योगिनी हृदयम् (अमृतानन्दनाथ विमर्शिनी एवं पं. व्रजवल्लभ द्विवेदी सविस्तार सटीक)
Yogini Hridayam with Amritanandanatha Dipika by Vraj Vallabha Dwivedi
अमृतानन्दनाथ (भाष्यकार: पं. व्रजवल्लभ द्विवेदी) द्वारा
तृतीयः ] दीपिकाभाषानुवादसहितम् २९३ एवमर्घ्यशुद्धिं कृत्वा तदनन्तरं गुरून् पूजयेदित्याह— गुरुपोदालिमापूज्य भैरवाय ददेत् पुनः । गुरूणां परमशिवादित्वगुरुपर्यन्तानाम्, २पादांलि ३पादुकापरम्परां ४दिव्य- सिद्धमानवौघत्रयवतीम्, आपूज्य स्वशिरस्यर्घ्योदकाक्षतकुसुमैरभ्यर्च्य । शोधित- मर्ध्यमाललाटं ५त्रिुरुद्धृत्य महापद्मवनान्तस्थशृङ्गाटोदरवासिने गुरुरूपिणे पूर्वोक्त- (१।१)निर्वचनाय ६भैरवाय, ददेत् निवेदयेत् ॥१०४॥ तत् पुनः— तदाज्ञाप्रेरितं तच्च गुरुपङ्क्तौ निवेदयेत् ॥१०४॥ तस्य गुरुरूपिणो भैरवस्य, आज्ञा७प्रेरितम् अनुज्ञातम्, ८तच्च द्रव्यं पुनश्च गुरुपङ्क्तौ निवेदयेत् ॥१०४॥ इस तरह से अर्घ्य की शुद्धि के बाद गुरुपंक्ति की आराधना करे, यह विषय अब बताया जा रहा है— गुरुओं की पादुका-परम्परा का पूजन करने के उपरान्त इस अर्घ्य को भैरव को निवेदित करे ॥ परशिव से लेकर अपने गुरु तक की पादुका-परम्परा की, दिव्य, सिद्ध और मान- वौघ क्रम से चली आ रही गुरु-परम्परा की पूजा करने के उपरान्त, अपने ही सिर पर अर्घ्योदक, अक्षत और पुष्प के द्वारा पूजन करके तब उस शोधित अर्घ्य को तीन बार उठाकर महापद्मवन में स्थित त्रिकोण के मध्य में विराजमान गुरुरूपी भैरव के प्रति निवे- दित करे । भैरव पद का निर्वचन पहले (१।१) बता दिया गया है ॥१०४॥ इसके बाद— उस गुरुरूपी भैरव की आज्ञा प्राप्त कर उस अर्घ्य को गुरुपंक्ति के लिये निवेदित करे ॥१०४॥ उस गुरुरूपी भैरव की आज्ञा के मिल जाने पर उस द्रव्य (अर्घ्य) को पुनः गुरुपंक्ति के लिये अर्पित करे ॥१०४॥ १. पादावलि पूज्य-क. उ. । २. पादावलिं-क. उ., वलीं-ख. ने. । ३. 'पादुका' नास्ति-ख. ने. झ. उ. । ४. दिव्यौघसिद्धौघ-क. ग. उ. । ५. त्रिः समु-ख. ने. ज. झ. उ. । ६. 'भैरवाय' नास्ति-ने. ज. झ. उ. । ७. आज्ञया-ख. ने. झ. उ. । ८. 'तच्च द्रव्यं पुनः' नास्ति-ख. ने. ज. उ. ।
२९४ योगिनीहृदयम् [ पूजासंकेतः प्रसादग्रहणमाह— तदीयं शेषमादाय कोमाग्नौ विश्वतस्त्विषि । पादुकां मूलविद्यां च जपन् होमं समाचरेत् ॥१०५॥ तदीयं शेषं गुरुदेवतयोर्निवेदितं³ शेषं द्रव्यमादाय तत्त्वचतुष्टयशोधनमन्त्रैः “कामो देवः स⁴ काम्यत्वात्” (सौ० सु० ४।३) इत्यस्मदुक्तरीत्या विश्वघस्मर- ⁵कलाजाले कामेश्वराख्ये सर्वप्राणिष्वात्मन्यग्नौ⁶ । विश्वतस्त्विषि⁷ “विश्वग्रसन- शीलं तद्रूपं तेजोमयं ततः” इत्याज्ञावतारोक्तरीत्या विश्वघस्मरकलाजाले⁸ । पादुकां स्वगुरुश्रीपादुकाम्, मूलविद्यां सौभाग्य⁹विद्यां च जपन् । होमं भेदेन्धन- प्रक्षेपलक्षणं समाचरेत् । तदुक्तं श्रीपराक्रमे— निवेद्य१० मस्तकस्थाय गुरवेऽर्घ्यं तदाज्ञया । कल्पान्तहुतभुकल्पचिदग्नौ विश्वघस्मरे ॥ ११मेयराशिमयं हव्यं वासनात्मोपदर्शकम् । १२व्यतिषङ्गेण स जुह्वन् जपेदात्मानमामृशन् ॥ इति ॥१०५॥ इसके बाद स्वयं प्रसाद ग्रहण करे— गुरु और देवता को अर्पण करने के बाद उनके प्रसाद के रूप में सारे विश्व का ग्रास करने वाली कामाग्नि में गुरुपादुका और मूलविद्या का जप करते हुए आहुति दे ॥१०५॥ गुरु और देवता को अर्पित करने के बाद बचे हुए द्रव्य (अर्घ्य) की चार तत्त्वों का शोधन करने वाले मन्त्रों से शुद्धि कर विश्व का ग्रास करने में समर्थ कलाओं से संपन्न सभी प्राणियों में स्वात्मस्वरूप में विराजमान कामेश्वर रूपी अग्नि में उसकी आहुति दे। इस कामेश्वर का वर्णन हमने सौभाग्यसुभगोदय (४।३) में किया है। आज्ञावतार नामक ग्रन्थ में भी विश्व के ग्रास में समर्थ इस तेजोमय स्वरूप का वर्णन मिलता है। चारों तरफ से प्रकाशमान इस कामाग्नि में अपने गुरु की पादुका का और मूलमन्त्र (सौभाग्यविद्या) का जप करते हुए हवन करे, अर्थात् अपनी भेददृष्टि रूपी इन्धन को उस कामाग्नि में डाल कर स्वयं अद्वयतत्त्व में प्रतिष्ठित हो जाय। श्रीपराक्रम में बताया गया है— मस्तक में विराजमान गुरु को निवेदित करने के उपरान्त उसकी आज्ञा से विश्व का ग्रास करने में समर्थ कल्पान्त-कालीन अग्नि के समान प्रभास्वर चिदग्नि में मेयराशि के रूप में स्थित इस सारे जगत् को हवि मान कर और अपनी वासनाओं को चबैना १. शिवाग्नौ-ख. ने. च. छ. ज. झ. । २. स्थुषी-क. ग. । ३. तायाः पीतशेषं- ख. ने. झ. उ. । ४. प्रकाम्यमानत्वात्-मु. । ५. कीलाले-क. ग. । ६. णिस्वा- त्माग्नौ-ख. । ७. स्युषि-क. ग. । ८. कीलालजाले-क. ग. । ९. ग्यमूलवि-ख. ने. ज. झ. उ. । १०. निवेद्यामस्तकं स्वीयगुरोरर्घ्यं-ख. ने. ज. झ. उ. । ११. ज्ञेय-ख. ज. झ. उ. । १२. एतेषां गणशो जुह्वन्-ख. ज. झ. उ. ।
तृतीयः ] दीपिकाभाषानुवादसहितम् २९५ ननु कः कामाग्निः ? स कुत्र¹ वा निवसति ? किं वा हविरित्यत आह— महाप्रकाशे विश्वस्य संहारवमनोद्यते । मरीचिवृत्तीर्जुहुयान्मनसा कुण्डलीमुखे ॥१०६॥ कुण्डलीमुखे, व्यवस्थिते इति शेषः । अत्र श्रुतिः—"तस्याः शिखाया मध्ये परमात्मा व्यवस्थितः" (तै० आ० १०।११।१२) इति । महाप्रकाशे निरिन्धनदीप्ते निर्वाणरहिते प्रमातरि वह्नौ । विश्वस्य संहारवमनोद्यते । विश्वस्य शिवादि-² भूम्यन्तस्य, संहारे निजकारणतावन्मात्राऽवस्थितौ, वमने सर्जने चोद्यते । ³विश्वा- द्यैव शक्तिः । ⁴तदुक्तमाज्ञावतारे—"स्वेच्छयैव जगत्सर्वं निगिरत्युद्गिरत्यपि" इति । मनसा सार्धं मरीचिवृत्तीर्जुहुयात् । आन्तरस्य चिदनलस्य⁵ मरीचयोऽ- ⁶क्षाणि, ⁷बहिरर्थेषु तेषां ⁸सञ्चारा वृत्तयः । तदुक्तं विज्ञानभैरवभट्टारकैः—"यत्र⁹ यत्राक्षमार्गेण चैतन्यं व्यज्यते प्रभोः" (श्लो० ११४) इति । कोऽर्थः ? कुण्डलिन्याः मानकर उनकी बारी-बारी से आहुति देता हुआ अपने स्वात्मस्वरूप में प्रतिष्ठित हो जप करे ॥१०५॥ प्रश्न होता है कि यह कामाग्नि क्या है ? वह कहाँ रहती है ? और वह हवि कौन सी है, जिसकी कि आहुति देने की बात है, इन्हीं का अब विवरण देते हैं— कुण्डलिनी के मुख में व्यवस्थित महाप्रकाशरूपी वह्नि में, जो कि स्वेच्छा से संसार के संहार और सर्जन में लगी हुई है, मन के साथ सभी इन्द्रियों की वृत्तियों की आहुति दे दे ॥१०६॥ यह कामाग्नि कुण्डलिनी के मुंह में विराजमान है । यह तैत्तिरीयारण्यक श्रुति इसमें प्रमाण है—"उस कुण्डलिनी रूप कामाग्नि के मध्य में परमात्मा विराजमान हैं" । यह कामाग्नि महाप्रकाशमय है, बिना ही इन्धन के निरन्तर बिना बुझे जलती रहती है । यह प्रमातृस्वरूपिणी महाप्रकाशमयी वह्नि शिव से भूमि पर्यन्त समस्त संसार को कारणता मात्र रूप में अपने में छिपा लेती है और फिर वही कार्य के रूप में इसको अपने से बाहर निकाल देती है । यह शक्ति सारे विश्व की जननी है । आज्ञावतार नामक ग्रन्थ में बताया गया है—"अपनी इच्छा से ही यह सारे जगत् को निगलती और उगलती रहती है" । इसमें मन के साथ इन्द्रियों की वृत्तियों की आहुति दे । आन्तर चिदग्नि की किरणें इन्द्रियां हैं। बाह्य अर्थों की तरफ इनका संचार ही वृत्तियां कहलाती हैं। विज्ञानभैरव भट्टारक ने कहा है—"जहाँ जहाँ इन्द्रियों के प्रसार के कारण प्रभु का चैतन्य अभिव्यक्त होता १. कुत्र निवसन्ति-ख. ने. ज. झ. उ. । २. वादेर्भू-ख. ने. ज. झ. उ. । ३. शिवस्या- शैवेच्छा-क. ग. । ४. 'तदुक्तमाज्ञावतारे' नास्ति-ख. ज. झ. उ. । ५. चित्कलस्य- क. ग. । ६. अक्षनिबहः-ख. ने. झ. उ. । ७. 'बहिः' नास्ति-ख. ने. झ. उ. । ८. संवाहिकाः-ख. ने. ज. झ. उ. । ९. तत्र तत्रा-सार्वत्रिको दी० पाठः ।
२९६ योगिनीहृदयम् [ पूजासंकेतः शिखायां महाशून्ये व्यवस्थिते सर्वप्राणिष्वात्मनि प्रकाशलक्षणे कामाग्नौ "आत्मा मनसा संयुज्यते, मन इन्द्रियेण, इन्द्रियमर्थेन" (न्या० भा० १।१।४) इति तन्त्रा- न्तरोक्तरीत्या बहिरर्थेषु प्रसृतचिन्मरीचिरूपाक्षवृत्तिलक्षणं हविस्तेनैव मार्गेणान्त- र्मुखतया मनसा सह^१ जुहुयादित्यर्थः । तदुक्तं विज्ञानभैरवभट्टारकैः- महाशून्यालये वह्नौ भूताक्षविषयादिकम् । ^२हूयते मनसा सार्धं स^३ होमश्चेतनास्त्रुचा ॥ इति । (श्लो० १४६) ^४अयमेवान्तरो होमः । तदुक्तं पद्धतिषु- धर्माधर्महविर्दीप्ते आत्माग्नौ मनसा स्रुचा । सुषुम्नावर्त्मना नित्यमक्षवृत्तोजुंहोम्यहम् ॥ इति ॥१०६॥ है"^1 । इसका अभिप्राय यह है कि कुण्डलिनी की शिखा में, महाशून्य में विराजमान सभी प्राणियों में स्वात्मस्वरूप महाप्रकाश (कामात्मक) वह्नि में बाह्य विषयों के रूप में प्रसृत समस्त इन्द्रियों की वृत्तियों की आहुति दे दी जाती है । "आत्मा मन से, मन इन्द्रियों से और इन्द्रियाँ अर्थ से संयुक्त होती हैं" न्यायभाष्य की इस पद्धति से बाह्य विषयों की तरफ आकृष्ट चिन्मरीचिस्वरूप इन्द्रियों की वृत्तियों को ही आहुति माना गया है । यहाँ आहुति का तात्पर्य जिस पद्धति से ये बाहर आईं, उसी पद्धति से इनको अन्तर्मुख बनाकर उनको मन के साथ अपनी आत्मा को समर्पित कर देना है। विज्ञानभैरव भट्टारक का इस विषय में कहना है- महाशून्य स्थान में विराजमान चित्स्वरूपिणी वह्नि में अपनी चेतना की स्रुचा बना- कर मन के साथ पाँच महाभूतों, बाह्य इन्द्रियों और उनके विषयों की जो आहुति दी जाती है, वही वास्तविक होम है ॥ इसी को आन्तर होम कहा जाता है, जैसा कि ^2पद्धतियों में बताया गया है- धर्म और अधर्म रूपी आहुति से प्रज्वलित आत्मचिदग्नि में मन रूपी स्रुचा की सहा- यता से मैं अपने सुषुम्ना मार्ग को खोल कर अपनी इन्द्रियों की वृत्तियों की नित्य आहुति देता हूँ ॥१०६॥ १. 'सह' नास्ति-ख. ने. ज. झ. उ. । २. वातेन-ख. ने. ज. उ. । ३. महामहिम- शालिनि-ख. ने. उ. । ४. महामहिमशाली चाय-झ. ।
- विज्ञानभैरव का पूरा श्लोक और उसको व्याख्या हमारे भाषानुवाद में देखी जा सकती है ।
- यह श्लोक अनेक पद्धति-ग्रन्थों तथा तन्त्र-ग्रन्थों में भी मिलता है ।
तृतीयः ] दीपिकाभाषानुवादसहितम् २९७ आन्तरामेव पूर्णाहूतिमाह— अहन्तेदन्तयोरैक्यमुन्मन्यां१ स्रुचि कल्पितम् । मथनोद्रेकसम्भूतं वस्तुरूपं महाहविः ।।१०७।। हुत्वा हुत्वा स्वयं चैवं२ सहजानन्दविग्रहः । ३प्रदानैस्तर्पणैः सम्यग्वि शुद्धैरमृतात्मभिः । ४महाहन्तीकरोमीदं विश्वं हव्यवपुर्धरम्५ ।। (सु० वा० ३९) इत्यभियुक्तवचनोक्तरीत्या अहन्तेदन्तयोरैक्यम्, अहन्ता प्रमाता, इदन्ता प्रमेयम्, तयोरैक्यं प्रमाणम्, तत्त्रितयसामरस्यात्मकम्६ । विश्वक्षिप्तपदं७प्रमेयसुभगां ब्राह्मीं महावाग्भवे८ विश्वोत्तीर्णमहा९प्रकाशवपुषं शक्तिं च१० नैसर्गिकीम् । अब आन्तर पूर्णाहूति का विवरण देते हैं— मन्त्ररूपी अरणि के मथन के उद्रेक से उत्पन्न प्रमाता, प्रमेय और प्रमाण की सामरस्य वस्तुरूप महाहवि को उन्मनी नाम की स्रुचा में रखकर उसकी बार-बार आहुति दे और इस तरह से साधक सहजानन्द से परिपूर्ण हो जाय ।।१०७-१०८।। सुभगोदयवासना में शिवानन्द मुनि ने कहा है— भलीभांति शोधित होने से अमृतस्वरूप वस्तुओं के अर्पण और तर्पण से, हवि का स्वरूप धारण करने वाले इस सारे विश्व को मैं अपनी महाहन्ता में विलीन कर दे रहा हूँ ।। इसके अनुसार अहन्ता का अर्थ प्रमाता, इदन्ता का अर्थ प्रमेय और इनके ऐक्य का नाम प्रमाण होगा । इन तीनों की सामरस्य स्थिति का वर्णन किसी प्रामाणिक व्यक्ति ने इस तरह से किया है— महावाग्भव त्रिकोण में सृष्टिकर्त्री ब्राह्मी शक्ति के रूप में इस विश्वरूपी प्रमेय पदवी में प्रविष्ट होने वाली, विश्वोत्तीर्ण अवस्था में महाप्रकाश और उसकी स्वाभाविक विमर्श शक्ति के रूप में प्रमाता पदवी में स्थित रहने वाली, प्रमाण पदवी की तरफ बढ़ने पर १. मनीस्रु-ख. ने. च. छ. ज. झ. । २. चैव-च. छ. ज. झ. उ. । ३. नैदानैरिति सार्वत्रिको दी० पाठः । ४. मदहन्तां-क. ग., समाहन्तां-ख. ने. ज. झ. उ. । ५. पुरः- सरम्-क. ग. । ६. स्वरूपम्-ख. ने. ज. झ. उ. । ७. वर-ज. झ., लसत्-ख., बसत्-ने. ब. उ. । ८. वैभवैः-ख. ब. उ., भूसरैः-ज., भूभवैः-झ. । ९. प्रमातृ- वपुषः-ख. ने. ज. झ. ब. उ. । १०. तु-ख. ने. ज. झ. ब. उ. ।
