग हैं। बुद्धि भीतर की इन्द्रिय है, उसी के चमत्कार से, अनोखे विस्तार से, इनका निर्माण हुआ है। अतः ये भी अन्तरंग हैं और इसी लिये गुप्त रूप से सर्वाशा- परिपूरक चक्र में रहती हैं। योगिनी शब्द में द्वितीया के अर्थ में प्रथमा विभक्ति का प्रयोग छान्दस है। चतुःशती शास्त्र (१।१५८-१६१) में इन कामाकर्षिणी आदि सोलह कलाओं (योगिनियों) के नाम बताये गये हैं। सृष्टि में वाम चक्र की प्रधानता रहने से और सर्वाशापरिपूरक के सृष्टि चक्र होने से इन योगिनियों की पूजा भी यहाँ वामावर्त क्रम से ही होनी चाहिये। इसका अभिप्राय यह है कि सोलह विकार परा शक्ति के विलास हैं। प्राण आदि सोलह वायुओं में प्राण का संचार करने वाली शक्तियाँ बिन्दुसंयुक्त सोलह स्वरों से आकलित होती हैं और उसी रूप में परिणत हो जाती हैं। अन्तःकरण में चिच्छक्ति के प्रवेश से प्राण आदि सोलह विकारों की सृष्टि होने से ये गुप्त हैं। इन कामाकर्षिणी आदि गुप्त योगिनियों की पूजा वामावर्त क्रम से सर्वाशापरिपूरक चक्र में की जाती है ॥१२६-१२९॥


१. 'कलनाद्' नास्ति-ख. ज. ड. । २. पगाः-ख. ज. उ. । ३. 'स्वस्व'...'तन्मय्यः' नास्ति-ख. ज. झ. उ. । ४. संस्थिताः-ख. ने. ज. झ. । ५. सृष्टिप्रा-ख. ने. ज. झ. उ. । ६. 'एव' नास्ति-ख. ने. ज. झ. उ. । ७. ततस्ताः-ख. ने. ज. झ. उ. । ८. णार्चयेत्- ख. ने. ज. झ. उ. । ९. विदश-ख.

तृतीयः ] दीपिकाभाषानुवादसहितम् ३१९ एतासां ध्यानमाह— पाशाङ्कुशधरा ह्येता रक्ता रक्ताम्बरावृताः ॥१२९॥ स्पष्टम् ॥१२९॥ तच्चक्रदेवतार्चने सिद्धिमाह— प्राणशुद्धिमयी सिद्धिर्लघिमा भोक्तुरात्मनः । “आनीदवातं स्वधया तदेकम्” (ऋ० १०।१२९।२) इति श्रुत्युक्तरीत्या विश्व- प्राणन्२रूपया स्वधया३ सह यदेकरसमयं प्राणिति, तस्मिन् स्वकारणे लयः प्राणा- दीनां वायूनां शुद्धिर्नाम । अत्र प्राणशब्दो वायुमात्रोपलक्षणपरः । तेन वायुलय- लक्षणायां शुद्धौ मनोलयलक्षणः समाधिर्भवति । ततस्तदेकरसभूतस्य भोक्तुरात्मनो जीवस्य यष्टुस्तद्गुणो लघिमा सिद्धिर्भवति ॥१३०॥ त्रिपुरेशी च चक्रेशी पूज्या सर्वोपचारकैः ॥१३०॥ इनका ध्यान बताते हैं— ये सब गुप्त योगिनियाँ रक्त वर्ण की हैं, रक्त वस्त्र पहने हुए हैं और पाश तथा अंकुश धारिणी हैं ॥१२९॥ इसका अर्थ स्पष्ट है ॥१२९॥ इस चक्र में देवता की पूजा करने से यह सिद्धि मिलती है— इस चक्र में निर्दिष्ट देवताओं की पूजा करने वाला साधक प्राण की शुद्धि से उत्पन्न लघिमा सिद्धि को प्राप्त कर लेता है ॥ “उस प्रलयावस्था में वह अकेला ब्रह्म ही बिना प्राण वायु के अपनी स्वधा शक्ति से जीवित था” इस श्रुति के अनुसार विश्व में प्राण का संचार करने वाली अपनी स्वधा शक्ति के साथ एकरस होकर जो अवस्थित है, उस परम कारण में लीन हो जाना ही प्राण आदि वायुओं की शुद्धि मानी जाती है। यहाँ प्राण शब्द समस्त वायुओं का संग्राहक है। इससे समस्त पवनों की लयरूप शुद्धि के हो जाने पर मनोलय स्वरूप समाधि लग जाती है। तब उस परम तत्त्व के साथ समरस हुए साधक जीव को तदनुरूप लघिमा सिद्धि प्राप्त हो जाती है ॥१३०॥ साधक को यहाँ सभी उपचारों से चक्रेश्वरी त्रिपुरेशी की पूजा करनी चाहिये ॥१३०॥ १. करा एताः-ख. ने. च. छ. ज. झ. उ. । २. प्रीणन-ख. ने. ज. । ३. सुधया- ख. ने. झ. उ. ।