भारतकोश
योगिनी हृदयम् (अमृतानन्दनाथ विमर्शिनी एवं पं. व्रजवल्लभ द्विवेदी सविस्तार सटीक)

योगिनी हृदयम् (अमृतानन्दनाथ विमर्शिनी एवं पं. व्रजवल्लभ द्विवेदी सविस्तार सटीक)

Yogini Hridayam with Amritanandanatha Dipika by Vraj Vallabha Dwivedi

अमृतानन्दनाथ (भाष्यकार: पं. व्रजवल्लभ द्विवेदी) द्वारा

DevanagariHindipublished485 पृष्ठ

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२५० योगिनीहृदयम् [ पूजासंकेतः अष्टदलव्यापकमाह— तदन्तरे चाष्टदलपद्माय नम इत्यपि ॥५२॥ विन्यस्य तदन्तरे षोडशदलपद्मान्तरे । "अष्टदलपद्माय नमः" इति मन्त्रेण दक्ष- शङ्खादिस्थानानि संस्पृश्य व्यापकं न्यसेदित्यर्थः ॥५२-५३॥ तद्दलान्याह— तद्दलेष्वेषु दक्षशङ्खे च जत्रुके । ऊर्वन्तर्गूल्फगुल्फोरुजत्रुशङ्खे च वामतः ॥५३॥ शङ्खजत्र्वादिशब्दानां शरीरावयवावच्छिन्नानामङ्गेषु निघण्टुषु सुप्रसिद्धत्वा- दवगतिः ॥५३॥ तत्तद्दलेषु न्यस्तव्याः शक्तीराह— अनङ्गकुसुमाद्यास्तु शक्तीरष्टौ च विन्यसेत् । अनङ्गकुसुमाद्याः अनङ्गकुसुमानङ्गमेखलानङ्गमदनानङ्गमदनातुरानङ्ग- रेखानङ्गवेगिन्यनङ्गाङ्कुशानङ्गमालिन्यः । शेषं सुगमम् ॥५४॥ अब अष्टदल न्यास को बताते हैं— सोलह दल के भीतर "अष्टदलपद्माय नमः" इस मन्त्र से अष्टदल चक्र का विन्यास करे ॥५२-५३॥ सोलह दल वाले पद्म के भीतर "अष्टदलपद्माय नमः" इस मन्त्र से दस शंख आदि स्थानों को छूकर व्यापक न्यास करे ॥५२-५३॥ इस पद्म के दलों के स्थान ये हैं— दक्ष शंख (दाहिनी कनपटी), जत्रु (हंसुली), जंघा और टखना तथा बायां टखना, जंघा, जत्रु और शंख—ये आठ स्थान इस अष्टदल कमल के आठ दलों के हैं ॥५३॥ शंख, जत्रु आदि शब्द मनुष्य के शरीर के विभिन्न अंगों के वाचक हैं। कोश ग्रन्थों में इनका अर्थ प्रसिद्ध है ॥५३॥ इन दलों में न्यस्तव्य शक्तियों को बताते हैं— इन आठ दलों में अनङ्गकुसुमा आदि आठ शक्तियों का विन्यास करना चाहिये ॥ अनङ्गकुसुमा, अनङ्गमेखला, अनङ्गमदना, अनङ्गमदनातुरा, अनङ्गरेखा, अनङ्ग- वेगिनी, अनङ्गाङ्कुशा, अनङ्गमालिनी—ये आठ शक्तियां हैं। बाकी का अर्थ सरल है ॥५४॥ Courtesy: Shri Tarun Dwivedi, Surviving Son of Late Vraj Vallabh Dwivediji (15 Jul 1926 - 17 Feb 2012)