२९८ योगिनीहृदयम् [ पूजासंकेतः प्रामाण्यं १प्रवणत्रिशक्तिखचिता २मध्युष्टचातुर्दशीं ३संवित्यर्कसमिद्धवस्तुभरितो मथ्नामि ४मन्त्रारणिम् ॥ इत्यभियुक्तवचनोक्तरीत्या मन्त्रारणिमथनोद्रेकसम्भूतं तत्त्रितयसमष्टि- रूपम्५। वस्तुरूपम्, वस्तु ६द्रव्यम्, तद्रूपम् । तदुक्तं मुख्याम्नायक्रमे—“स्वीकुर्यात् सततं वस्तु यदानन्दसुखं भवेत्” इति । महाहविः। यस्मिन् हुते स्वप्रमेयक्षणे हविषि प्रमातृलक्षणं ज्योति७रनवरतं प्रज्वलति, तन्महाहविः। पूर्णाहूतिहोमे८ उन्मन्यां स्रुचि कल्पितम्। उन्मनी नाम९ पूर्वोक्त(१।३४)लक्षणा, सा स्रुगिच्युते, तस्यां स्रुचि, तन्मयेनामृतेनापूर्य पूर्णाहूतिं जुहुयात् । एवंग्रूपं हविर्हुत्वा । आनन्दं ब्रह्मणो रूपं तच्च देहे१० प्रतिष्ठितम् । तस्याभिव्यञ्जकं द्रव्यं११ योगिभिस्तेन पीयते ॥ तीन शक्तियों का स्वरूप धारण करने वाली और फिर इन सबकी सामरस्यमयी तुरीया स्थिति में रहने वाली मन्त्ररूपी अरणि को मैं ज्ञानरूपी सूर्य के प्रकाश से परिपूर्ण हो मथता हूँ ॥ इसके अनुसार मन्त्र रूपी अरणि के मथन की चरम स्थिति में प्रमाता, प्रमेय और प्रमाण की समरस दशा का उन्मीलन होता है । मुख्याम्नायक्रम में इसी के लिये कहा गया है—“साधक उसी वस्तु का ग्रहण करे, जिससे ब्रह्मानन्द सहोदर सुख की उत्पत्ति हो”। इसी को महाहवि कहते हैं। प्रमेय स्वरूप हवि की आहुति दे देने पर प्रमातृ स्वरूप ज्योति ही निरन्तर जलती रहती है, अतः इसी को महाहवि कहा जाता है। यह पूर्णाहूति होम इसी आहुति से सम्पन्न होता है । इस आहुति को उन्मनी रूपी स्रुचा में रखकर दिया जाता है । उन्मनी का स्वरूप पहले (१।३४) बताया जा चुका है । इस उन्मनी रूप स्रुचा में ऊपर बताये गये सामरस्य समुद्भूत अमृत को भर कर पूर्णाहूति दे । इसकी आहुति देने के बाद— आनन्द ब्रह्म का ही स्वरूप है । यह आनन्द इसी शरीर में छिपा हुआ है । इसका अभिव्यंजक द्रव्य (मद्य) है । इसी लिये योगी इसका पान करते हैं ॥ १. प्रणयेन श-क. ने. ज. झ. ब. उ. । २. तां मध्ये तु-क. ग., मध्युष्टचान्तर्दिशो- ज. । ३. संवित्पाकसुसिद्ध-ब. उ. । ४. तन्त्रा-क. ग. झ. उ. । ५. 'रूपम्' नास्ति-ख. ज. । ६. मद्यम्-ख. ने. ज. झ. उ. । ७. निरन्तरं-ख. ने. ज. झ. उ. । ८. होमः-क. ग. ज. । ९. नाम समनोर्ध्वे निरस्तकालकलाक्रियादिका पू-क. ग. । १०. मोक्षे-ख. ने. ज. झ. उ. । ११. मद्यं-ने. ज. उ., हव्यं-ज. ।
तृतीयः ] दीपिकानुवादसहितम् २९९ इति प्रामाणिकवचनोक्तरीत्या यावदानन्दाविर्भावो भवति ^१तावदिति वीप्सार्थः । स्वयं चैव सहजानन्दविग्रहः । मद्याद्यनुभवेन कृत्रिमानन्दजृम्भणान्महा- नन्दानुसन्धानात् तन्मयो भवेदिति । तदुक्तं विज्ञानभैरवभट्टारकैः— जग्धिपानकृतोल्लासरसानन्दविजृम्भणात् । भावयेद् भरितावस्थां महानन्दस्ततो भवेत् ॥ इति । (वि० भै०, श्लो ७१) कोऽर्थः ? मन्त्रारणिमथनसंभूतमिदन्ताहन्तासामरस्य^२मयवस्तुरूपघृतपूर्णाहुतिं बहुशो हुत्वा परिस्फुरत्परमानन्दो भवेदित्यान्तरपूर्णाहुतिः ॥१०७-१०८॥ अत एव— प्रविष्टेऽन्तः सीधुरसे भेदनिर्हरणात्मके । स्थैर्यमेति चमत्कारो विना विषयसंगतिम्^३ ॥ किसी ^१प्रामाणिक व्यक्ति के इस वचन के अनुसार जब तक आनन्द की अभिव्यक्ति न हो जाय, तब तक यह पूर्णाहुति बार-बार दी जाती है। ऐसा करने से साधक सहज आनन्द से परिपूर्ण हो जाता है। मद्य आदि के सेवन से कृत्रिम आनन्द अभिव्यक्त होता है। इसमें महानन्द का अनुसन्धान करने पर योगी महानन्द से परिपूर्ण हो जाता है। विज्ञानभैरव भट्टारक की यह उक्ति इसमें प्रमाण है— जग्धि और पान के कारण अभिव्यक्त उल्लास, रस और आनन्द की स्थिति से साधक अपनी आत्मा को परिपूर्ण समझे । इससे उसमें ब्रह्मानन्द सहोदर महानन्द अभि- व्यक्त हो उठता है ॥ इसका भाव यह है कि मन्त्रारणि का मथन करने से इदन्ता और अहन्ता के सामरस्य स्वरूप जिस द्रव्य की उत्पत्ति होती है, उसी से यह पूर्णाहुति बार-बार दी जाती है। योगी ऐसा करते समय जब परमानन्द से परिपूर्ण हो जाता है, तो समझना चाहिये कि यह आन्तर पूर्णाहुति परिपूर्ण हो गई ॥१०७-१०८॥ इसी लिये—"भेददृष्टि को दूर भगा देने वाले सीधुरस के भीतर प्रवेश करने के साथ ही विषयों का सम्पर्क हुए बिना ही चमत्कार, अर्थात् सहजानन्द स्थिर हो जाता १. 'तावदिति''''भवेदिति' एष पाठः केवलं झ. मातृकायां दृश्यते । २. रस्यरूपं मद्यरूपं घृत-क. ग. ने. । ३. संगमात्-ख. ने. ज. झ. उ. । १. यह श्लोक कुलार्णवतन्त्र (५।८०) में भी मिलता है, किन्तु दीपिकाकार इसको भी प्रामाणिक वचन मानते हैं। बौद्ध तान्त्रिक विद्वान् अद्वयवज्र इसके पूर्वार्ध को वेदान्त- वादी का वचन कह कर उद्धृत करते हैं। देखिये—अद्वयवज्रसंग्रह, पृ० २९, तत्त्वप्रकाश के टीकाकार कुमार (पृ० ९) भी इसको श्रुतिवचन मानते हैं।
३०० योगिनीहृदयम् [ पूजासंकेतः इति क्रमोदयोक्तरीत्या 'मनसि स्थिरीभूते बाह्यचक्रार्चनं कुर्यादित्याह- स्वप्रथाप्रसराकारं श्रीचक्रं पूजयेत् सुधीः ॥१०८॥ सुधीः सीधुरसपानेनानन्यविषयासक्तः २स्वसंविन्मात्रस्थिरमनाः। मनसि स्थिरे सति धारणा स्थिरा, तस्यां स्थिरायां "तत्र प्रत्ययैकतानता ध्यानम्" (३।२) इति योगपातञ्जलशास्त्रोक्तरीत्या४ प्रत्ययैकतानतालक्षणं ध्यानं भवति। विना ध्यानं पूजा निष्फला भवति। अथादावमृतीकृतमासवं शिवादिभ्यो गुरुभ्यो५ निवेद्य स्वात्माग्नौ हुत्वा प्रज्वलत्परमानन्दस्थिरधीर्भूयादित्यर्थः। ६स्वप्रथाप्रसरा- कारः स्वप्रथा स्वसंवित् तस्या बहिरर्थेष्विन्द्रियद्वारा प्रसरो व्यापारः, ७तदात्मना स्फुरणम्। ततस्तदाकारं श्रीचक्रं पूजयेत्। श्रीचक्रं८ नाम नान्यत् किञ्चित्, अपि तु स्वसंविद्देवतायाः प्रसररूपाऽन्तःकरणचतुष्टयाव्यक्तमहदहङ्कृतितन्मात्रदशे- है" क्रमोदय के इस वचन के अनुसार मन के स्थिर हो जाने पर बाह्य चक्र की पूजा करे, इस विषय का अब यहाँ वर्णन किया जा रहा है— विद्वान् साधक मन के स्थिर हो जाने पर अपनी आन्तर संवित् के ही बाह्य आकार वाले श्रीचक्र की पूजा करे ॥१०८॥ सुधी शब्द का अर्थ यहाँ है—सीधु रस के पान से जिसका मन अन्य किसी बाहरी विषय में आसक्त नहीं है, अपने संवित्स्वरूप में जो प्रतिष्ठित हो गया है। मन के स्थिर होने से धारणा स्थिर हो जाती है और धारणा के स्थिर होने पर ध्यान भी स्थिर हो जाता है। पातंजल योगसूत्र में प्रत्यय की एकतानता का नाम ध्यान बताया गया है। बिना ध्यान के पूजा निष्फल होती है। इसी लिये पहले यहाँ अमृतीकृत आसव को शिव (भैरव), गुरु आदि को निवेदित कर अपनी कामाग्नि में भी उसकी आहुति दी जाती है। इससे परमानन्द की अभिव्यक्ति होती है और उसी में साधक का मन स्थिर हो जाता है। स्वप्रथा का अर्थ है अपनी संवित्, उसका इन्द्रिय मार्ग से जब बाहरी अर्थों में प्रसार होता है, व्यापार चलता है, तो विश्वाकार में यह संवित् बदल जाती है। श्रीचक्र इसी का परिणाम है। श्रीचक्र और कुछ नहीं है, किन्तु अपनी संविद् देवता ही बाहर फैलते समय अन्तःकरण-चतुष्टय, अव्यक्त, महत्, अहङ्कार, तन्मात्रा, ज्ञानेन्द्रिय, कर्मेन्द्रिय, इनकी वृत्तिय । १. मनःस्थैर्ये जायते चेच्चक्रा-ख. ने. ज. ड. । २. स्वप्रथा-क. ग. । ३. स्वयं चिन्मात्र-ख. ने. ज. ड. । ४. 'रीत्या' नास्ति-ख. ने. ज. झ. उ. । ५. भ्यः शिवाभ्यां च-क. ख. ग. । ६. स्वप्रत्रा-क. ग. । ७. तत आत्मनः-ख. ने. ज. झ. उ. । ८. 'श्रीचक्रं नाम' नास्ति-ख. ज. झ. उ. । Courtesy: Shri Tarun Dwivedi, Surviving Son of Late Vraj Vallabh Dvivediji (15 Jul 1926 - 17 Feb 2012)
तृतीयः ] दीपिकाभाषानुवादसहितम् ३०१ न्द्रिय१तद्वृत्तितद्विषयतत्पुर्यष्टकषोडशविकारधातुप्रपञ्च एव२ श्रीचक्रात्मना स्फुर३त्येतावत् ॥१०८॥ श्रीचक्रपूजामाह "गणेशम्" इत्यादिना "चक्रपूजां विधाय" (३।१६८) इत्यन्तेन— गणेशं दूतरौं चैव क्षेत्रेशं दूतिकां तथा। बाह्यद्वारे यजेद् देवि देवीश्च स्वस्तिकादिकाः ॥१०९॥ श्रीचक्रद्वारशाखयोर्गणेशं तच्छक्तिं दूतरों क्षेत्रेशं बटुकाख्यं तच्छक्तिं दूतिकां च यजेत्। तदुक्तं संकेतपद्धत्याम्— द्वैताद्वैतमहामोहशर्वरीक्षपणक्षमः। भास्वानिव जयत्येको गणेशो दूतरीयुतः॥ प्रतिभायाः परोल्लासो निशाकर इवापरः। दूतीयुक्तः स जयति बटुकस्ताण्डवान्वितः ॥ इति। बाह्यद्वारे श्रीचक्रद्वारबाह्यप्रदेशे, स्वस्तिकादिका४ देवीः सरस्वतीश्रीदुर्गाभद्र- काल्यश्चतस्रः। स्वस्तिका आदिर्यासामिति समासः। स्वाहाशुभङ्करीगौरोलोक- इनके विषय, पुर्यष्टक, सोलह विकार पर्यन्त इस समस्त विश्वप्रपंच का स्वरूप धारण कर कर लेती है और इसी का नाम श्रीचक्र है ॥१०८॥ अब यहाँ १०९ से १६८ पर्यन्त श्लोकों में श्रीचक्र की पूजाविधि बताई जा रही है— हे देवि ! श्रीचक्र के बाह्य द्वार पर गणेश, दूतरी, क्षेत्रेश तथा दूतिका और स्वस्तिका आदि देवियों की पूजा करें ॥१०९॥ श्रीचक्र के द्वार की दोनों तरफ गणेश और उसकी शक्ति दूतरी की तथा क्षेत्रेश (बटुक) और उसकी शक्ति दूतिका की पूजा करे। संकेतपद्धति में बताया गया है— द्वैत और अद्वैत की महामोह रूपी रात्रि के घने अन्धकार का, अज्ञान का नाश करने में एकमात्र गणेश ही अपनी शक्ति दूतरी के साथ सूर्य के समान समर्थ हैं। उनकी जय हो। प्रतिभा का जहाँ परम उत्कर्ष हुआ है, चन्द्रमा के समान जो आलोक से परि- पूर्ण हैं, ताण्डव नृत्य में रत, अपनी शक्ति दूती के साथ विराजमान बटुकभैरव की जय हो॥ श्रीचक्र के द्वार के बाहर स्वस्तिका, सरस्वती, श्री, दुर्गा और भद्रकाली तथा स्वाहा, शुभङ्करी, गौरी, लोकधात्री और वागीश्वरी इन पाँच पाँच देवियों की भगवती १. 'तद्वृत्ति' नास्ति-ख. ने. ज. झ. उ.। २. 'एव' नास्ति-ख. ज. उ.। ३. रतीत्येव-ख. ज. उ., रतीति-झ.। ४. काद्या देव्यः-ख. ने. ज. झ. उ.।
७२ योगिनीहृदयम् [ पूजासंकेतः धात्रीवागीश्वर्यश्च पञ्च। एतास्ताश्च देवीर्गायिका यजेत्। तत्प्रसिद्धं पद्धतिषु ॥१०९॥ ततश्चान्तस्त्रिकोणेऽपि गुरुपङ्क्तिं त्रिधा स्थिताम्। ततस्तस्य श्रीचक्रस्य अन्तस्त्रिकोणे त्रिधा स्थितां दिव्यसिद्धमानवौघत्रयवतीं गुरुपङ्क्तिं शिवादिस्वगुरुपर्यन्तानां गुरूणां पङ्क्तिः परम्परा ताम्। अपिशब्दाद् यजेदित्यनुषङ्गः। गुरुपरम्परा गुरुमुखादेव ज्ञातव्या, न लोकतः। न च पुस्तके१ लिखिता, अत्यन्तरहस्यत्वात् ॥ तदन्तश्च महादेवीं तामावाह्य यजेत् पुनः ॥११०॥ महापद्मवनान्तस्थां कारणानन्दविग्रहाम्। मदङ्कोपाश्रयां देवीमिच्छाकामफलप्रदाम् ॥१११॥ भवतीं तदन्तः श्रीचक्रस्य ३मध्ये बैन्दवाख्ये चक्रे। तां महापद्मवनान्तस्थाम् 'महा- पद्मवनान्तस्थे वाग्भवे गुरुपादुकाम्' (३।५) इत्यत्रोपपादितरूपाम्४। अकुला- त्रिपुरसुन्दरी की गायिकाओं के रूप में पूजा करे। यह सारा विषय पद्धति-ग्रन्थों में प्रसिद्ध है ॥१०९॥ तब श्रीचक्र के मध्यत्रिकोण में त्रिधा स्थित गुरुपंक्ति की पूजा करे ॥ इसके बाद श्रीचक्र के अन्दर बीच में विद्यमान त्रिकोण में दिव्य, सिद्ध और मान- वौघ के क्रम से तीन भागों में विभक्त गुरुपंक्ति की, शिव से लेकर अपने गुरु तक चली आई गुरुपरम्परा की भी पूजा करे। त्रिधा विभक्त इस गुरुपरम्परा का ज्ञान अपने गुरु के मुँह से ही प्राप्त करना चाहिये। लौकिक परम्परा से इसका ज्ञान नहीं हो सकता। यह परम्परा अत्यन्त गोपनीय होने से १पुस्तक में भी नहीं लिखी जाती ॥ उस त्रिकोण रूपी महापद्मवन में विराजमान, कारणानन्द शरीरवाली इच्छा- नुसार सभी कामनाओं को पूरा करने वाली, मेरे अंक में विराजमान महादेवी त्रिपुरसुन्दरी का आवाहन कर पूजन करे ॥११०-११२॥ 'महापद्मवनान्तस्थ' पद की व्याख्या पहले (३।५) की जा चुकी है। तदनुसार श्रीचक्र के मध्य में स्थित त्रिकोणान्तर्गत बैन्दव चक्र में विद्यमान अकुल नाम का अधोमुख १. केषु-झ.। २. श्रितां-क. ग.। ३. श्रीचक्रमध्यबैन्द-ख. ने. ज. झ. उ.। ४. रूपकुलाधोमुखसहस्रदलकमलमहापद्मवनमध्यस्थाम्-ख. ने. ज. झ उ.। १. हादि और कादि विद्या की दिव्यौघ, सिद्धौघ और मानवौघ गुरुपरम्परा ऋजु- विमर्शिनी (पृ० २१८-२२४), अर्थरत्नावली (पृ० २१८-२२५), ज्ञानदीपविमर्शिनी (दीक्षा प्रकरण) और सौभाग्यसुभगोदय (पृ० ३१८-३२०) में देखी जा सकती है।
तृतीयः ] दीपिकाभाषानुवादसहितम् ३०३ धोमुखसहस्रदलं कमलं महापद्मवनम् । मदङ्कोपाश्रयाम् अनाश्रितस्य^१ स्वप्रकाशा- त्मनो ममाऽङ्कस्थाम् । कारणानन्दविग्रहाम् । कारणं नाम^२ हेतुद्रव्यम् । अत्रैव वक्ष्यति—"क्षेत्राणां पतये मह्यं बलिं कुर्वीत हेतुना" (३।१९९) इति । द्रव्यपानेन तेन य आनन्दः, स एव विग्रह आकारो यस्यास्ताम् । कोऽर्थः ? शोधितामृतीभूत- द्रव्यपानपरिस्फुरत्परमानन्दमात्रशरीरामित्यर्थः । भवतीम् अनाश्रितां [मम^३ देवीं विमर्शात्मिकाम् । इच्छाकामफलप्रदाम् इच्छया यत् काम्यते फल^४ तस्य सर्वस्य दात्रीम् । महापद्मवनान्तस्थे कारणानन्दविग्रहे । सर्वभूतहिते मातरेह्येहि परमेश्वरि ॥ इति मन्त्रेण आवाह्य यजेत् । ननु महापद्मवनान्तस्थामित्यनेनैवानाश्रितो देवोऽनाश्रिता देवी चाऽत्र चक्रे समावाह्य कामेश्वरीकामेश्वररूपेण पूज्याविति कथमवसीयत इति चेदुच्यते— महापद्मवनान्तस्थः सकलागमशास्त्राणां वक्ता देवोऽप्यनाश्रित एव, तच्छक्ति- रनाश्रिताऽत एव । अन्यथा महापद्मवनान्तस्थां मदङ्कोपाश्रयां भवतीमिति वचनं सहस्रदल कमल महापद्मवन कहलाता है । यह देवी उसमें विराजमान है । यह देवी अना- श्रित स्वप्रकाशमय शिवस्वरूप की, अर्थात् मेरी, गोद में बैठी हुई है । कारण हेतु-द्रव्य को कहते हैं । यहीं आगे (३।१९९) क्षेत्रपाल को बलि देने के प्रसंग में इस अर्थ में हेतु शब्द का प्रयोग हुआ है । कारण द्रव्य के पान से जो आनन्द उच्छलित होता है, वही उस शक्ति का स्वरूप है । इसका अभिप्राय यह है कि शोधन के कारण अमृतस्वरूप हुए द्रव्य के पान से उच्छलित आनन्द मात्र ही उस देवी का शरीर है । वह देवी दूसरी कोई नहीं है, स्वयं इस शास्त्र का श्रवण करने वाली तुम ही हो । अनाश्रित स्वरूप मेरी विमर्शात्मिका अनाश्रिता शक्ति तुम ही हो । साधक अपनी इच्छानुसार जिस फल की कामना करता है, वह भगवती उसे सब कुछ देती है । उसका 'महापद्म' इत्यादि मन्त्र से आवाहन कर पूजन करे । इस मन्त्र का अर्थ है— महापद्मवन में स्थित, करणानन्द स्वरूपिणी, सब प्राणियों का कल्याण करने वाली हे परमेश्वरि माता ! आओ आओ ॥ यहाँ प्रश्न उठता है कि 'महापद्मवनान्तस्थाम्' इस पद से अनाश्रित देव और अना- श्रिता देवी का यहाँ आवाहन कर कामेश्वर और कामेश्वरी के रूप में पूजन किया जाता है, इसका निर्णय कैसे होगा ? इसका उत्तर यह है कि महापद्मवन में बैठकर समस्त शास्त्रों का उपदेश करने वाले भगवान् अनाश्रित ही हैं । इसीलिये उनकी शक्ति अना- १. तस्येश्वरस्य-ख. ने. ज. उ. । २. 'नाम' नास्ति-ख. ने. ज. झ. उ. । ३. 'मम' नास्ति-झ., 'मम''''सर्वावयवभूषणः' नास्ति-ख. ने. ज. उ. । ४. तत्फलं-क. ग., फलं स्वसेवकेन-झ. ।
३०४ योगिनीहृदयम् [ पूजासंकेतः कथं घटते ? सदाशिवादीनां तु यद्यप्यागमशास्त्रवक्तृत्वमस्ति, तथापि महा- पद्मवनान्तस्थत्वं नास्ति। तदुक्तं स्वच्छन्दसंग्रहे— अनाश्रितस्य मध्यस्थं व्योमपद्मं सुविस्तरम्। असंख्ययोजनायामं तत्र सिंहासनस्थितः १॥ सूर्यकोट्यर्बुदप्रख्यः शशाङ्ककृतशेखरः। पञ्चवक्त्रो दशभुजस्त्रिपञ्चनयनः प्रभुः॥ सर्वावयवसम्पूर्णो ब्रह्ममूर्तिः २ सनातनः। सर्वज्ञः सर्वकर्ता च सर्वानुग्रहणे रतः॥ सर्वरत्नसमाकीर्णः सर्वा ३वयवभूषणः।] अनाश्रितकला देवो ४तस्योत्सङ्गे सदा स्थिता॥ पञ्चवक्त्रा त्रिनेत्रा च दशबाहीन्दुशेखरा। व्यापिन्यादिचतुष्कं च तादृशं परिकीर्तितम्॥ पूर्वा ५द्युत्तरपर्यन्तं ६दिग्गतैः सेवकैः शिवः। रुद्रकोट्यर्बुदानीकैः ७स्वसारूप्यैःस्वशक्तिभिः॥ श्रिता कहलाती है। अन्यथा 'महापद्मवनान्तस्था मदङ्गोपाश्रया भवती' इन विशेषणों की संगति नहीं बैठेगी। सदाशिव आदि को भी यद्यपि शास्त्र का प्रवक्ता माना गया है, तथापि इनका निवास महापद्मवन में नहीं है। स्वच्छन्दसंग्रह में इस विषय का विशद वर्णन किया गया है— अनाश्रित लोक के बीच में असंख्य योजन विस्तार वाला विशाल व्योमपद्म है। वहाँ सिंहासन पर विराजमान, अरबों-करोड़ों सूर्यों के समान कान्ति वाले, शशांकशेखर, पाँच मुंह, दस भुजा और पन्द्रह नेत्रों वाले भगवान् अनाश्रित शिव विराजमान हैं। यह देव सभी अवयवों से परिपूर्ण सनातन ब्रह्मा हैं, सर्वज्ञ और सर्वकर्ता हैं, सदा सब पर अनु- ग्रह करते रहते हैं। इनका शरीर नाना प्रकार के रत्नों और आभूषणों से सुशोभित है। इनकी गोद में सदा अनाश्रित कला विराजमान रहती है। यह भी पाँच मुख, तीन नेत्र और दस बाहु वाली है। इनके भी ललाट में चन्द्रमा शोभित है। ऐसे ही स्वरूप वाली व्यापिनी १ आदि चार शक्तियाँ पूर्व आदि दिशाओं में विद्यमान हैं। इन्हीं दिशाओं में विद्यमान समान रूपवाले लोकनाथों, सेवकों, करोड़ों-अरबों की संख्या वाली सेनाओं और १. इतः परम्-'अनाश्रितस्येश्वरस्य मध्यस्थः परमेश्वरः' इत्यधिकः पाठः-झ.। २. बृहन्मूर्तिः-झ.। ३. भरणभूषितः-झ.। ४. तदुत्सङ्गे-ख. ने. ज. उ.। ५. दुत्तर- क. ग.। ६. निर्याता सेविका शिवा-ख. ने. ज. उ.। ७. स्वस्वरूपस्व-झ.। १. पहले (पृ० ४७-४८) व्यापिनी की मध्य में तथा सूक्ष्मा आदि चार शक्तियों की चार दिशाओं में स्थिति बताई गई है। व्यापिनी के साथ उन्हीं चार शक्तियों का उल्लेख यहाँ भी किया गया है।
तृतीयः ] दीपिकाभाषानुवादसहितम् ३०५ सेवितो१ लोकनाथैस्तैः२ सृष्ट्यादीनि करोति सः३। अनाश्रितोऽयं भगवान् पञ्चवक्त्रस्त्रिदृक् तथा॥ दशबाहुश्चतुर्बाहुर्द्विबाहुश्चैकवक्त्रकः४। "कौलागमादिवक्ताऽसौ देवदेवः सदाशिवः॥ परापरविभागेन प्रोवाचासंख्यमागमम्। इति। उत्तरपदेऽप्युक्तम्— व्योमाम्बुजे सहस्रारे सितकेसरसंकुले। तत्रासीनं महादेवमपृच्छत् कुलनायिका॥ (१११) इति ॥११०-११२॥ तन्मयैरेव नैवेद्यादिभिरर्चयेत्। भवतीम् इत्यत्राप्यन्वेति। भवतीं स्वसंविल्लक्षणाम्। त्वन्मयैरेव पञ्चभूतमयं विश्वं तन्मयी सा सदाऽनघे। तन्मयी मूलविद्या च तत्तथा कथयामि ते॥ (२।२८) अपनी शक्तियों से सेवित यह अनाश्रित भगवान् शिव सृष्टि आदि कार्यों को सम्पन्न करते हैं। इनके पाँच मुँह, तीन नेत्र हैं। यह स्वरूप दस हाथ वाला, चार हाथ वाला, दो हाथ वाला और एक मुँह वाला भी है। यही देवदेव सदाशिव का स्वरूप धारण कर कौल आदि आगमों के तथा पर और अपर विभाग वाले अन्य असंख्य आगमों के प्रवक्ता हैं॥ १उत्तरपद में भी कहा गया है— श्वेत केसर से संकुल सहस्रार व्योमाम्बुज (अकुल पद्म) में विराजमान महादेव से कुलनायिका भगवती ने पूछा ॥११०-११२॥ यह पूजा संविच्छक्तिस्वरूपिणी आप भगवती के विस्फार से निष्पन्न नैवेद्य आदि से की जानी चाहिये॥ ऊपर के सन्दर्भ में आया 'भवतीम्' शब्द भी यहाँ गृहीत होता है। स्वसंवित्- स्वरूपिणी आप भगवती की पूजा आपकी इच्छा से निर्मित नैवेद्य आदि से की जानी चाहिये। पहले (२।२८) बताया गया है— १. सेविता-ख. ने. ज. उ. । २. पालैश्च-झ. । ३. सा-ख. ज. झ. । ४. बाहुकः— क. विहाय सार्वत्रिकः पाठः । ५ लोका-क. ग. । १. यहाँ उत्तरपद के नाम से उद्धृत वचन उत्तरषट्क नामक ग्रन्थ का प्रथम श्लोक है। शिवानन्द और विद्यानन्द (पृ० १०,७०, २३१, २७०) ने उत्तरषट्क के नाम से ही इस ग्रन्थ को उद्धृत किया है। लघुस्तव के जैन टीकाकार सोमतिलक सूरि भी इस ग्रन्थ को इसी नाम से स्मरण करते हैं। मद्रास और त्रिवेन्द्रम् में कुलदीपिका टीका के साथ प्रकाशित 'षडन्वय महारत्न' नाम से यह उपलब्ध है। २०
३०६ योगिनीहृदयम् [ पूजासंकेतः इति पूर्वोक्तरीत्या $^१$पञ्चभूतानि भवदिच्छाविजृम्भितानि त्वद्रूपाणि, $^२$पञ्चरूपिणमात्मानं दिव्यैः पञ्चोपचारकैः । $^३$अर्चयेत् सह गन्धेन पृथिवीं कुसुमेन खम् ॥ धूपेन वायुं दीपेन तेजोऽन्नेन रसं पुनः । इति प्रामाणिकवचनोक्तरीत्या $^४$तैरेव नैवेद्यादिभिरर्चयेत्। नैवेद्यादिभिरित्यादि- पदेन गन्धपुष्पधूपदीपनैवेद्यानि गृह्यन्ते । सुगन्धवत्पदार्थानुभवेन प्रत्यङ्मुखतया प्रमातरि विश्रान्तिर्गन्धसमर्पणम् । $^५$सुशब्दवत्पदार्थानुभवेन प्रत्यङ्मुखतया प्रमा- तरि विश्रान्तिः पुष्पसमर्पणम् । $^६$सुस्पर्शवत्पदार्थानुभवेन प्रत्यङ्मुखतया प्रमातरि विश्रान्तिर्धूपसमर्पणम् । सुरूपवत्पदार्थानुभवेन प्रत्यङ्मुखतया प्रमातरि विश्रान्ति- यह विश्व पंचभूतमय है । हे अनघे ! यह परा देवता भी पंचभूतमयी है और यह मूलविद्या परादेवता और पंचभूत दोनों का बोध जिस तरह से कराती है, अब मैं उसका वर्णन कर रहा हूँ ॥ इस तरह पंचभूत की उत्पत्ति भगवती की इच्छा से ही होती है, अतः ये सब भग- वती के स्वरूप हैं। किसी प्रामाणिक व्यक्ति ने कहा है— पंचमहाभूत से उत्पन्न इस देह में विराजमान स्वात्मस्वरूप की दिव्य पंचोपचार से पूजा करे। गन्ध के साथ पृथिवी को, पुष्प के साथ आकाश को, धूप के साथ वायु को, दीप के साथ तेज को और अन्न (नैवेद्य) के साथ रस को समर्पित किया जाता है ॥ इसके अनुसार भगवतीस्वरूप इन पाँच महाभूतों को ही यहाँ नैवेद्य आदि के रूप में समर्पित करे । आदि पद से नैवेद्य के साथ गन्ध, पुष्प धूप, दीप का ग्रहण होता है । सुगन्धित पदार्थों का अनुभव करके उनको अपने भीतर के प्रमाता को समर्पित कर देना गन्धसमर्पण है । सुन्दर शब्द से परिपूर्ण गान आदि का अनुभव कर उसको अपने भीतर के प्रमाता को समर्पित कर देना पुष्पसमर्पण है । सुन्दर सुकोमल स्पर्श से परिपूर्ण पदार्थों का अनुभव कर उसको अपने भीतर के प्रमाता को समर्पित कर देना धूपसमर्पण है । सुन्दर स्वरूप वाले पदार्थों का अनुभव कर उनको अपने भीतर के प्रमाता को समर्पित कर देना दीपसमर्पण है । स्वादु रस से परिपूर्ण पदार्थों का अनुभव कर उनको अपने भीतर के प्रमाता को समर्पित कर देना नैवेद्यसमर्पण है । इसका अभिप्राय यह है कि जो इन्द्रियाँ प्रायः पराङ्मुख (बाहर की तरफ) दौड़ती हैं, उनको प्रत्यङ्मुख (भीतर १. 'पञ्च....त्वद्रूपाणि' इत्यस्य स्थाने 'पञ्चोपचारैरर्चयेत्' इति पाठः-ख. ने. ज. उ. । २. नास्त्येषा पङ्क्तिः-ख. ने. ज. उ. । ३. अर्चं-ने. ज. झ. । ४. 'तैरेव....गृह्यन्ते' इत्यस्य स्थाने 'नैवेद्यायागं चरेत् । कोऽर्थः' इति पाठः-ख. ने. ज. झ. उ. । ५. तन्त्र्यात्म- शब्दानु-ख. ने. ज. झ. उ. । ६. 'सु' नास्ति-ख. ने. ज. झ. उ. ।
तृतीयः ] दीपिकाभाषानुवादसहितम् ३०७ दीपसमर्पणम् । स्वादु¹रसवत्पदार्थानुभवेन प्रत्यङ्मुखतया प्रमातरि विश्रान्तिर्नैवेद्य- समर्पणमित्यर्थः । तदुक्तं मुख्याम्नायरहस्ये— इन्द्रियद्वार²संग्राह्यैर्गन्धाद्यैः स्वात्मदेवता । ³स्वभावेन समाराध्या ज्ञातुः सोऽयं महामखः ॥ इति । बहिरपि गन्धपुष्पधूपदीपनैवेद्यानि ⁴पृथिव्याकाशवायुतेजःसलिलभावनया देव्यै समर्पयेदि⁵त्युपचारोपनिषत् ॥११२॥ त्रिकोणे तत्स्फुरत्तायाः प्रतिबिम्बाकृतीः पुनः ।।११२।। तत्तत्तिथिमयोर्नित्याः काम्यकर्मानुरूपिणीः⁶ । त्रिकोणे श्रीचक्रस्य त्रिकोणे⁷ रेखात्रये, तत्स्फुरत्तायाः प्रतिबिम्बाकृतीः, "गुणाः पञ्चदश प्रोक्ता भूतानां तन्मयी शिवा" (२।३०) इत्यत्रैव पूर्वोक्तरीत्या भूतगुणात्मिकायाः पञ्चदशाक्षरशरीरिण्याः⁸ श्रीविद्यायास्तत्र⁹ स्फुरणात् पञ्च- दशप्रतिबिम्बरूपाः, तत्तत्तिथिमयीः तत्संख्याकप्रतिपदादितिथ्यात्मिकाः, काम्य- की तरफ) बना देना ही आन्तर पंचोपचार पूजा है । मुख्याम्नायरहस्य² नामक ग्रन्थ में बताया गया है— इन्द्रियों के द्वारा जिनका संग्रह किया जाता है, उन गन्ध आदि से स्वात्मदेवता की स्वाभाविक पूजा करनी चाहिये । यही योगी साधक का महान् यज्ञ है ॥ बाह्य पूजा में भी गन्ध, पुष्प, धूप, दीप और नैवेद्य का देवी को समर्पण पृथिवी, आकाश, वायु, तेज और जल की भावना के साथ ही करना चाहिये । पंचोपचार पूजा का यही रहस्य है ॥११२॥ त्रिकोण में श्रीविद्या के पन्द्रह अक्षरों की प्रतिबिम्ब-स्वरूपिणी पन्द्रह तिथि- नित्याओं का पूजन कामना के अनुसार करे ॥११२-११३॥ श्रीचक्र के मध्यत्रिकोण की तीन रेखाओं में पन्द्रह तिथिनित्याओं का पूजन करे । पहले (२।३०) बताया गया है—"पाँच भूतों के पन्द्रह गुण होते हैं । अतः पंचभूतमयी यह विद्या भी पन्द्रह अक्षरों वाली है" । तदनुसार भूतगुणात्मिका पंचदशाक्षरी विद्या इस त्रिकोण में प्रतिबिम्बित होकर पन्द्रह तिथिनित्याओं का स्वरूप धारण कर लेती है । १. स्वादूषदंशवत्-ख. ने. ज. झ. उ. । २. ग्राम-क. ख. ग. । ३. स्वाभेदेन- क. ग. । ४. पृथिवीवाय्वाकाशतेजः-ख. ने. ज. झ. । ५. दित्युपनि-ख. ने. ज. झ. उ. । ६. सारिणीः-क. ख. ग. ने. । ७. णरे-झ. उ. । ८. शालिन्याः-ख. ने. ज. झ. उ. । ९. 'तत्र' नास्ति-ख. ने. ज. उ. । १. पृ० २३० की टिप्पणी देखिये ।
३०८ योगिनीहृदयम् [ पूजासंकेतः कर्मानुरूपिणोः१ "नवचक्रक्रमो२ योऽसौ महावश्यादिसिद्धिदः" इति संकेत- पद्धत्युक्तरीत्या बाह्यचक्रार्चनं काम्यं कर्म, तदनुरूपकरचरणादिमद्रूपधारिणीः३ । उत्पत्तिविनाशरहितत्वान्नित्याः, ततः कामेश्वरी नित्या नित्या च भगमालिनी । नित्यक्लिन्नाऽपि४ च तथा भेरुण्डा वह्निवासिनी ॥ महाविद्येश्वरी दूती त्वरिता कुलसुन्दरी । नित्या नीलपताका च विजया सर्वमङ्गला ॥ ज्वालामालिनी५ चित्रा चेत्येवं नित्यास्तु षोडश । (१।२६-२८) इति चतुःशतीशास्त्रोक्ताः । पुनः शब्दादर्चयेदित्यनुषङ्गः ॥११२-११३॥ तत्र प्रकटयोगिन्यश्चक्रे त्रैलोक्यमोहने ॥११३॥ तत्र श्रीचक्रे। त्रैलोक्यमोहने चक्रे पूर्वोक्त(१।८२)निर्वचने चतुरस्रत्रय- इसका भाव यह है कि इस त्रिकोण में श्रीविद्या के पन्द्रह अक्षर प्रतिबिम्बित होते हैं और वे ही प्रतिपत् आदि पन्द्रह तिथिनित्याओं का स्वरूप धारण कर लेते हैं। इनकी पूजा विभिन्न कामनाओं की पूर्ति के लिये की जाती है। संकेतपद्धति में बताया गया है— “यह जो नवचक्र का क्रम बताया गया है, वह महावश्यादि सिद्धियों का देने वाला है”। बाह्य चक्र की पूजा एक प्रकार का काम्य कर्म है। यह भगवती उस काम्य कर्म की सिद्धि के लिये तदनुरूप कर-चरण आदि से संयुक्त स्वरूप धारण कर लेती है। ये सब स्वरूप 'नित्या' के नाम से इस लिये कहे जाते हैं कि ये सब उत्पत्ति और विनाश से रहित हैं। चतुःशती शास्त्र में इन पन्द्रह नित्याओं के नाम गिनाये गये हैं— कामेश्वरी नित्या, भगमालिनी नित्या, नित्यक्लिन्ना, भेरुण्डा, वह्निवासिनी, महा- विद्येश्वरी, दूती, त्वरिता, कुलसुन्दरी, नित्या, नीलपताका, विजया, सर्वमङ्गला, ज्वाला- मालिनी और चित्रा। महात्रिपुरसुन्दरी को मिलाने से इनकी संख्या सोलह होती है ॥ श्लोक में पुनः शब्द आया है। इससे 'अर्चयेत्' क्रिया का अध्याहार किया जाता है। इसका अभिप्राय यह होगा कि त्रिकोण में पन्द्रह तिथिनित्याओं का पूजन अपनी कामना की पूर्ति के लिये करे ॥११२-११३॥ उस श्रीचक्र में स्थित त्रैलोक्यमोहन नामक चक्र में प्रकट योगिनियों का पूजन करे ॥११३॥ उस श्रीचक्र में स्थित त्रैलोक्यमाहन चक्र में, जिसका कि निर्वचन पहले (१।८२) बताया जा चुका है, तीन चतुरस्र के लेखन से सम्पन्न होने वाले उस चक्र में प्रकट १. सारिणीः-क. ख. ग. ने. । २. मयो-ख. झ. । ३. धारिण्यः-ख. ने. ज. झ. उ. । ४. भिधा नित्या-म. । ५. लिनिका चित्रेत्येवं-ख. ने. ज. झ. । Courtesy: Shri Tarun Dwivedi, Surviving Son of Late Vraj Vallabh Dvivediji (15 Jul 1926 - 17 Feb 2012)
तृतीयः ] दीपिकाभाषानुवादसहितम् ३०९ लक्षणे। प्रकटयोगिन्यः, यष्टव्या इत्युत्तरत्र¹ (१।११६) स्थितेनान्वयः ॥११३॥ प्रकटशब्दनिर्वचनमाह— मातृकास्थूलरूपत्वात् त्वगादिव्यापकत्वतः । योगिन्यः प्रकटा ज्ञेयाः स्थूलविश्वप्रधौत्मनि ॥११४॥ मातृकाः³ परापश्यन्तीमध्यमावैखर्यः, तासु स्थूलमकारादिक्षकारान्तं पञ्चा- शद्वर्णमयं वैखरीरूपम्। तदुक्तं स्वच्छन्दसंग्रहे—"स्थूलं पञ्चाशदाकारम्"⁴ इति। तद्रूपत्वात् मातृका⁵स्थूलरूपवैखरीवर्णवर्गाष्टकमयत्वात् सिद्धीनां ब्राह्म्या- दीनां च। तदुक्तं चतुःशत्याम्— वर्गानुक्रमयोगेन ⁶यस्यां मात्रष्टकं स्थितम्। वन्दे तामष्टवर्गोत्थमहासिद्ध्यष्टकेश्वरीम् ।। (१।११) इति । योगिनियों का पूजन करना चाहिये। ११६ व श्लोक में स्थित 'यष्टव्याः' पद का यहाँ भी अन्वय किया जाता है ॥११३॥ प्रकट शब्द का निर्वचन बताते हैं— मातृका का स्थूल स्वरूप इनका आधार है, त्वक् आदि धातुओं में ये व्याप्त हैं, अतः स्थूल विश्व को धारण करने वाले भूपुरयात्मक चक्र में स्थित ये योगिनियाँ प्रकट कहलाती हैं ॥११४॥ परा, पश्यन्ती, मध्यमा और वैखरी ये चार मातृकाएँ हैं। इनमें अकार से क्षकार पर्यन्त पचास वर्णों वाला वैखरी वाणी का आधार स्थूल माना जाता है। स्वच्छन्दसंग्रह में स्पष्ट बताया गया है—"पचास अक्षरों वाला यह आकार स्थूल है"। मातृका का यह स्थूल स्वरूप वैखरी वाणी के आठ वर्गों में विभक्त है और ब्राह्मी आदि सिद्धियां इन्हीं स्थूल वर्णों की अधिष्ठात्री देवियाँ हैं, अतः ये प्रकट योगिनियाँ कही जाती हैं। ¹चतुः- शती शास्त्र में कहा गया है— पूर्णाहन्ता स्वरूपिणी जिस देवी में वर्ग के क्रम से आठ ब्राह्मी प्रभृति मातृकाएँ स्थित हैं, आठ मातृका-वर्णों से उत्पन्न होने वाला आठ सिद्धियों की स्वामिनी उस महा- सिद्धिस्वरूपा भगवती की मैं वन्दना करता हूँ ॥ १. तरस्थि—ख. ने. ज. झ. उ. । २. प्रथा—ख. ने. ज. झ. उ. । ३. कायाः**** र्मात्मिकायाः स्थूल—ख. ने. ज. झ. उ. । ४. दक्षरम्—क. ग. । ५. 'स्थूलरूप' नास्ति— ख. ने. ज. उ. । ६. महासिद्धचष्टकं—क. ग. ।
- पृ० ९४ की टिप्पणी देखिये।
३१० योगिनीहृदयम् [ पूजासंकेतः त्वगादिव्यापकत्वतः त्वगसृङ्मांसमेदोऽस्थिमज्जाशुक्रौजस ¹आदिशब्देन गृह्यन्ते। तद्व्यापकत्वात् त्वगाधारभ्रूमध्य-रक्तनितम्ब-मांसनाभि-मेदोहृदय- अस्थिकण्ठ-मज्जास्य-शुक्रनासापुट-(क्रोध ? ओजो)ललाटचक्रेषु स्थितत्वाद् ब्राह्मया- दीनाम्। स्थूलविश्व²प्रधात्मनि (इति) स्थूलत्वकथनम्³। अत एव विश्वं प्रकर्षेण धत्त इति विश्वप्रधा⁴ विश्वम्भरा, तदात्मनि भूगृह⁵त्रयात्मके त्रैलोक्य- मोहने चक्रे स्थितत्वात्। मातृकास्थूलरूपत्वाद् ⁶वैखर्यवयवत्वाच्च त्वगादि- ये योगिनियाँ त्वक् आदि ¹आठ स्थूल धातुओं की भी स्वामिनियाँ हैं। आदि शब्द से असृग् (रक्त), मांस, मेदा, अस्थि, मज्जा, शुक्र और ओज का ग्रहण किया जाता है। त्वचा के आधार भ्रूमध्य में, रक्त के आधार नितम्ब में, मांस के आधार नाभि में, मेदा के आधार हृदय में, अस्थि के आधार कण्ठ में, मज्जा के आधार आस्य (मुँह) में, शुक्र के आधार नासापुट में और क्रोध (ओज) के आधार ललाट चक्र में क्रमशः ब्राह्मी आदि योगिनियाँ स्थित हैं। इस कारण से भी ये योगिनियाँ प्रकट कही जाती हैं। स्थूल विश्व का प्रथन करने वाली इन योगिनियों को स्थूल मानना इसलिये भी उचित है कि ये देवियाँ स्थूल विश्व को भलीभाँति ²धारण करने वाली विश्वम्भरा (पृथिवी) स्वरूप भूगृहत्रयात्मक त्रैलोक्यमोहन चक्र में स्थित हैं। इस तरह से मातृकाओं की स्थूलरूपता के कारण, वैखरी मातृका के स्थूल अवयवों के कारण, त्वग् आदि धातुओं के स्थूलशरीर की अवयवता को लेकर इन सबमें व्यापक रूप से रहने के कारण और त्रैलोक्यमोहन १. आदिना गृ-ख. ने. ज. झ. उ. । २. प्रथा-ख. ने. ज. झ. उ. । ३. नात्-क. ग. घ. । ४. प्रथा-ख. ने. ज. झ. उ. । ५. हात्मके-ख. ने. ज. उ. । ६. 'वैखर्य- वयवत्वाच्च' नास्ति-ख. ने. ज. झ. उ. ।
- यहाँ आठ धातुओं की चर्चा है और इनका संबन्ध आठ वर्गों की अधिष्ठात्री ब्राह्मी आदि आठ देवियों से बताया गया है, जो अणिमा आदि आठ सिद्धियों की अधिष्ठात्री हैं। अष्टम धातु के रूप में यहाँ क्रोध (ओज) की चर्चा है। सात्त्विक क्रोध को ही ओज कहा जा सकता है। तेजस्वी पुरुष का ओज कभी कभी क्रोध के रूप में भी प्रकट होता देखा गया है। प्रसंगवश यह अवधेय है कि आयुर्वेद के ग्रन्थों में प्रथम धातु के रूप में रस वर्णित है, त्वक् नहीं। पहले (२।६०-६१) छः धातुओं की जो चर्चा आई है, उनका संबन्ध छः डाकिनियों से है।
- यहाँ दीपिकाकार ने "विश्वं प्रकर्षेण धत्त इति विश्वप्रधा" इस तरह से प्रधा शब्द की व्युत्पत्ति दी है। तदनुसार दीपिका में सर्वत्र प्रथा शब्द के स्थान पर प्रधा शब्द होना चाहिये, किन्तु प्रस्तुत स्थल को छोड़ कर यह पाठ किसी भी मातृका में कहीं भी नहीं मिलता। यहाँ भी मूल ग्रन्थ की अनेक मातृकाओं में 'प्रथा' पाठ ही मिलता है।
तृतीयः ] दीपिकाभाषानुवादसहितम् ३११ धातूनां स्थूलशरीरावयवतया तद्व्यापकत्वात् त्रैलोक्यमोहनचक्रस्य स्थूलविश्वम्भरा- त्मकत्वाच्च १ तदन्तर्गताः सिद्धयो ब्राह्म्याद्याश्च प्रकटा ज्ञेया इत्यर्थः ॥११४॥ अन्त्यभूगृहनिवासिनीनां नामग्रहणपूर्वकं ध्यानमाह— अणिमाद्या महादेवि सिद्धयोऽष्टौ व्यवस्थिताः । तास्तु २ रक्ततरा वर्णैर्वराभयकरास्तथा ॥११५॥ धृतचिन्तामहारत्ना मनीषितफलप्रदाः । अणिमाद्याः "अणिमां पश्चिमद्वारे" (१।१५३) इत्यादि चतुःशती- शास्त्रोक्ताः । लघिमामहिमेशितावशिताप्राकाम्यभुक्तीच्छाप्राप्तिसर्वकामाख्याः ३ सिद्धयस्तत्रादिशब्देन गृह्यन्ते । अष्टौ व्यवस्थिता ४अष्टसिद्धयो निघण्टुप्रसिद्धाः । अत्र तु दशेति तात्पर्यम्— वामजङ्घां समारभ्य वामादिक्रमतोऽपि च । सिद्धयष्टकं न्यसेत् तेषु द्वयं पादतले न्यसेत् ॥ (३।७९-८०) चक्र की स्थूल विश्वम्भरात्मकता (पार्थिवता) के कारण भी इनमें रहने वाली सिद्धियाँ और ब्राह्मी प्रभृति देवियाँ प्रकट योगिनियाँ कही जाती हैं ॥११४॥ अन्तिम भूगृह में रहने वाली शक्तियों के नाम और ध्यान इस प्रकार हैं— हे महादेवि ! अणिमा आदि १आठ सिद्धियाँ यहाँ स्थित हैं। इनका वर्ण चटक लाल है। वर और अभय मुद्रा में ये स्थित हैं। चिन्तामणि नामक महारत्न इनके पास है, जिससे कि ये साधक को अभीष्ट फल प्रदान करती हैं ॥११५-११६॥ चतुःशती शास्त्र (१।१५३-१५५) में अणिमा, लघिमा, महिमा, ईशिता, वशिता, प्राकाम्य, भुक्ति, इच्छा, प्राप्ति और सर्वकामा नाम की दस सिद्धियाँ वर्णित हैं। आदि शब्द से अणिमा तथा अन्य सिद्धियों का ग्रहण किया जाता है। इनमें से आठ सिद्धियाँ निघण्टु (कोश) ग्रन्थों में भी प्रसिद्ध हैं, यहाँ दस सिद्धियाँ वर्णित हैं। न्यास प्रकरण में यहाँ (३।७९-८०) वाम जंघा के वाम भाग से और वाम अन्तराल क्रम से आठ सिद्धियों १. 'च' नास्ति-ख. ने. ज. झ. उ. । २. तासु-क. ख. ग. ने. । ३. ख्यसिद्धयो दशादि-ख. ने. झ. उ. । ४. अष्टौ-ख. ने. ज. झ. उ. । १. दीपिका और सेतुबन्ध दोनों टीकाओं में आठ शब्द को दस का उपलक्षण माना है। यहाँ दस सिद्धियाँ मानी गई हैं, अतः ध्यान भी दसों सिद्धियों का होना चाहिये । आठ वर्गों की अधिष्ठात्री सिद्धियाँ अणिमा आदि आठ ही हैं, अतः उनकी ओर इंगित करने के लिये मूल में आठ शब्द दे दिया गया है।
३१२ योगिनीहृदयम् [ पूजासंकेतः इत्यत्रैवोक्तत्वात्¹। महारत्नं चिन्तामणिः। शेषं² स्पष्टम् ॥११५-११६॥ ब्राह्मयाद्या अपि तत्रैव यष्टव्याः ³क्रमशः प्रिये ॥११६॥ ब्राह्मयाद्याः “ब्रह्माणी पश्चिमद्वारे” (१।१५६) इति चतुःशतीशास्त्रोक्ताः। तत्रैव मध्यचतुरस्रे यष्टव्याः। क्रमशः क्रमेण ॥११६॥ तासां प्रत्येकं⁴ ध्यानमाह— ब्रह्माणी पीतवर्णा च चतुर्भिः शोभिता मुखैः । वरदाऽभयहस्ता च कुण्डिकाक्षस्रगुज्ज्वला⁵ ॥११७॥ करैरिति शेषः। शिष्टं स्पष्टम् ॥११७॥ माहेश्वरी श्वेतवर्णा त्रिनेत्रा शूलधारिणी । कपालमेणं परशुं दधाना पाणिभिः प्रिये ॥११८॥ एकेन पाणिना शूलधारिणी, त्रिभिः कपालमेणं परशुं दधाना ॥११८॥ का तथा बची दो सिद्धियों का पाद तल में न्यास बताया गया है। चिन्तामणि को महा- रत्न माना जाता है। शेष शब्दों का अर्थ स्पष्ट है ॥११५-११६॥ हे प्रिये ! ब्राह्मी प्रभृति देवियों की भी यहीं क्रमशः पूजा करनी चाहिये ॥११६॥ चतुःशती शास्त्र (१।१५६-१५७) में वर्णित ब्रह्माणी आदि देवियों की भी पूजा क्रमशः यहीं मध्य चतुरस्र में करनी चाहिये ॥११६॥ इनमें से प्रत्येक का ध्यान बताते हैं— ब्रह्माणी का वर्ण पीत है। चार मुंह इसकी शोभा बढ़ाते हैं। वर और अभय मुद्रा, कुण्डिका और अक्षमाला से इसके चार हाथ शोभायमान है ॥११७॥ वर, अभय, कुण्डिका और अक्षमाला का संबन्ध 'करैः' शब्द का अध्याहार कर किया जाता है। बाकी का अर्थ स्पष्ट है ॥११७॥ माहेश्वरी का वर्ण श्वेत है। यह तीन नेत्रों वाली है। हे प्रिये ! यह अपने चार हाथों में शूल, कपाल, एण (हिरन) और परशु धारण किये हुए है ॥११८॥ एक हाथ से यह शूल को धारण करती है और बाकी तीन हाथों में कपाल, एण और परशु धारण किये हुए है ॥११८॥ १. वोक्तम्-ख. ने. ज. उ. । २. शिष्टं-ख. ज. झ. उ. । ३. क्रमतः-क. ग. । ४. 'प्रत्येकं' नास्ति-ख. ने. ज. झ. उ. । ५. लसत्करा-ख. ग. ने. ज. झ. ।